एक समय के दोस्त ईरान और इज़राइल आज एक-दूसरे को खत्म करने पर है आमादा
नोएडा।।इजराइल और ईरान के बीच संघर्ष विनाशकारी दिशा में बढ़ रहा है। हालात ऐसे दिख रहे हैं कि उन्हें आसानी से वापस मोड़ना संभव नहीं है। हजारों लोगों के हताहत होने का खतरा बना हुआ है।
एक समय था जब इजराइल और ईरान मित्र राष्ट्र थे। लेकिन ईरान में सत्ता परिवर्तन के बाद नए शासकों को इजराइल दुश्मन नजर आने लगा। ईरान के पास परमाणु बम बनाने के लिए आवश्यक समृद्ध यूरेनियम है, जिसे तेल अवीव के लिए गंभीर खतरा माना जाता है।
इतिहास पर नजर डालें तो 1948 में जब इजराइल राष्ट्र की स्थापना की घोषणा हुई, तब अधिकांश मुस्लिम देशों ने उसे मान्यता नहीं दी थी। लेकिन शिया बहुल ईरान ने उसे मान्यता दी थी। शाह मोहम्मद रजा पहलवी के शासनकाल में ईरान पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका, की ओर झुका हुआ था। चूंकि इजराइल अमेरिका के समर्थन पर निर्भर था, इसलिए वह ईरान को अपना मित्र देश मानता था।
1950 और 60 के दशक में इजराइल ने गैरअरब देशों का एक गठजोड़ बनाने की कोशिश की। तुर्की और इथियोपिया इसमें शामिल हुए। 1958 में ईरान, तुर्की और इजराइल के बीच 'ट्राइडेंट' (त्रिशूल) समझौता हुआ, जिसमें हथियारों के सौदे, खुफिया सूचनाओं का आदानप्रदान और आर्थिक सहयोग शामिल था।
उस दौर में दोनों देशों के संबंध इतने मजबूत थे कि इजराइल ईरान को सैन्य मामलों में तकनीकी सहायता देता था। आर्थिक क्षेत्र में भी उनके संबंध महत्वपूर्ण थे। 1967 में जब कुछ अरब देशों ने इजराइल का बहिष्कार करते हुए तेल की आपूर्ति बंद कर दी थी, तब ईरान ने उसे तेल उपलब्ध कराया। बदले में इजराइल ने ईरान को आधुनिक कृषि तकनीक दी।
पूरे ईरान में इजराइली तकनीक से बुनियादी ढांचे के विकास के काम हुए। 1960-70 के दशक में दोनों देशों के बीच आर्थिक और सुरक्षा सहयोग चरम पर था। 1975 में इजराइल की कुल तेल मांग का लगभग 70 प्रतिशत तेल ईरान से आता था। उस समय इजराइल ईरान को हथियार भी बेचता था, जिससे उसकी रक्षा उत्पादन क्षमता बढ़ी।
1979 तक दोनों देशों की मित्रता जगजाहिर थी। लेकिन 1979 की ईरानी क्रांति के बाद जब आयातोल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी सत्ता में आए, तो संबंधों में दरार पड़ गई। नए शासकों ने इजराइल को देश के रूप में स्वीकार करने से इनकार कर दिया और फिलिस्तीन का खुलकर समर्थन किया। अंततः ईरान ने इजराइल से सभी संबंध तोड़ दिए।
1980-90 के दशक में ईरान ने हिज्बुल्लाह और हमास जैसे संगठनों को समर्थन दिया, उन्हें प्रशिक्षण, फंडिंग और हथियार उपलब्ध कराए। धीरे-धीरे ईरान ने इजराइल को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मान लिया।
1990 के दशक में ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर तनाव और बढ़ गया और दोनों देश कट्टर विरोधी बन गए।
इजराइल ने ईरान की परमाणु क्षमता के खिलाफ 'ऑपरेशन राइजिंग लायन' जैसी कार्रवाई शुरू की, जिसका उद्देश्य अपने अस्तित्व के सामने खड़े परमाणु खतरे का सामना करना था।
कई वर्षों की रणनीतिक उलझन के बाद इजराइल ने ईरान के परमाणु ठिकानों और बैलिस्टिक मिसाइल निर्माण केंद्रों पर हमले किए। पिछले वर्ष भी ऐसे हमले हुए, जिनके जवाब में ईरान ने पलटवार किया। इन घटनाओं में ईरान की पूर्व खुफिया एजेंसी सावाक और इजराइल की खुफिया एजेंसी मोसाद की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है।
13 जून, 2025 को इजराइल द्वारा ईरान के परमाणु ठिकानों पर किए गए हमलों में कुछ परमाणु वैज्ञानिक और नागरिक मारे गए। इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा था कि जब तक ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई को खत्म नहीं किया जाएगा, तब तक संघर्ष नहीं रुकेगा। अब खामेनेई की मौत के बाद स्थिति और भड़क गई है।
वीरेंद्र बहादुर सिंह
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