नए साल के 90 प्रतिशत संकल्पों की ‘बाल-मृत्यु’ हो जाती है :स्नेहा सिंह
बलिया।। मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि नया साल वास्तव में नई संभावनाओं और नए अवसरों का प्रतीक माना जाता है। इसी वजह से लोग नए साल में नए काम करने के संकल्प लेते हैं या दूसरों से भी दिलवाते हैं। हर दस में से एक यानी लगभग 8 प्रतिशत लोगों के संकल्प एक महीना भी नहीं टिकते। 21.9 प्रतिशत लोगों के संकल्प दो महीनों में दम तोड़ देते हैं। 22.2 प्रतिशत लोग तीन महीनों में सब कुछ छोड़ देते हैं। 13.1 प्रतिशत लोग चार महीने तक खींचते हैं, लेकिन फिर पुराने ढर्रे पर लौट आते हैं। हमारे पास सफलता की पूरी संभावना होती है, लेकिन मन में बैठे डर, खासकर बदलाव के काल्पनिक डर के कारण हम अपनी क्षमता नहीं बढ़ा पाते और संकल्प-पूर्ति संभव नहीं हो पाती। वास्तव में लोगों को ऐसे रास्ते खोजने चाहिए, जो लंबे समय तक चलने वाले हों, कम दबाव वाले हों, चरणबद्ध परिणाम दें और आनंद के साथ संकल्प-पूर्ति संभव बनाएं। इससे दीर्घकाल में लक्ष्य हासिल होगा और अल्पकाल में संकल्प से ऊबकर छोड़ देने का विचार नहीं आएगा।
नई आशाओं, नए उत्साह और नए संकल्पों के साथ नए साल की शुरुआत हो चुकी है। दुनिया ने 2026 के मंगलगीत गाकर, विभिन्न क्षेत्रों में नए आशावाद का संचार करते हुए, रोजमर्रा की जिंदगी को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया है। इस नए साल में दुनिया भर के करोड़ों लोगों ने अच्छे स्वास्थ्य, बेहतर आर्थिक स्थिति, बेहतर सामाजिक स्थिति और अनेक अन्य बातों के लिए संकल्प लिए होंगे।
इस बार तो वजन कम करके ही रहेंगे, इस बार सिक्स पैक एब्स बनकर ही रहेंगे, इस साल के अंत तक एक करोड़ का मुनाफा होना ही चाहिए, इस साल कंपनी का सीईओ बनना ही है, इस बार दो प्रमोशन लेने हैं, इस साल परिवार को समय देना है, दो-तीन वेकेशन एंजाय करने हैं,
ऐसे अनेक संकल्प लोगों ने लिए होंगे और अभी भी ले रहे होंगे। लेकिन ये सभी संकल्प अक्सर केवल कहने के जोश और दिखावे तक ही सीमित रहते हैं। सरल शब्दों में कहें तो ये बरसात में दिखाई देने वाले पंखों वाले कीड़ों की तरह अल्पजीवी होते हैं। जानकार मानते हैं कि नए साल में दुनिया भर में लिए जाने वाले संकल्प या नई चुनौतियां प्रायः अल्पकालिक होती हैं।
इन सभी संकल्पों में से 90 प्रतिशत संकल्प एक महीना पूरा होते-होते या अधिकतम तीन महीनों के भीतर ही दम तोड़ देते हैं। गिने-चुने लोग ही इन्हें लंबे समय तक खींच पाते हैं और बहुत ही कम लोग पूरे साल अपने तय किए काम को पूरा कर पाते हैं।
लोग वास्तव में ऐसे संकल्प क्यों लेते हैं और ये संकल्प लंबे समय तक क्यों नहीं टिकते या लोग इन्हें पूरा क्यों नहीं कर पाते, इसका ठोस कारण अक्सर हम खुद नहीं जानते।
उल्लेखनीय है कि सबसे पहले हमें नए साल के इस ऊर्जा भरे संकल्पों की मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि समझनी चाहिए। जानकार मानते हैं कि पुराने साल की विदाई और नए साल के स्वागत के दौरान हम लगातार लोगों से जुड़े रहते हैं। उस दौरान उनकी बातें, उनके संकल्प, हमें आने वाले फोन, मैसेज, व्हाट्सएप और सोशल मीडिया का कंटेंट, ये सब हमें भी ऐसे संकल्प लेने के लिए प्रेरित करते हैं। आखिर ऐसा क्या है कि केवल तारीख बदलती है, नए साल का पहला दिन आता है और लोग धड़ाधड़ संकल्प लेने लगते हैं?
कई मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि नया साल वास्तव में नई संभावनाओं और नए अवसरों का प्रतीक होता है। इसी वजह से लोग नए साल में नए काम करने का संकल्प लेते हैं या दूसरों से भी दिलवाते हैं। लोगों को लगता है कि बदलाव का यह संकल्प उन्हें प्रेरित करता रहेगा और पूरे साल वे कड़ी मेहनत करके उसे हासिल करेंगे।
दूसरी ओर कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि लोग संकल्प इसलिए लेते हैं, क्योंकि इससे उनमें आशावाद पैदा होता है और अपनी जिंदगी पर नियंत्रण होने की भावना आती है।
वास्तव में यह मनोभाव में पैदा होने वाली एक प्रक्रिया है। आप जब एक बार संकल्प लेते हैं तो आपका मन खुद-ब-खुद आपको प्रोत्साहित करने लगता है। आप आशावादी और आत्मविश्वासी महसूस करने लगते हैं। व्यक्ति के मन में यह भाव आता है कि हम स्वाभाविक रूप से कितने विकसित हो रहे हैं, बेहतर बन रहे हैं और हमारे विचारों तथा कर्मों के बीच सामंजस्य बन रहा है। दूसरी ओर जब पुराना साल समाप्त होने लगता है तो हमें अपराधबोध भी महसूस होता है।
हम सोचते हैं कि साल कैसा होना चाहिए था, हमने कैसा काम किया, क्या बिगड़ा, हमने क्या पाया और क्या खोया। इसी के परिणामस्वरूप हम आने वाले समय को बेहतर बनाने के बारे में सोचने लगते हैं। हम अचानक पुराने साल, उसके कामकाज और असफलताओं से नाता तोड़ लेते हैं और कुछ नया करने के लिए तैयार हो जाते हैं।
महत्वपूर्ण बात यह है कि अधिकांश विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसे सभी संकल्प अल्पजीवी होते हैं। वे लंबे समय तक टिक नहीं पाते। दुबला होना, मोटा होना, सिक्स पैक बनाना, नई गाड़ी लेना, घर खरीदना, व्यवसाय बढ़ाना, प्रमोशन पाना, ये सभी काम अक्सर पूरे नहीं हो पाते।
उल्लेखनीय है कि 2024 में नए साल के संकल्पों पर एक अध्ययन किया गया था। इसके निष्कर्ष बेहद रोचक थे। इसमें बताया गया कि अधिकांश नए साल के संकल्प दो से चार महीनों से अधिक नहीं टिकते।
लोग या तो भूल जाते हैं या छोड़ देते हैं। अध्ययन के अनुसार, हर दस में से एक यानी लगभग 8 प्रतिशत लोगों के संकल्प एक महीना भी नहीं टिकते। 21.9 प्रतिशत लोग दो महीनों में हार मान लेते हैं। 22.2 प्रतिशत लोग तीन महीनों में सब कुछ छोड़ देते हैं। 13.1 प्रतिशत लोग चार महीने तक प्रयास करते हैं, लेकिन फिर पुराने ढर्रे पर लौट आते हैं। केवल 8 से 10 प्रतिशत लोग ही पूरे साल अपने संकल्प पर टिके रहते हैं और उसे पूरा कर पाते हैं या पूरा करने का गंभीर प्रयास करते हैं।
अधिकांश मनोवैज्ञानिक और विशेषज्ञ मानते हैं कि संकल्प पूरे न होने का एक बड़ा कारण अवास्तविक महत्वाकांक्षा है। नए साल के संकल्प लेते समय लोग इतने बड़े बदलाव तय कर लेते हैं, जिन्हें पूरा करना उनके लिए संभव ही नहीं होता, जैसे शरीर में बड़ा बदलाव करना, नींद की आदतें पूरी तरह बदलना, नई भाषाएं सीखना, व्यापार को दोगुना करना आदि। ये बदलाव इतने बड़े होते हैं कि शुरुआत में ही व्यक्ति हतोत्साहित हो जाता है।
बहुत कम लोग टिक पाते हैं और इसे आगे बढ़ा पाते हैं। लोगों को बड़े लक्ष्य रखना अच्छा लगता है। उन्हें लगता है कि बड़ा संकल्प लेने से समाज में उनकी वाहवाही होगी। व्यक्ति खुद भी बड़े बदलाव की उम्मीद में जोश से भर जाता है। लेकिन जब लक्ष्य की दिशा में काम शुरू होता है, तब समझ आता है कि ये संकल्प किसी बड़े लक्ष्य से ज्यादा रोजमर्रा की आदतों से जुड़े बदलाव हैं। और रोजमर्रा के बदलाव हमें पसंद नहीं आते। हमें अनुशासन और मेहनत भरे काम अच्छे नहीं लगते, इसी कारण संकल्प अधूरे रह जाते हैं।
संकल्प-पूर्ति के लिए असुविधा सहनी पड़ती है और लोग इसके लिए तैयार नहीं होते। व्यवहार परिवर्तन के विशेषज्ञ मानते हैं कि रोजमर्रा के जीवन में लिए गए संकल्प हमारी दैनिक जिंदगी में बदलाव लाते हैं। लेकिन जैसे ही हम रोजमर्रा की आदतों में बदलाव करने लगते हैं, हमें असुविधा महसूस होने लगती है। हम लगातार असुविधा सहना पसंद नहीं करते। लोग इसके लिए तैयार नहीं होते और इसी कारण वे संकल्प पूरे नहीं कर पाते या दो-चार महीनों में ही छोड़ देते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार सबसे बड़ा कारण यह है कि हम खुद से यह सवाल नहीं करते कि हमें अपने जीवन में यह खास बदलाव क्यों चाहिए। सबसे पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि बदलाव वास्तव में चाहिए भी या नहीं। अगर बदलाव चाहिए तो इतना बड़ा बदलाव क्यों ज़रूरी है, इसका स्पष्ट कारण होना चाहिए। जब तक अपने जीवन में बदलाव लाने का ठोस कारण हमें खुद नहीं मिलता, तब तक हम संकल्प सिद्धि तक नहीं पहुंच सकते।
एक और समस्या यह है कि संकल्प लेने के बाद उसे पूरा करने के लिए हम सबसे तेज और सबसे असरदार रास्ता चुन लेते हैं और यहीं हम चूक जाते हैं। जिस पुराने ढर्रे में हम वर्षों से जीते आए हैं, उसमें अचानक बदलाव करना हमारे लिए सहन करना कठिन हो जाता है। परिणामस्वरूप हम नए साल के संकल्प पूरे नहीं कर पाते। लोगों को तेज, प्रभावी और कम समय में ज्यादा लाभ देने वाले रास्ते चाहिए होते हैं।
वास्तव में उन्हें ऐसे रास्ते अपनाने चाहिए जो धीरे-धीरे परिणाम दें, कम दबाव वाले हों, चरणबद्ध हों और आनंद के साथ संकल्प-पूर्ति संभव बनाएं। इससे दीर्घकाल में लक्ष्य हासिल होगा और अल्पकाल में संकल्प से ऊबकर उसे छोड़ देने का विचार नहीं आएगा। कई मामलों में अचानक आने वाले बदलाव या संभावित बदलाव की स्वीकृति का डर भी होता है। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि हमारे पास सफलता की पूरी संभावना होती है, लेकिन मन में बैठे डर, खासकर बदलाव के काल्पनिक डर के कारण हम अपनी क्षमता को बढ़ा नहीं पाते और संकल्प-पूर्ति संभव नहीं हो पाती।
स्नेहा सिंह
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