गोस्वामी तुलसीदास की धर्मपत्नी रत्नावलि का विरही काव्य
आत्माराम यादव पीव वरिष्ठ पत्रकार
बलिया।। गुसाई तुलसीदास अपनी राममय भगवद्भक्ति, लोकोपकारिता और रामचरित्र मानस व काव्यरस रचनाओं के कारण समूचे विश्व में स्मरणीय है किन्तु यह दुनिया उनकी धर्मपत्नी रत्नावली जो वास्तव में परम विदुषी तपस्विनी के साथ पति वियोग में कवयित्री बन गई थी के जीवन के विषय में कम लोग ही जानते है। रत्नावलि तुलसीदास की धर्मपत्नी थीं जिन्होने कामन्ध पति के हृदय को भेदने वाली वाणी से उन्हे घायल किया जिससे वे परमात्मा की खोज में निकल पड़े, यह इतिहास अब तक हम पढ़ते सुनते आए है जिसमें तुलसीदास के गोसाई बनने तक की यात्रा का परिचय सभी को है किन्तु उनके पत्नी को त्यागने के बाद उनकी पत्नी के जीवन से बहुत कम लोग परिचित है। तुलसीदास के घर से निकलने के बाद रत्नावली ने स्त्री-धर्म का पालन कर अपने सद्गुण, सतीत्व और उपदेशों से पवित्र आचरण का आदर्श उपस्थित किया जिसमें उनके जीवन चरित्र में कष्ट-सहिष्णुता, स्वार्थत्याग, सेवा और चरित्र की पवित्रता प्रधान सद्गुण थे ओर रत्नावलि का चरित्र एक आदर्श मंजु मुकुर की भांति रहा है।
हिंदी साहित्य के इतिहास में रत्नावली का कोई चरित्र नहीं दिया गया है इस कारण इस कवयित्री की रचनाओं का तथा इन के चरित्र का वृत्तांत ज्ञात नही हो सका। जैसे तुलसीदास को लेकर उनके जन्मभूमि, जाति आदि के विषय में अनेक विवाद प्रचलित हैं, उतने ही भिन्न मत तुलसीदास की धर्म- पत्नी के बारे में भी है बताए गए है। रत्नावली के विषय में इतना ही कहा है कि तुलसीदास के वैराग्य लेने के बाद ही उनका देहांत हो गया जबकि अनेक प्रमाण मिले है की रत्नावली पति के वैराग्य के बाद वृद्धावस्था तक वियोग में जीवित रही ओर एक बार अपनी वृद्धावस्था में महात्मा तुलसीदास घूमते-घूमते अपने ससुर के घर पर अनजाने में या टिके । वहां तुलसीदास ने अपनी स्त्री को नहीं पहचाना परंतु उन की स्त्री ने उन्हें पहचान लिया। जब उस ने अपने को प्रगट किया और उन के साथ चलने का आग्रह किया, तो तुलसीदास ने उसे अपने साथ ले चलने से इन्कार कर दिया। कहा जाता है कि उस ने उस समय एक दोहा कहा जो तुलसी-कृत दोहावली में इस प्रकार है- खरिया खरी, कपूर सब, उचित न पिय तिय त्याग। कै खरिया मोहि मेलि कै, विमल विवेक विराग ॥ इससे जान पड़ता है कि तुलसीदास की स्त्री रत्नावलि परम विदुपी थी, ओर उनके द्वारा दो दोहों के संग्रह जिसमें 111 दोहे एवं दूसरे संग्रह में 201 दोहे है। रत्नावलि ने दोहों में अपना, अपने पति तुलसीदास का, तथा उन के चचेरे भाई नंददास का कई जगह परिचय दिया है।
रत्नावली द्वारा लिखित 'दोहों में कवयित्री ने अपने और गोस्वामी तुलसीदास के संबंध में भाव प्रकट किए हैं- जनम बदरिका कुल भई, हो पिय कंटक रूप। विधत दुखित है चलि गए, रतनावलि उर भूप ॥ इस से ज्ञात होता है कि रत्नावलि का जन्म 'बदरिका' स्थान में हुआ था। दीन बन्धु कर घर पली, दीनबन्धु कर छाँह । तोउ भई हो दीन अति, पति त्यागी मों बांह ॥ इस से ज्ञात होता है कि रत्नावलि 'दीनबंधु' नामक व्यक्ति के पर पली थी, ओर उस को पति ने त्याग दिया था। सनक सनातन कुल सुकुल, गेह भयो पिय श्याम । रतनावति आभा गई, तुम दिन बन सम गाँव॥ इस से ज्ञात होता है कि वह सनक सनातन के शुक्ल ब्राह्मण कुल में व्याही थी। दोहा - जासु दलहि लहि हरषि हरि, हरत भगत भव रोग। तासु दास पद दासि है, रतन लहत कत सोग॥ कर गहि लाए नाय तुम, बादन बहु बजवाय। परहु न परताये तजत, रतनावलिहि जगाय॥ उक्त दोहों से यह बात का भी प्रमाण मिलता है कि तुलसीदास ने रलावलि को सोता छोड़ कर गृहत्याग किया था। आगे रत्नावली अपनी व्यथा व्यक्त कर लिखती है कि –बरस बारही कर गह्यो सोरह गौन कराय। सताइत लागत करो नाथ रतन असहाय ॥ सागर' कर' रस' ससि रतन, संवत भो दुषदाय। पिय वियोग जननी मरन, करन न भूल्यो जाय॥ अर्थात-12 वर्ष की अवस्था में रत्नावलि का ब्याह हुआ, सोलह में गौना, और 27 वर्ष में पति-वियोग हुआ। यह घटना सं० 1627 की है उसी समय रत्नावली की माता का देहांत हुआ।
रत्नावलि को तुलसीदास ने उसके किसी अपराध के लिए नहीं त्यागा था, इस बात का रलावलि स्वयं एक दोहे में उल्लेज़ करती है। परंतु वह यह भी कहती है कि में ने इस प्रेग में कुछ साहस किया जिस का मुझे पश्चात्ताप है। वह साहस कदाचित तुलसीदास की अनुपस्थिति में अपने मायके बिना पूछे चले जाना था। उस ने भगवत-प्रेम से भवसागर पार करने की जो बात कही थी, वह भी किसी क्रोध में नहीं कही थी। परंतु उसे इस का उसे पश्चाताप था। देखिये दोहा- हों न नाथ अपराधिनी, तऊ छमा करि देउ । चरनन दासी जानि निज, बेगि मोरि सुध लेउ॥ धिक मो कहें मो बचन लगि, मोपति लह्यो बिराय। भई वियोगिनि निज करनि, रहूँ उड़ावति काग॥ हाय सहज ही हों कही, लह्यो बोध हिरदेस। हो रतनावलि जँचि गई, पिय हिय काँच विसेस॥ रत्नावति की कहानी सोरों जिला एटा तथा वहां के ग्रास पास के स्थानों में प्रसिद्ध है। उस के लिखे गए दोहे भी वहां कुछ बड़े-बूढ़ों को कंठस्थ हैं।
गंगा की धारा के पश्चिम में 'बदरिका' नामक एक छोटा सा गाँव में पंडित दीनबंधु पाठक नाम के एक परम विद्वान ब्राह्मण रहते थे। इन की धर्मपत्नी का नाम दयावती था। दीनबंधु पाठक के तीन पुत्र और एक पुत्री थी। कन्या का नाम रत्नावलि था। वह कन्या अपनी बाल्यावस्था ही से तीव्र बुद्धिवाली, रूपवती और सरल स्वभाव की थी। पिता ने उसे शास्त्र, वेद पुराण तथा पिंगल यादि का अध्ययन, बचपन से ही कराया था। बारह वर्ष की अवस्या में रत्नावली का विवाह तुलसीदास, उपनाम रामोला जो तब सोरों में नृसिह पंडित के यहां विद्याध्ययन करते थे से कर दिया। तुलसीदास और रत्नावलि का प्रेम-बंधन दिन-दिन दृढ़ होने लगा। दोनों सोरों में ही रहने लगे। तुलसीदास ओर रत्नावली के दाम्पत्य से उन के एक तारा नाम का पुत्र भी हुआ, परंतु वह बचपन में ही इस संसार से चल बसा। रत्नावलि को इस का बहुत दुःख हुआ। परंतु पत्ति के दुलार ने रत्नावलि के इस संतति-दुःख को भुला दिया। कवि मुरलीधर ने इसपर लिखा है--दम्पति बस बाराह धाम। लहत मोद आठोउ याम॥ कबहु करत विद्या बिनोद। लहत सबब चातुरि प्रमोद।। भक्तनु घर बांचहि पुरान। तुलसि लहि धन और मान।। रतनावलि तिहि चख चकोरि। मधुर बचन बोलत निहोरि॥ कबहु न अप्रिय कहति बात। कबहु न सो पति सों रिसात॥ करति सोइ जो पतिहि चाह। पति सेवन मन अति उछाह।। तारा पति नामक सपूत। भयो तासु बुधिबल अकूत॥ गयौ, देव गति सुरग धाम। विलपति रत्नावली वाम॥ भयो पुत्र को अधिक सोक। धरो धीर मुल पति विलोक ॥ब्याह भये दस पंच वर्ष इक दुख तजि बीते सहर्ष॥
विवाह के पंद्रह वर्ष बाद रत्नावली एक दिन श्रावण के महीने में राखी बाँधने अपने मायके गई। तुलसीदास जी कहीं पुराण की कथा कहने गए थे। जब ग्यारह दिन बाद वापस आाए तो उन का बिना पत्नी के, अकेले, सूने घर में जी न लगा। स्त्री की याद में रात को ही ससुराल चल दिए। भादों को काली रात थी। गंगा का प्रचंड वेग था ओर बाढ़ चड़ी हुई थी। इस भयंकर काली रात में गंगा को पार करके ससुर के घर पहुँचे। रत्नावली को ज्ञात हुआ कि उस के पति आए है, तो उसे बड़ा विस्मय हुआ, परंतु साथ में हुर्ष भी हुआ। जब वे मिले तो रत्नावलि ने इस काली अँधेरी रात में भादों की उमड़ती गंगा को पार कर आने का कारण पूछा तो तुलसीदास ने उत्तर दिया 'तुम्हारे प्रेम के सहारे'। ' रत्नावलि पंडिता थीं, काव्य- मर्मशा थी उसने पति से कहा में बड़ी भाग्यशालिनी हूं कि मुझे पति का इतना अगाध प्रेम मिला है। धन्य है प्रेम की महिमा ! मेरे प्रेम में आप ने गंगा की धार पार की, जगत कि धार के प्रेम से मनुष्य संसार-सागर से पार हो जाते हैं।
-तुलसीदास का भगवद्-प्रेमी हृदय स्त्री के मुख से इस ईश्वरोन्मुख प्रेम का संकेत पाकर राम-प्रेम से उमड़ने लगा। प्रेम के सहारे चढ़ी गंगा को पार करने के बाद, संसार- सागर पार करने का साहस प्रबल हुआ। स्त्री का प्रेम भगवद्-प्रेम में बदल गया । रत्नावली सो गई। उसी रात तुलसीदास जी सबको सोता छोड़ न जाने कहां चले गए । प्रातःकाल उन की खोज की गई परंतु कही पता न चला। इसी वियोग में साध्वी रत्नावलि सब श्रृंगारों का त्याग कर बहुत काल तक पति की पादुकाओं की पूजा करती हुई अपना जीवन व्यतीत करने लगी। देखे रत्नावली का लिखा दोहा- पति पद सेवा सों रहित, रतन पादुका सेई। गिरत नाव सों रज्जु तिहि, सरित पार करि देइ॥
"रत्नावली कभी अपने मायके में रहती और कभी अपनी ससुराल के संबंधियों में रह आती थी। उस का जीवन केवल प्रिय-वियोग वेदना और रुदन में ही बीता जिससे वह अपना ध्यानकर्षण कर पति- व्रत धर्म को धारण कर ईश्वर पूजन करती थी। उस का जीवन परोपकार और स्त्री- शिक्षा में व्यतीत होता था। उस ने स्त्रियों को उपदेश दिए। उस ने अपने चरित्र को उस उपदेश को चरितार्थ करने वाला बनाया; उस के नीति, उपदेश और आत्म-अभिव्यंजना से पूर्ण दोहों के मिलने से हिंदी साहित्य-निधि में अमूल्य रत्नों की वृद्धि हुई है। तुलसीदास को रत्नाबलि के इस तप और प्रेमयोग का परिचय किसी के द्वारा मिल चुका था तब तुलसीदास ने रत्नावलि के लिए एक उपदेशात्मक संदेश भेजा जिस का उल्लेख रत्नावली अपने एक दोहे में इस प्रकार करती है- मोइ दीनों संदेश पिय, अनुज नन्द के हाय। रतन समुझि जनि पृथक मोइ, जो सुमिरति रघुनाथ।। रत्नावलि एक कवयित्री थी जिसे आज तक हिन्दी साहित्य मे स्थान नही मिला है। उनका काव्य अपने पति की याद में हृदय के उद्गारों से प्रगट हुआ। उनके दोहों कवित्त में पति-मिलन की लालसा, उस के प्रति अपनी श्रगाध श्रद्धा, अपना पश्चात्ताप, पति भक्ति से अनुभव- जन्य उपदेश श्रादि भावों को काव्य में प्रकट किया है। रत्नावली के अनेक दोहों में वियोग वेदना की स्वाभाविक व्यंजना है। उस की कविता में कल्पना की बेसिर-पैर की उड़ान और अत्युक्तियां नहीं हैं। उस में सत्यता है, उस में शिवना है। वियोग में पति प्रेमयोग की साधना करती हुई रत्नावली कभी पश्चात्ताप करती है, तो कभी अपने को धिक्कारती है, कभी आत्म-प्रबोधन से अपने मन में संतोप और साहस भरती है। इस प्रबोधन में उस ने मनुष्य जीवन के अनेक साधारण अनुभवों को व्यक्त किया है।
रत्नावली के काव्य चित्रण में कवयित्री रत्नावली की कल्पना नहीं है, ये उनकी भाप बीती बातें हैं। इसलिए इन शब्द चित्रों में सच्ची वेदना है, जो पाठक के हृदय पर गहरी छाप छोड़ती है। पति के न होने पर हिंदू नारी की क्या गति होती है, यह सभी हिंदू जानते है। रत्नार्वाल ने यह सब यातनाएं झेलीं। इन यातनाओं के ताप ने उसे शुद्ध सोने के समान बना दिया-ज्यों ज्यों दुख भोगति तसहि, दूरि होत तब पाप । रतनावलि निर्मल बनत, जिमि सुबरन सहि ताप॥ रत्नावली अपने पति तुलसीदास को भगवान कि तरह पूजती थी देखे-राम जासु हिरवे बसत, सो पिय मम उर धाम । एक बसत बोऊ बसें, रतन भाग अभिराम ॥ अतएव रत्नावली की भक्ति ईश्वर के प्रति न होकर अपने लौकिक पति तुलसीदास की ओर ही थी, परंतु उस की भावुकता ओर विरह-वेदना मीरा की 'प्रेम पीर' के समान गंभीर थी किन्तु मीरा के लिए पति नहीं परमात्मा कृष्ण प्रमुख थे। अंत में यह कहा जा सकता है कि कवि तुलसीदास की धर्मपत्नी होने के कारण रत्नावलि के चरित्र का बड़ा महत्व है। इस के अतिरिक्त रत्नावली का काव्य ओर साहित्य प्रगट में लाना चाहिए ओर रत्नावलि के दोहों को आदर मिलना चाहिए ।
आत्माराम यादव पीव वरिष्ठ पत्रकार
श्रीजगन्नाथ धाम काली मंदिर के पीछे ग्वालटोली
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