शिव महापुराण के सातवे व अंतिम दिन पंडित प्रदीप मिश्रा ने बतलाया : भक्ति से ही मिलती है संसार से मुक्ति
जगतगुरु 1008 श्री सतुआ बाबा, मंत्री डॉ संजय निषाद, मंत्री विजय लक्ष्मी गौतम, जिला सहकारी बैंक उन्नाव के चेयरमैन अरुण सिंह भी रहे मौजूद
पंजीकरण कराने वालों के घर निःशुल्क एक लोटा जल पहुंचाएंगे परिवहन मंत्री
मधुसूदन सिंह
बलिया।। बाबा बालखंडी नाथ दिउली के सानिध्य मे परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह के आयोजकत्व मे पिछले सात दिनों से चल रही शिव महापुराण की कथा का आज विश्राम हो गया। इस अवसर पर परिवहन मंत्री की तरफ से जहां कथावाचक पंडित प्रदीप मिश्रा जी को एक फोन मे बलिया आकर कथा कहकर पूरे जनपद ही नहीं कई प्रदेशो के शिव भक्तों के जीवन को धन्य करने के लिये आभार व्यक्ति किया, तो वही यह भी घोषणा की कि आगामी 2029 के अधिक मास मे एक बार फिर गुरुदेव पंडित प्रदीप मिश्रा जी के श्रीमुख से शिव महापुराण की कथा का आयोजन किया जायेगा। परिवहन मंत्री ने साथ ही कथा पांडाल मे पधारे प्रदेश सरकार के मंत्री डॉ संजय निषाद और मंत्री विजय लक्ष्मी गौतम का और वाराणसी से आये जगदगुरु 1008 श्री सतुआ बाबा का अभिनन्दन व आभार व्यक्ति किया। इसके साथ ही जिला सहकारी बैंक उन्नाव के चेयरमैन अरुण सिंह का भी अभिनन्दन किया।
कथा के आखिरी दिन पंडित प्रदीप मिश्रा ने भक्ति के माध्यम से मुक्ति कैसे प्राप्त की जा सकती है, उसको विभिन्न प्रसंगो के माध्यम से समझाया। कहा कि पहले के समय मे तीर्थ करने जाने वालों को जरूरत के सारे सामान अपने साथ लेकर जाना पड़ता था। लेकिन आजकल ये सब करने की जरूरत नहीं पड़ती है। आज आप तीर्थ मे निकलते है तो आपकी जेब मे पैसा है तो सब आवश्यक चीजे आप खरीद सकते है।
कहा कि जिस तरह आपकी जेब मे पैसा होने पर आप कही की भी यात्रा सकुशल कर लेते है। जिस तरह से अस्प्की जेब का पैसा आपको यात्रा करा देता है, उसी तरह अगर आपके हृदय मे शिव का वास है तो आप इस भवसागर की यात्रा सकुशल पूर्ण करके मुक्ति प्राप्त कर सकते है।
पंडित मिश्रा ने भगवान कार्तिकेय की माता पार्वती व पिता शिव को प्रणाम करके श्री शैलम पर्वत जाने की यात्रा के दौरान मिले अनुभव को साझा किया। कहा कि कार्तिकेय जी का ध्यान तीन दृश्यों ने अपनी तरफ खिंचा। पहला दर्शन वन क्षेत्र का हुआ। कार्तिकेय जी सोचने लगे कि इतना विशाल और हरा भरा वन किसने लगाया? यहां तो कोई वन का माली भी नहीं दिखायी दे रहा है।
दूसरा दृश्य पक्षियों का, श्री कार्तिकेय जी को आश्चर्य मे डाल रहा था। तीसरा दृश्य पशुओं को देखने के बाद कार्तिकेय जी अचंभित हो रहे थे। सोच रहे थे कि यहां तो कोई मनुष्य दिखायी नहीं दे रहा है फिर भी इतना विकास कैसे?विचार करने लगे कि वन क्षेत्र के एक एक पत्ते, एक एक पक्षियों और एक एक पशुओं के अंदर किसका निवास है?
सूच्य हो कि 84 लाख योनियों मे से मात्र मानव योनी ही ऐसी है जो नौकरी करती है, परिवार बनाती है, घर बनाती है और भक्ति के मार्ग पर चलकर इस भव सागर से पार उतर जाती है।
बलिया क्यों है भृगु ऋषि की जन्मभूमि
पहले दिन की कथा मे पंडित प्रदीप मिश्रा द्वारा बलिया को भृगु मुनि की जन्मभूमि कहा गया था। जिसको लेकर सोशल मीडिया पर छिछले ज्ञान वालों पंडित प्रदीप मिश्रा के ज्ञान को लेकर तरह तरह की टिप्पणी की थी। यहां तक कह दिया था कि पंडित प्रदीप मिश्रा भृगु बाबा का बर्थ सर्टिफिकेट लेकर आये है। कथा के अंतिम दिन पंडित प्रदीप मिश्रा ने एक प्रसंग के माध्यम से उत्तर देकर सोशल मीडिया पर ज्ञान बघारने वालों को करारा जबाब दिया है।
श्री मिश्रा ने माता पार्वती को बताया कि पार्वती, मनुष्यों के चार जन्म होते है। पहला जन्म तब होता है जब वह मां के गर्भ से बाहर निकलता है। दूसरा जन्म तब होता है जब उसका विवाह होता है और वह पति पत्नी बन जाता है। तीसरा जन्म तब होता है जब वह पिता माता बनता है और चौथा जन्म तब होता है जब वह अपनी साधना तपस्या से, भक्ति से भावसागर से मुक्त हो जाता है। इस लिये भृगु मुनि का जन्म कही हुआ हो, यह मायने नहीं रखता है, बलिया की भूमि पर उन्होंने तपस्या करके सिद्धि हासिल की, इस लिये शिव महापुराण के अनुसार, भगवान भोलेनाथ के अनुसार एक ऋषि के रूप मे बलिया ही उनकी जन्मभूमि है।
बताया क्यों है 7 का महत्त्व
प्रदीप मिश्रा ने कहा कि क्या कभी आप लोगों ने विचार किया है कि क्यों शिव महापुराण की कथा हो, श्रीराम की कथा हो, श्रीमदभागवत की कथा हो सात दिन की ही होती है? कहा कि दिनों की संख्या 7 होती है, मनुष्य का जन्म भी सात दिनों के किसी न किसी दिन को होता है। भगवान श्रीकृष्ण ने 7 वर्ष की आयु मे ही 7 कोस मे फैले गोवर्धन पर्वत को सात दिनों तक उठाया था। इसी लिये कथा का श्रवण सात दिनों का ही होता है।
भगवान को पूर्णता पसंद
पंडित प्रदीप मिश्रा ने बताया कि मंदिर मे या किसी विशेष अनुष्ठान मे चढ़ाये गये नारियल को फोड़ने पर सड़ा निकलना शुभ संकेत होता है। कहा कि भगवान चाहते है कि मेरा भक्त मेरे साथ पूर्ण समर्पण करें। अगर आपकी भक्ति, पूजा मे पूर्ण समर्पण होगा तो भगवान भी आपके द्वारा चढ़ाये गये नारियल को पूर्ण रूप से स्वीकार कर लेगा। जब नारियल भगवान द्वारा पूर्ण रुप से स्वीकार किया जाता है तो उसके अंदर कुछ बचता ही नहीं है।
भगवान को नीचा दिखाना इनको पड़ा था भारी
पंडित प्रदीप मिश्रा ने कहा कि कभी भी भगवान को नीचा दिखाने या अपशब्द बोलने का प्रयास नहीं करना चाहिये। ऐसा प्रयास जिसने किया है, उसको इसका दंड जरूर मिला है। कहा कि राजा दक्ष अपनी पुत्री माता सती का विवाह शिव से नहीं करना चाहते थे लेकिन माता तो शिव से प्यार करती थी। पिता के लाख अड़चन डालने के बाद भी माता सती का शिव जी से ही विवाह हुआ। राजा दक्ष ने माता सती के विवाह का स्वयंबर सजाया और भोलेनाथ को नीचा दिखाने के लिये इनकी प्रतिमा दरवाजे पर खड़ी करा दी जिससे उनका उपहास हो। दक्ष चाहते थे माता सती का विवाह श्री नारायण से हो। लेकिन माता सती ने वरमाला भोलेनाथ की प्रतिमा को ही पहना दी। दक्ष प्रजापति हमेशा शिव को बुरा भला कहते थे, उस लिये उनको बकरे का मुख लग गया।इसी तरह से नारद जी भगवान विष्णु को नीचा दिखाना चाहते थे तो उनको बंदर का मुख मिल गया।
भक्ति की शक्ति से तैरने वाला नहीं डूबता भवसागर मे
पंडित प्रदीप मिश्रा ने कहा कि यह संसार तरह तरह की बाधाओ से युक्त है। मानव योनी मे जन्म लेने के बाद हमें तरह तरह के कष्टों से जूझना पड़ता है। इस संसार से मुक्ति का मार्ग भक्ति ही ही। अगर हम सबको एक बड़े से सागर या नदी मे फेक दिया जाय, तो उसमे से वो लोग जीवित बच जायेंगे जिनको तैरना आता है। उसी प्रकार इस संसार रूपी भावसागर से पार निकलने का एक ही रास्ता है शिव भक्ति। अगर आपके हृदय मे शिव विराजमान है तो चाहे कितना भी बड़ा भवसागर होगा मेरा शिव उससे पार जरूर निकाल देता है।
कथा के विश्राम से पहले पंडित प्रदीप मिश्रा ने संक्षेप चंचूला के पति बिन्दुक की मुक्ति और 12 ज्योतिर्लिंग के दर्शन और उनके नामकरण का संक्षिप्त इतिहास बताया। भगवान शिव की आरती के बाद बलिया के दिउली मे चल रही अधिक मास की शिव महापुराण की कथा को विश्राम दिया गया।










