भारत की धमकियां मसूद अजहर को लगती है कविता पर वाहवाही करने वाले श्रोताओ की दाद

6 मार्च 2019 ।।
(प्रवीण स्वामी)
आतंकी ठिकानों पर भारत की एयरस्ट्राइक की खबर पर मसूद अजहर की प्रतिक्रिया कुछ इस तरह की थी. "मैं देर रात ये कॉलम लिख रहा था, जब भारत की ओर से बमबारी की खबर आई. मैं इस पर बाद में और बातें कहूंगा. अभी के लिए ये कह सकता हूं कि कोई नुकसान नहीं हुआ है. भारत के नेता बेईमान हैं. '' "भारत की धमकियां", वह आगे कहता है, ''हमारे लिए वही काम करती हैं जो किसी कवि के लिए दर्शकों की वाहवाही. ये नशा शराब से भी ज्यादा शक्तिशाली है.''
आतंकी ठिकानों पर भारत की एयरस्ट्राइक की खबर पर मसूद अजहर की प्रतिक्रिया कुछ इस तरह की थी. "मैं देर रात ये कॉलम लिख रहा था, जब भारत की ओर से बमबारी की खबर आई. मैं इस पर बाद में और बातें कहूंगा. अभी के लिए ये कह सकता हूं कि कोई नुकसान नहीं हुआ है. भारत के नेता बेईमान हैं. '' "भारत की धमकियां", वह आगे कहता है, ''हमारे लिए वही काम करती हैं जो किसी कवि के लिए दर्शकों की वाहवाही. ये नशा शराब से भी ज्यादा शक्तिशाली है.''
दो बार, आतंकवादी समूह जैश-ए-मोहम्मद (JeM) के प्रमुख मसूद अजहर ने परमाणु हथियारों से लैस भारत और पाकिस्तान को युद्ध के किनारे पर ला खड़ा कर दिया; तीन बार, पाकिस्तान की सरकार ने उसे हिरासत में लिया और वादा किया कि उसके तमाम जेहादी संस्थानों पर ताला पड़ जाएगा.
अब, बालाकोट में जैश परिसर में भारत के हवाई हमले के मद्देनजर, इस्लामाबाद ने एक बार फिर नफरत के साम्राज्य को खत्म करने की कसम खाई है. लेकिन संभावनाएं कम हैं कि ये कार्रवाई पुरानी कार्रवाइयों से किसी भी तरह से अलग होगी.
अब भी उतना ही सक्रिय
जेएमएम के खुद के शब्दों से ये साफ है कि उनका ऑपरेशन 22 फरवरी को खत्म नहीं हुआ. इसी रोज पंजाब सरकार ने घोषणा की कि वो बहावलपुर में जैश के दो मुख्य भवनों को कब्जे में ले रही है. पाकिस्तान के सूचना मंत्री, फवाद चौधरी ने भी उस दिन घोषणा की कि सरकार आतंकवाद के खिलाफ देश की राष्ट्रीय कार्य योजना को लागू करने के लिए प्रतिबद्ध है, जिसके मायने हैं आतंकवाद से जुड़े किसी भी समूह पर कड़ी कार्रवाई.
शब्दों और वास्तविकता के बीच जैश का लेखन यानी साहित्य पर्याप्त फर्क दिखाता है. असल में, जैश पाकिस्तान के उस आधिकारिक दावे को खारिज करने की कोई कोशिश नहीं करता कि उसके संगठन या संगठन प्रमुख के आतंकवाद से कोई संबंध नहीं.
अखबारी आंकड़े
उदाहरण के लिए, साप्ताहिक अखबार अल-क़लम के 1 मार्च के अंक ने बताया कि 48 प्रतिभागी दाउरा सियासा से जुड़े हुए हैं. ये एक ऐसा पाठ्यक्रम है जिसमें "इस्लाम का ज्ञान, इस्लाम का इतिहास और जिहाद का ज्ञान" दिया जाता है. अखबार ने कहा, "ये मौलाना मसूद अज़हर की विरासत है और टीचर इसे मौलाना के निर्देशों के अनुसार चलाते हैं."
अखबार में इस बात का सबूत भी है कि भर्ती की गतिविधि में तेजी जारी है.
उदाहरण के लिए उपदेशक इलियास कासमी ने बहावलपुर में अपने दर्शकों को "कुरान, नमाज और जिहाद" के लिए आमंत्रित करने के लिए एक बैठक आयोजित की. "जब हम कुरान की रोशनी में जिहाद को समझते हैं तो हमें खुद-बखुद नई तरह की इज्जत और हिम्मत मिलती है", इलियास ने कहा था. अखबार के अनुसार इस भाषण के बाद 5 लोग समूह में शामिल होने के लिए तैयार हो गए.
बैठकें और एलान
बल्कि अखबार में बताया गया है कि कैसे पुलवामा हमले के बाद देशभर में जैश की बैठकें हुईं. ऐसी ही एक बैठक में मौलाना मुजाहिद अब्बास ने कहा- मुसलमान भाइयों, अब हमें कश्मीरी भाइयों के साथ मरने के लिए तैयार रहना है. और हिंदुओं को बताना है कि हम तब तक नहीं रुकेंगे, जब तक नहीं रुकेंगे जब तक कि इस्लाम का झंडा उनके पूरे देश पर न फहराने लगे.
एक अन्य उपदेशक क़मर-उल-ज़मान ने कहा "हम शहीदों के खून की वजह से अफगानिस्तान में जीत का जश्न मना रहे हैं." वे आगे कहते हैं, "वो दिन दूर नहीं," जब कश्मीर से भी मिलती-जुलती खबर आएगी.”
अल-क़लम अखबार में अज़हर के लेख से यह साफ है कि वह संगठन के खिलाफ कम से कम किसीआधिकारिक कार्रवाई की आशंका में था, जैसा कि साल 2001, 2008 और 2018 में आतंकी कार्रवाइयों के बाद हुआ था.
वे लिखते हैं, "जिस दिन से पाकिस्तान अमेरिका और नाटो से जुड़ा, हालात खराब होते गए. हमारे वक्त के शासकों से भारी भूल हुई और उसपर पश्चाताप करने से भी उन्होंने इन्कार कर दिया. उसी पाप के कारण भारत जैसा खराब, नापाक और डरपोक देश भी हमें डरा पा रहा है."
अजहर ने पाकिस्तान के शासकों को संबोधित करते हुए लिखा, "अगर आप केवल उसी रास्ते पर चलें, जो इस्लाम ने तय किया है तो ऐसा होने की कोई गुंजाइश नहीं रह जाएगी."
इस सप्ताह अल-क़लम के प्रकाशन के बाद, जैश से जुड़ा एक टेलीग्राम फीड शिकायत से भरा हुआ था कि हालिया पाकिस्तानी सरकार परवेज मुशर्रफ की तरह ही निकली. इसने भारत के पायलट को वापस लौटा दिया है, और अब इस्लामी विश्वास से जुड़े लोगों पर निशाना साध रही है, उनके संस्थान कब्जे में लिए जा रहे हैं.
इसमें आगे कहा गया है- "अपने बनाने वाले के साथ मिलने के लिए तैयार रहें. यहां से वहां जाने के लिए तैयार रहें. किसी भी समय आपको बुलाया जा सकता है. तैयार रहें. "
अपने सख्त टोन के बावजूद, हालांकि, इसका कोई सबूत नहीं है कि पाकिस्तान सरकार आतंकवाद पर अपने शिकंजे को लेकर थोड़ी भी संजीदा है. वजह साफ है, जैश और पाकिस्तानी सेना के बीच गहरा रिश्ता.
9/11 के दौरान जैश पर भारी दबाव पड़ा क्योंकि तत्कालीन जनरल परवेज मुशर्रफ सरकार ने पाकिस्तान में जिहादी आंदोलन देखा और उसपर लगाम कसना चाहा. साल 2001 के आखिर में जैश के सैन्य कमांडर मौलाना अब्दुल जब्बार ने पाकिस्तान में पश्चिमी टारगेटों पर हमलों के लिए जोर देना शुरू किया. अजहर ने खुद को चुनौती देने वाले को "संप्रदायवादी आतंकवादी" बताया लेकिन कई युवा जिहादियों ने अल-कायदा से जुड़ने के लिए जैश से दूरी बना ली.
साल 2002 में, भारत के साथ चौतरफा युद्ध का जोखिम देखते हुए, जनरल मुशर्रफ ने जैश पर प्रतिबंध लगा दिया. जिहादियों के लिए और भी कई तरह की बुरी खबरें थीं. अजहर द्वारा ब्रिटिश मूल के अल-कायदा जिहादी रशीद रऊफ का उल्लेख किए जाने के प्रमाण सामने आए.
2005 के लंदन बम विस्फोटों के जांच के दौरान सामने आया कि इससे जुड़े मोहम्मद सिद्दीक खान, उन्हीं शिविरों में प्रशिक्षित थे, जिसमें अजहर का प्रशिक्षण हुआ था और वे अजहर की ही लेखनी से प्रभावित थे.
इन घटनाओं के मद्देनजर, पूर्व इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (आईएसआई) के प्रमुख लेफ्टिनेंट-जनरल जावेद अशरफ़ काज़ी ने पाकिस्तान की संसद में कहा, " देश को यह स्वीकार करने से नहीं डरना चाहिए कि जैश भारतीय संसद पर हमले के अलावा हजारों निर्दोष कश्मीरियों की मौत में भी शामिल था ”. यहां तक कि जनरल मुशर्रफ की प्रो-अमेरिकी नीतियों के कारण, पाकिस्तान विरोधी जिहादियों का एक नया समूह भी पैदा हो गया जिनमें से एक थे आईएसआई के मुख्य लेफ्टिनेंट जनरल शुजा पाशा. जिहादियों ने साल 2009 में रावलपिंडी में पाकिस्तानी मुख्यालय पर हमला किया.
गिद्ध की तरह नजर गड़ाए लोगों के लिए ये तमाम मामले अजहर को वापस लाने और जिहादियों का एक वफादार समूह बनाने के लिए प्रेरणा दे रहे थे. एक ऐसा संगठन जिसे अफगानिस्तान और इराक में जिहाद की ओर बढ़ाया जा सके.
बिन लादेन की मौत के बाद जैश उसे मुखर समर्थन देने लगा. ये एक तरह से भगोड़े जिहादियों पर पाकिस्तानी नीति के खिलाफ था. ऐसे ही एक प्रशंसा -गान में मसूद अजहर ने उसे "हमारा भाई, एक मुस्लिम और अरबों का गौरव" बताया. एक और प्रतिनिधि रऊफ का बयान इससे भी ज्यादा खुला हुआ था. उसने पाकिस्तान की राजनीति पर हमला करते हुए कहा कि जिसने अपनी पूरी जिंदगी इस्लाम को दे दी, उसे पाकिस्तान में शहीद होना पड़ा.
"अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन का खून बहाया है", रऊफ ने चेतावनी दी. "और वे इसका नतीजा भुगतेंगे".
जैश के नेताओं के भाषण न केवल भारत, बल्कि दुनियाभर में जिहाद की जमीन बनाते हैं. पेरिस में चार्ली हेब्दो पर हमले के बाद, मसूद अजहर ने पश्चिम को चेतावनी दी, "अगर आप बम फेंकते हैं, तो क्या आपको लगता है कि मदीना के बच्चे आप पर फूल बरसाएंगे?"
इन गर्मियों में 50 साल पूरे करने जा रहे अजहर मसूद का वजन बढ़ा हुआ है और शुगर की बीमारी हैं. 10 साल पहले इनका गाल-ब्लैडर निकाला जा चुका है. लब्बोलुआब ये कि वो उम्र के आखिरी पड़ाव पर हैं लेकिन नफरत के साम्राज्य का सूरज अभी ढला नहीं है ।(साभार न्यूज18) ।
भारत की धमकियां मसूद अजहर को लगती है कविता पर वाहवाही करने वाले श्रोताओ की दाद
Reviewed by बलिया एक्सप्रेस
on
March 06, 2019
Rating: 5
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