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'शेर-ए-पूर्वांचल’ बच्चा पाठक, 23 अप्रैल पुण्यतिथि पर विशेष


 


बलिया। पूर्वांचल की राजनीति में अद्वितीय पहचान बनाने वाले, ‘शेर-ए-पूर्वांचल’ के नाम से विख्यात वरिष्ठ कांग्रेस नेता बच्चा पाठक आज ही के दिन यानि 23 अप्रैल को इस दुनिया को छोड़कर भगवान के पास चले गये थे। बच्चा पाठक जी शरीर से तो हम सबके बीच नहीं है लेकिन उनकी आम जनता मे जो आत्मिक लगाव था वह आज भी देखा जा सकता है।

संघर्ष, जनसेवा व सिद्धांत पट अटूट निष्ठा, इनकी सफलता का राज 

बच्चा पाठक का जीवन संघर्ष, जनसेवा और सिद्धांतों के प्रति अटूट निष्ठा का प्रतीक रहा है। बलिया जनपद के रेवती ब्लॉक अंतर्गत खानपुर गांव में जन्मे बच्चा पाठक ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत वर्ष 1956 में डुमरिया न्याय पंचायत के सरपंच के रूप में की। इसके बाद 1962 में वे रेवती ब्लॉक प्रमुख निर्वाचित हुए, जिसने उनके जनाधार को और मजबूत किया। 



1967 में उन्होंने बांसडीह विधानसभा से पहली बार चुनाव लड़ा, लेकिन उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा। हालांकि उन्होंने हार से सीख लेते हुए 1969 में कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में शानदार वापसी की और विजय बहादुर सिंह को पराजित कर पहली बार विधायक बने। इसके बाद उनका राजनीतिक सफर लगातार ऊंचाइयों की ओर बढ़ता गया।

जनता पार्टी की लहर मे भी जीते चुनाव 

1974 के चुनाव में उन्होंने जिले के कद्दावर नेता ठाकुर शिवमंगल सिंह को हराकर अपनी मजबूत पकड़ का परिचय दिया। वहीं 1977 में, जब पूरे देश में कांग्रेस के खिलाफ लहर थी, उस समय भी बच्चा पाठक ने अपनी सीट जीतकर इतिहास रच दिया। इस ऐतिहासिक विजय के बाद उन्हें ‘शेर-ए-पूर्वांचल’ की उपाधि मिली, जो उनकी लोकप्रियता और जनसमर्थन का प्रतीक बन गई।



बच्चा पाठक सात बार बांसडीह विधानसभा से विधायक चुने गए और दो बार उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री पद पर रहे। वर्ष 1980 में वे पहली बार मंत्री बने, जहां उन्होंने पीडब्ल्यूडी और सहकारिता विभाग का दायित्व संभाला। वर्ष 1996 में उन्हें पर्यावरण एवं वैकल्पिक ऊर्जा मंत्री बनाया गया, जहां उन्होंने अपने कार्यकाल में कई महत्वपूर्ण पहलें कीं।

चुनाव हारने के बाद भी जनता से रहा लगातार जुडाँव 

राजनीतिक जीवन में उतार-चढ़ाव के बावजूद उन्होंने कभी जनता से दूरी नहीं बनाई। 1985 और 1989 में चुनाव हारने के बावजूद वे लगातार जनता के बीच सक्रिय रहे और उनके सुख-दुख में सहभागी बने रहे। यही कारण था कि 1991, 1993 और 1996 में वे पुनः विधायक चुने गए।

शिक्षा के लिये बनवाये कई विद्यालय 

राजनीति के साथ-साथ बच्चा पाठक शिक्षा के क्षेत्र में भी विशेष रूप से सक्रिय रहे। उन्होंने क्षेत्र में कई शिक्षण संस्थानों की स्थापना में योगदान दिया और शिक्षा के प्रसार को अपना सामाजिक दायित्व माना। उनका मानना था कि शिक्षित समाज ही सशक्त राष्ट्र की नींव रख सकता है।


अपने निर्भीक और बागी तेवर के लिए प्रसिद्ध बच्चा पाठक हमेशा कमजोरों और शोषितों की आवाज बने रहे। उन्होंने अन्याय के खिलाफ खुलकर आवाज उठाई और अपने कार्यकर्ताओं के सम्मान के लिए हमेशा अग्रसर रहे।

नेता नहीं एक युग थे स्व बच्चा पाठक 

23 अप्रैल को उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर उन्हें याद करते हुए लोग कहते हैं कि बच्चा पाठक केवल एक नेता नहीं, बल्कि एक युग थे—एक ऐसी शख्सियत, जिनकी सोच, कार्यशैली और जनसेवा की भावना आज भी लोगों के दिलों में जीवित है। उनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी।