वैदिक ब्रह्मांड-विज्ञान और हिरण्यगर्भ सूक्त: एक अद्वैत दर्शन
लखनऊ।। ऋग्वेद का दसवां मंडल प्राचीन भारतीय चिंतन का वह उत्कर्ष है, जहां मानव मन केवल बाह्य देव-शक्तियों की स्तुति तक सीमित न रहकर अस्तित्व के सबसे मौलिक और गहन प्रश्नों से टकराता है। इसी मंडल का 121वां सूक्त, जिसे *'हिरण्यगर्भ सूक्त'* के नाम से जाना जाता है, वैदिक ऋषियों की उस अमूर्त, काव्यात्मक और दार्शनिक प्रज्ञा का जीवंत प्रमाण है। यदि नासदीय सूक्त में सृष्टि की पूर्व-अवस्था पर प्रश्न चिन्ह लगाकर एक रहस्यमयी मौन साध लिया गया था, तो हिरण्यगर्भ सूक्त उसी अंधकार के बीच से फूटने वाले प्रथम प्रकाश-पुंज की गाथा सुनाता है। यह सूक्त केवल किसी एक पौराणिक कथा का वर्णन नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा व्यापक दार्शनिक लेख है जो पदार्थ, ऊर्जा, चेतना, नियम और मानवीय श्रद्धा को एक ही सूत्र में पिरोता है। १. प्रथम स्पंदन: हिरण्यगर्भ और कॉस्मिक सिंगुलैरिटी
सृष्टि के प्राकट्य से पूर्व कोई रूप नहीं था, कोई नाम नहीं था। संपूर्ण अस्तित्व एक अनिर्दिष्ट और अव्यक्त संभावना के रूप में विद्यमान था। इस असीम शून्यता के भीतर सबसे पहले जिस एकीकृत तत्त्व का स्पंदन हुआ, ऋषियों ने उसे *'हिरण्यगर्भ'* कहा। 'हिरण्य' का अर्थ केवल भौतिक सोना नहीं है, बल्कि यह उस स्वर्णिम, अत्यंत सघन, ऊर्जावान और तेजोमय प्रकाश का प्रतीक है जो जीवन और पदार्थ की समस्त संभावनाओं को अपने भीतर समेटे हुए था। 'गर्भ' का तात्पर्य उस मूल बीज से है जिसमें संपूर्ण ब्रह्मांड की संरचना छिपी हुई थी।
यह कोई साधारण या आकस्मिक घटना नहीं थी। वह प्रथम तेजोमय बीज ही इस समस्त प्राणिजगत और ब्रह्मांड का एकमात्र स्वामी बना। उसी ने इस दृश्यमान पृथ्वी, अंतरिक्ष और अनंत द्युलोक (ऊर्ध्व लोकों) को अपने स्थान पर स्थिर किया और अपनी अदृश्य शक्ति से धारण किया। जब हम आधुनिक भौतिक विज्ञान की 'बिग बैंग थ्योरी' (Big Bang Theory) या 'कॉस्मिक एग' (Cosmic Egg) की अवधारणा पर विचार करते हैं, तो पाते हैं कि हजारों वर्ष पूर्व वैदिक ऋषियों ने उसी प्रथम सघन ऊर्जा बिंदु को हिरण्यगर्भ के रूप में देखा था—एक ऐसा स्रोत जिससे समय, स्थान और पदार्थ का विस्तार हुआ।
२. चेतना का उद्भव और समस्त जीवों की एकात्मकता
हिरण्यगर्भ सूक्त का चिंतन केवल भौतिक ब्रह्मांड के निर्माण तक सीमित नहीं रहता। यह उस अत्यंत मौलिक प्रश्न का उत्तर भी खोजता है कि पदार्थ के भीतर से यह 'चेतना' कहाँ से आई। ऋषि उद्घोष करते हैं कि वही परम स्रोत *'आत्मदा'* (आत्मा या जीवन देने वाला) और *'बलदा'* (शक्ति और सामर्थ्य देने वाला) है। दूसरे शब्दों में, यह ब्रह्मांड केवल निर्जीव पत्थरों, तारों और गैसों का ढेर नहीं है। इसके साथ ही एक अनुभव करने वाली सत्ता, एक बोध और एक जीवन-शक्ति प्रकट हुई है।
प्रकृति की बड़ी-बड़ी शक्तियां और नियम (जिन्हें वैदिक साहित्य में देव कहा गया है) उसी के शासन और व्यवस्था का पालन करते हैं। उसकी उपस्थिति ही अमरत्व (परम शांति और सत्य) का आधार है, और उससे विमुख होना ही अज्ञान और मृत्यु है।
इसी चेतना के विस्तार को जब ऋषि धरातल पर देखते हैं, तो वे एक महान सामाजिक और पर्यावरणीय संदेश देते हैं। वे कहते हैं कि जो भी प्राणी श्वास लेता है, जो भी आँख झपकाता है—चाहे वह दो पैरों वाला मनुष्य हो या चार पैरों वाला पशु—सब उसी एक मूल सत्ता के अधीन और उसी से उत्पन्न हैं। यहाँ मनुष्य को संपूर्ण प्रकृति का स्वामी या विजेता नहीं माना गया, बल्कि उसे जीवन के एक विशाल, एकत्रीकृत परिवार का एक विनम्र हिस्सा स्वीकार किया गया है। समस्त प्राणियों में बहती हुई प्राण-वायु एक ही स्रोत का प्रमाण है।
३. प्रकृति की विराटता में परम सत्ता का दर्शन
जब ऋषि अपनी दृष्टि को जीवों से उठाकर संपूर्ण भूगोल और ब्रह्मांड पर डालते हैं, तो उन्हें सर्वत्र उसी हिरण्यगर्भ की महिमा के साक्ष्य मिलते हैं। बर्फ से आच्छादित उत्तुंग, विशाल हिमालय पर्वत, अगाध जलराशि वाले गंतव्य समुद्र, कल-कल बहती नदियां और दसों दिशाएं—जो मानो उसकी फैली हुई भुजाएं हैं—ये सभी उस परम तत्त्व की महानता का मौन गान कर रहे हैं।
वैदिक चिंतन में प्रकृति और ईश्वर दो अलग-अलग सत्ताएं नहीं हैं। प्रकृति उस परम चेतना की ही स्थूल अभिव्यक्ति है। पर्वतों की ऊंचाई में उसका स्थैर्य है, समुद्रों की गहराई में उसका अथाहपन है और नदियों के प्रवाह में उसकी गतिशीलता है। आधुनिक खगोलशास्त्री कार्ल सेगन का यह प्रसिद्ध कथन कि *"हम सभी तारों के मलबे (Star Stuff) से बने हैं"*, इसी वैदिक सत्य का आधुनिक रूपांतरण प्रतीत होता है। हमारे शरीरों के तत्त्व, पृथ्वी की चट्टानें और दूरस्थ नक्षत्र सब एक ही ब्रह्मांडीय प्रक्रिया के विस्तार हैं।
४. कॉस्मिक ऑर्डर: ऋत और ब्रह्मांडीय व्यवस्था
हिरण्यगर्भ केवल निर्माता नहीं है, वह इस विशाल संसार का नियामक और व्यवस्थापक भी है। सूक्त में एक अत्यंत महत्वपूर्ण शब्द आता है "विमान" । वैदिक संस्कृत में इसका अर्थ केवल उड़ने वाला वाहन नहीं, बल्कि 'मापने वाला' या 'नियम निर्धारित करने वाला' होता है।
ऋषि देखते हैं कि यह संसार अराजकता में नहीं चल रहा। सूर्य का उदित होना, ऋतुओं का चक्र, पृथ्वी का अपनी धुरी पर टिके रहना और अंतरिक्ष में फैले सूक्ष्म पदार्थों का एक निश्चित क्रम में गति करना—इस सब के पीछे एक परम नियम कार्य कर रहा है, जिसे वेदों में *'ऋत'* कहा गया है। अल्बर्ट आइंस्टाइन ने एक बार कहा था कि *"ब्रह्मांड के बारे में सबसे अकल्पनीय बात यह है कि यह बोधगम्य है (इसे समझा जा सकता है)।"* ऋषियों का भी यही आश्चर्य था कि इतने अनंत विस्तार के पीछे एक गहरी गणितीय व्यवस्था, संतुलन और नियम है, जो उस परम स्रोत द्वारा ही संचालित है।
५. आदिम जल, अग्नि और अधिदेव का सिद्धांत
सूक्त के उत्तरार्ध में अत्यंत सूक्ष्म और रूपकात्मक दार्शनिक चर्चा मिलती है। ऋषि कहते हैं कि सृष्टि के प्रारंभ में सर्वत्र 'आपः' (आदिम जल) व्याप्त था। यह जल नदियों का पानी नहीं, बल्कि वह अनभिव्यक्त, प्रवाहमान और अनंत संभावनाओं का महासागर था जिसके भीतर पूरा ब्रह्मांड सोया हुआ था।
उस आदिम जल के गर्भ से *'अग्नि'* (ऊर्जा, ताप, और गति) का प्रादुर्भाव हुआ। जब तक निष्क्रियता में गति और ताप नहीं आता, तब तक रूप और आकार नहीं बन सकते। अग्नि के प्रकट होते ही निष्क्रियता सक्रियता में बदली, और उसी से प्राकृतिक शक्तियां (देवगण) प्रकट हुईं।
यहाँ ऋषि एक अत्यंत क्रांतिकारी विचार प्रस्तुत करते हैं। वे कहते हैं कि यदि देवगण (प्रकृति की शक्तियां) भी सृष्टि की प्रक्रिया के दौरान प्रकट हुए हैं, तो उनका भी एक स्रोत होना चाहिए। उस स्रोत को ऋषि *'अधिदेव'* कहते हैं—वह जो देवताओं से भी पूर्व था, जो देवों का भी देव है। यह विचार भारत के अद्वैत दर्शन (Vedanta) का आधार बना, जहाँ अनेक रूपों के पीछे केवल एक ही अंतिम सत्य को स्वीकार किया गया है।
६. दर्शन से भक्ति की ओर: मानवीय विनम्रता
जैसे-जैसे सूक्त अपने समापन की ओर बढ़ता है, ऋषि का स्वर दार्शनिक चिंतन से बदलकर अत्यंत मानवीय और आत्मीय हो जाता है। जब मनुष्य प्रकृति और ब्रह्मांड की इस अपार विशालता, शक्ति और नियमों का सामना करता है, तो उसके भीतर दो भाव एक साथ जन्म लेते हैं—पहला है 'विस्मय' (Awe) और दूसरा है 'विनम्रता'।
ऋषि यहाँ प्रार्थना करते हैं: *"मानो हिंसीत्..."* अर्थात वह परम सत्ता, जिसने पृथ्वी, आकाश और सत्य के अटल नियमों की रचना की है, हमें कष्ट न दे। यह डर की प्रार्थना नहीं है; यह उस विराट अस्तित्व के समक्ष अपनी मानवीय सीमाओं की स्वीकृति है। जो प्रकृति जीवन देती है, वही तूफान बनकर विनाश भी कर सकती है। इसलिए, यहाँ बुद्धि (दर्शन) और हृदय (भक्ति) का मिलन होता है। ज्ञान हमें ब्रह्मांड का आकार दिखाता है, लेकिन नम्रता हमें उस ब्रह्मांड में शांति से जीना सिखाती है।
७. खोज की पूर्णता " प्रजापति "और परम समाधान
पूरे सूक्त के दौरान (प्रथम नौ श्लोकों में) एक ही काव्यात्मक प्रश्न की पुनरावृत्ति होती है—"कस्मै देवाय हविषा विधेम?" अर्थात "हम किस अज्ञात/परम देव के प्रति अपनी श्रद्धा और आहुति अर्पित करें?" यह प्रश्न केवल एक कर्मकांडीय वाक्य नहीं, बल्कि मनुष्य की अनंत जिज्ञासा की पुकार है। ऋषि एक-एक करके सृष्टि के सारे घटकों—आकाश, पृथ्वी, जल, सूर्य, जीवन, नियम—को देखते हैं और बार-बार पूछते हैं कि इस सब का मूल स्रोत कौन है?
दसवें और अंतिम श्लोक में आकर यह प्रश्न सदा के लिए समाप्त हो जाता है। ऋषि उस अनम्य, अनाम और विराट तत्त्व को अंततः एक नाम देते है:- "'प्रजापति'"
प्रजा' अर्थात समस्त उत्पन्न हुआ संसार, संपूर्ण जीव-जगत।
'पति' अर्थात पालनहार, रक्षक और धारण करने वाला।
ऋषि उद्घोष करते हैं कि हे प्रजापति! आपके अतिरिक्त कोई दूसरा ऐसा नहीं है जो इस संपूर्ण सृष्टि के सभी रूपों को अपने भीतर समेट सके और इन्हें धारण कर सके। इस प्रकार खोज पूर्ण होती है। जो अज्ञात था, वह पहचाना जाता है। ऋषि अंत में सर्वकल्याण और समृद्धि की प्रार्थना के साथ इस महान सूक्त को विश्राम देते हैं।
निष्कर्ष
हम कह सकते है कि हिरण्यगर्भ सूक्त वैदिक मनीषा की वह अमूल्य धरोहर है जो हमें सिखाती है कि यह जगत् खंड-खंड में बंटा हुआ नहीं है। विभिन्नताओं, भाषाओं, जातियों, प्रजातियों, और प्राकृतिक रूपों के पीछे एक ही **एकीकृत चेतना (Unified Consciousness)* बह रही है। जो बीज में है, वही वृक्ष में है; जो हिरण्यगर्भ में था, वही इस संपूर्ण चराचर संसार में ओत-प्रोत है। यह सूक्त हमें प्रकृति के प्रति श्रद्धा, समस्त जीवों के प्रति करुणा और उस एक परम सत्य के प्रति कृतज्ञता के साथ जीवन जीने की प्रेरणा देता है।
(लेखक राजू बाबू सिंह रिटायर्ड आईपीएस लखनऊ)







