Breaking News

युवाओं के सपनों पर भारी पड़ रही सियासत- रामगोविन्द

 


 


अदालती आदेश के बाद भी समाधान नहीं,न्याय बनाम प्रशासनिक अवरोध

लखनऊ /बलिया।। उत्तर प्रदेश की शैक्षिक राजनीति और विधिक गलियारों में सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय की नियुक्तियों का प्रकरण एक मिसाल बन गया है। यह कहानी केवल एक अध्यादेश की नहीं, बल्कि हज़ारों बेरोजगारों के सपनों और न्यायपालिका बनाम कार्यपालिका के बीच खिंचती रस्साकशी की है।

1. 2013-14 का ऐतिहासिक निर्णय

तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के कार्यकाल में सन् 2013-14 में एक महत्वपूर्ण अध्यादेश लाया गया था। इसका उद्देश्य संस्कृत शिक्षा के गिरते स्तर को सुधारना और महाविद्यालयों में शिक्षकों की भारी कमी को दूर करना था।

  उक्त बाते पूर्व नेता प्रतिपक्ष रामगोविन्द चौधरी ने सोमवार को एक बयान जारी कर कहा और बताया कि विश्वविद्यालय और संबद्ध महाविद्यालयों की प्रबंध समितियों को रिक्त पदों पर चयन की शक्ति दी गई।इस विकेंद्रीकरण से प्रक्रिया में तेजी आई और कई उच्च शिक्षित युवाओं को रोजगार मिला, जिससे संस्कृत की पाठशालाओं में रौनक लौटी।

2016-17 में सत्ता परिवर्तन के साथ ही इन नियुक्तियों पर रोक लगा दी गई। योगी सरकार के इस कदम ने न केवल नए रोजगारों पर ताला जड़ा, बल्कि कार्यरत शिक्षकों के भविष्य पर भी प्रश्नचिन्ह लगा दिया।



इसके बाद शुरू हुआ अदालती संघर्ष का वह लंबा सिलसिला, जिसमें सरकार को हर मोड़ पर विधिक हार का सामना करना पड़ा। अभ्यर्थियों ने सरकार के रोक के फैसले को चुनौती दी और कोर्ट ने अभ्यर्थियों के पक्ष में फैसला सुनाया।सरकार ने हार नहीं मानी और डबल बेंच में अपील की, लेकिन वहाँ भी न्याय की जीत हुई।

 अंततः मामला देश की सबसे बड़ी अदालत पहुँचा। 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने भी सरकार की याचिका को खारिज करते हुए नियुक्तियों के पक्ष में मुहर लगा दी।

पूर्व नेता विरोधी दल ने कहा कि 'न्याय में देरी, न्याय न मिलने के बराबर'

विडंबना यह है कि देश की सर्वोच्च अदालत से आदेश आने के बावजूद योगी सरकार ने शासन स्तर पर विभिन्न तकनीकी पेच फंसाकर इन नियुक्तियों और उनके लाभों को बाधित किया जा रहा है। यह स्थिति न केवल न्यायालय की अवमानना (Contempt of Court) की श्रेणी में आती है, बल्कि उन युवाओं के साथ भी अन्याय है जो अपनी योग्यता सिद्ध कर चुके हैं।


संस्कृत को भारत की आत्मा कहा जाता है, लेकिन जब इसी भाषा के विद्वान और शिक्षक अपनी आजीविका के लिए दर-दर भटकते हैं, तो यह व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। यदि सरकारें अदालती आदेशों के बाद भी 'हथकंडे' अपनाकर नियुक्तियां रोकती हैं, तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों का हनन है।

 योगी सरकार और प्रशासन को अब हठधर्मिता छोड़कर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का सम्मान करना चाहिए ताकि संस्कृत शिक्षा का संरक्षण हो सके और युवाओं को उनका उचित हक मिल सके।