Breaking News

जब विधानसभा चुनाव हो सकते हैं तो ददरी मेला क्यों नहीं :शशिकांत ओझा

 



-कोविड-19 को लेकर जिला प्रशासन ने आयोजन निरस्त करने का लिया है निर्णय


बलिया : कोविड-19 से लोगों की सुरक्षा का हवाला देते हुए जिला प्रशासन ने पूर्वांचल के बलिया में लगने वाले एतिहासिक ददरी मेला के आयोजन कोइस वर्ष निरस्त कर दिया है. जिला प्रशासन के इस निर्णय से जनपदवासियों में काफी आक्रोश है. हालांकि प्रशासन ने यह कहा है कि कार्तिक पूर्णिमा स्नान पर रोक नहीं रहेगी. यह आयोजन कोविड प्रोटोकॉल का पालन करते हुए होगा. जिला प्रशासन के इस निर्णय पर लोगों का कहना है कि अगर सटे प्रांत में विधानसभा चुनाव हो सकते हैं तो पौराणिक मान्यताओं वाला ददरी मेला क्यों नहीं. 

सनद रहे कि बलिया का ऐतिहासिक ददरी मेला अनादि काल से आयोजित होता रहा है. इसकी पृष्ठभूमि कुछ इस प्रकार है

अनादि काल में त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) में मुख्य देवता के चयन के लिए आयोजित धर्मसभा में ब्रह्मा के मानस पुत्र महर्षि भृगु को यह जिम्मेदारी दी गई. महर्षि भृगु ने भगवान शंकर की परीक्षा ली तो वे क्रोधित हो गए. ब्रह्मा जी भी उनकी परीक्षा में फेल हो गए. जब महर्षि भगवान विष्णु की परीक्षा लेने गए तो वे क्षीरसागर में शेष शैय्या में सो रहे रहे थे. महर्षि को क्रोध आ गया और वे यह कहते हुए विष्णु की छाती पर पद प्रहार कर दिया कि यदि प्रजा का पालक ऐसे सोएगा तो प्रजा का पालन कैसे होगा. भगवान विष्णु पद प्रहार से जगे तो महर्षि का पैर सहलाने लगे. कहा कि प्रभु मेरी छाती वज्र की है. कहीं आपको चोट तो नहीं आयी. भगवान विष्णु की इस उदारता से भृगु प्रभावित हुए और उन्हें श्रेष्ठ देव की उपाधि दे दी. सरस्वती के तट पर आयोजित धर्म संसद में महर्षि भृगु ने जब परीक्षा और परीक्षा विधि की चर्चा की तो वहां मौजूद ऋषियों को इससे अफसोस और ग्लानि हुई. सभी ने महर्षि भृगु को इस पाप के पश्च्याताप के लिए तपस्या करने का निर्देश दिया. अब विषय था कि तपस्या का स्थल कौन सा होगा. इसके लिए ऋषि श्रेष्ठों ने भूमि शोधन के पश्चात गंगा तट पर बलिया का स्थान उचित पाया. महर्षि भृगु ने 88 हजार वर्ष तक लगातार तप किया और तपस्या पूर्ण होने तथा पाप से मुक्ति के पश्चात यहां एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया. इस यज्ञ में तब के धरा भूखंड के कुल 88 लाख ऋषियों ने सहभाग किया. कार्तिक पूर्णिमा के दिन यज्ञ हुआ और तब से अब तक उसी यज्ञ की वर्षगांठ स्वरूप यहां कार्तिक पूर्णिमा का स्नान और मेला आयोजित होता है. जिसे कालांतर में महर्षि भृगु के अनन्य शिष्य दर्दर मुनि के नाम पर ददरी मेला का नाम दे दिया गया. इस मेले की ऐतिहासिकता इससे भी प्रमाणिक होती है कि चीनी यात्री फाह्यान ने अपनी पुस्तक में बलिया के ददरी मेले का जिक्र किया है.  ददरी मेला धार्मिक सांस्कृतिक और व्यवसायिक दृष्टि से कितना महत्वपूर्ण है इस पर भी यहां कुछ प्रकाश डालना आवश्यक है. कार्तिक पूर्णिमा स्नान का महात्म्य इससे भी लिया जा सकता है कि पद्मपुराण में इस बात का उल्लेख है कि धर्म नगरी काशी में 84 हजार वर्ष प्रवास करने का पुण्यलाभ उतना ही है, जितना कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा में स्नान कर भृगु दर्शन का है. इसी को आधार मानकर प्रत्येक  वर्ष यहां लाखों ऋषि मुनि और श्रद्धालु धर्म की डुबकी लगाते हैं और भृगु का दर्शन करते हैं. सभी इसे अपने जीवन की बड़ी उपलब्धि भी मानते हैं.  इस मेले के सांस्कृतिक आयोजन की बुनियाद भी लगभग ढाई सौ वर्ष पुरानी है. वर्ष 1884 में महान कवि भारतेंदु हरिश्चंद्र ने इस मेले के मंच में नाटक सत्य हरिश्चंद्र नाटक का मंचन किया था. तभी से इस मंच को भारतेंदु कला मंच नाम दिया गया. इस मंच पर गंगा जमुनी तहजीब के तहत अखिल भारतीय कवि सम्मेलन, आल इंडिया मुशायरा, लोक संस्कृति, धर्म-कर्म, दंगल सहित अन्य खेलों का आयोजन प्रतिवर्ष होता है. यहां यह भी अवगत कराना आवश्यक होगा कि इस मेले में देश स्तरीय गर्दभ मेले का आयोजन होता है. इस मेले में देश भर के रजक (धोबी)समाज के लोग एकत्र होते हैं और अपने पुत्र-पुत्रियों की शादी तय करते हैं. साथ ही अपने जीविकोपार्जन के मुख्य साधन गदहा और खच्चर की खरीद-बिक्री भी करते हैं. यह मेला व्यवसायिक दृष्टि से इसलिए महत्वपूर्ण है कि देश भर के रोजगार करने वाले व्यापारी अपने उत्कृष्ठ उत्पादों के साथ मेले में आते हैं और जिला प्रशासन के निर्देश पर लंबी अवधि तक इसकी बिक्री करते हैं. देश भर से लोगों के आने के कारण यहां संस्कृतियों के आदान-प्रदान के साथ ही कुटीर उद्योग, हथकरघा और हस्तशिल्प से निर्मित उत्पादों के करोड़ों का बाजार मिलता है. यहां देश भर की नर्सरी भी अपने पौधों के साथ आती हैं. इस मेले में नंदी ग्राम के नाम से एक बड़ा पशु मेला आयोजित होता है. जिसमें दुधारू पशुओं के साथ ही साथ बैल, बछिया(गो-वंश), पड़िया (महीष-वंश) के साथ साथ घोड़ों की खरीद बिक्री होती है ।


शशिकांत ओझा वरिष्ठ पत्रकार

बलिया ,मोबाइल 7489697916