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हम बागी है..........न खेलब ना खेले देब, खेलिये बिगाड़ब

 



मधुसूदन सिंह 

बलिया।। हम बागी बलिया के सपूत है। बगावत हमारे खून मे है, जो रगों मे दौड़ती है। हम आदतन बागी है। हम अगर बगावत न करें तो ऐसे लगता है जैसे हम कही खो गये है। चाहे भगवान विष्णु के वक्षस्थल पर चरण प्रहार करना हो, चाहे अंग्रेजों के खिलाफ बगावत का बिगुल फूँकना हो, चाहे साथ रहते हुए इंदिरा गांधी की सरकार की अनैतिक नीतियों का विरोध करना हो, हम पीछे नही रहे है। हम वो है जो एवरेस्ट पर झंडा फहरा देते है लेकिन घर नही बनाते है।

हम को लड़ना आता है, हम समझौता वादी नही है। हमको जब बाहर लड़ने का मौका नही मिलता है तो हम आपस मे ही लड़ने लगते है। यह हमारी बुराई नही है, यह हमारे बगावती खून की कारिस्तानी है। चूंकि हम को लड़ना है, तो हम हमेशा बलवानों से लड़ते है यानि सरकार से लड़ते है। हम वो लड़ाका है जिसको विरोध करने का जूनून सवार हो जाये तो हम अपने विकास को भी दरकिनार रख कर विरोध करते है। पिछला इतिहास देख लीजिये, कैसे पुलिस लाइन के मैदान मे बलिया को विकास की सौगात देने के लिये आये तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव का विरोध किये थे। यह अलग बात है कि इसके परिणाम स्वरुप विकास अवरुद्ध हो गया।

हम बागियों की एक और विशेषता है कि हम पक्ष से ज्यादे विपक्ष मे रहना ज्यादे पसंद करते है। हम विपक्ष को जिताकर विकास की गंगा बहे सोचने वाले लोग है। हम  कालिदास की तरह ही विद्वान है। हमको जब विपक्ष सरकार से सवाल पूंछने मे कमजोर लगता है तो हम विपक्ष बन जाते है। जब विकास की ज्यादे परियोजनाओं की घोषणा होने लगती है तो हम अपनी खानदानी आदत विरोध, के कारण विरोध पर उतर आते है।हम विरोध करने के रोग के कारण विकास का भी विरोध करने से पीछे नही हटते है।

हमारी पहचान जो सबसे ज्यादे विकास करता है, उसको बदल देने वालों की है। हम काम नही, वादों पर विश्वास करने वाले लोग है। हम सबसे जयदे विकास करने वाले का इतना विरोध करने वाले है कि उसको टिकट ही न मिले। बगावती तेवर के हम वो लोग है जब अपने पर आ जाये तो इस कहावत को चरितार्थ कर देते है -न खेलब ना खेले देब, खेलिये बिगाड़ब।

इस अंक मे अपने बारे मे इतना ही.... शेष अगले अंक मे।