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पांचवे दिन की कथा मे पंडित प्रदीप मिश्रा ने समझाया केवल शिव का ही क्यों कहलाता है परिवार? जमीन पर बैठकर परिवहन मंत्री ने सुनी कथा

 



मधुसूदन सिंह 

बलिया।। परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह के द्वारा करायी जा रही शिव महापुराण की कथा के पांचवे दिन पंडित प्रदीप मिश्रा ने उदाहरण के द्वारा समझाया कि क्यों देवाधिदेव महादेव का ही परिवार कहा जाता है, भगवान विष्णु, ब्रह्मा जी और देवराज इंद्र आदि के परिवार को परिवार नहीं कहा जाता है।

कथा के पांचवे दिन परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह, इनके अनुज धर्मेंद्र सिंह, माता तेतरी देवी के साथ ही परिवार के अन्य सदस्यों ने व्यासपीठ का पूजन अर्चन करने के बाद पंडित प्रदीप मिश्रा जी का अभिनन्दन किया।

कथा का शुभारम्भ पंडित प्रदीप मिश्रा ने शिव की शरणागति की क्या महिमा होती है, को समझाया। कहा कि संसार मे माता पिता गुरु और शिव की शरण मे रहता है, उसका जीवन धन्य हो जाता है। कहा कि जिस तरह मछली जब तक जल मे रहती है वह जीवित रहती है। जल से बाहर निकलने पर उसका जीवन समाप्त हो जाता है। यानि जबतक जल की शरणागति मे मछली रहती है, तब तक उसका जीवन संरक्षित रहता है।






इसी तरह अगर जन्म के बाद मनुष्य माता पिता की शरण मे रहता है, तब तक वह जीवन का सारा सुख आनंद प्राप्त करता है। गुरु की शरण मे जाकर वह शिव की शरण मे जाने का मार्ग प्रशस्त कर लेता है। अगर मनुष्य अपने माता पिता की भी शरणागति मे रहता है, तो भी उसका जीवन धन्य होता है। कहा ही गया है कि मां के चरणों मे जन्नत होती है। वैसे ही जो गुरु और शिव की शरणागति मे चला जाता है, वह जीवन के हर संकटो को पार कर लेता है। इन चारो की शरणागति मे ही जीवन की सार्थकता है।

जिस तरह से वृक्ष की छाँव मे बैठने पर सुकून मिलता है, शांति मिलती है, उसी तरह से माता पिता गुरु व शिव वो वृक्ष है जिनकी शरण मे जीवन का सबसे बड़ा सुख है। वृक्ष की हरियाली मिट्टी की शरणागति के कारण होती है। पानी समुद्र की शरणागति मे विशालता और सुख हासिल करता है।समुद्र पृथ्वी की शरणागति के कारण अपना विशाल साम्राज्य बनाता है। हमको यह तय करना है कि हम किसकी शरणागति स्वीकार करते है।

संगति से बढ़ती है क़ीमत 

पंडित मिश्रा ने कहा कि किसी की भी क़ीमत उसके संगति व शरणागति पर निर्भर करती है। कहा कि एक मक्खी जब फल सब्जी मिठाई पर बैठती है तो उसकी कोई क़ीमत नहीं होती है लेकिन यही मक्खी जब सोना और हीरा तौलने वाली तराजू पर बैठ जाती है तो उसकी भी क़ीमत सोना व हीरा के बराबर हो जाता है। उसी तरह अगर जो मनुष्य शिव की शरण मे चला जाता है उसकी क़ीमत शिव जैसी हो जाती है।

परिवहन मंत्री ने जमीन पर बैठ कर सुनी कथा 

शिव महापुराण की चल रही कथा के पांचवे दिन मासिक शिवरात्रि पड़ने के बाद पांडाल मे जबरदस्त शिव भक्त महिलाओं की भीड़ उमड़ पड़ी। पांचवे दिन लगभग पांच लाख शिव भक्तों की भीड़ बतायी जा रही है। इस कथा की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें कथा सुनने वालो मे 99.99प्रतिशत महिलाओं की है। इतनी महिलाओं की भीड़ बलिया मे अब तक हुई किसी भी कथा मे नहीं हुई है। आज का आलम यह था कि परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह, महिला आयोग की सदस्य सुनीता श्रीवास्तव को जमीन पर बैठ कर कथा का श्रवण करना पड़ा।

महिलाओं के वापस लौटने की खबरें पूरी तरह निराधार 

कुछ यूट्यूब चैनल के पत्रकार जगह न मिलने पर श्रद्धालु महिलाओं के वापस लौटने की खबर सोशल मीडिया पर चलायी गयी है, जो पूरी तरह से बेबुनियाद है। जो तथाकथित पत्रकार महोदय आरोप लगा रहे है, उनके ऊपर ही सेवादारों ने गंभीर आरोप लगाया है। कहा कि आरोप लगाने वाले तथाकथित पत्रकार साहब अपने साथ 10 लोगों का प्रवेश चाहते थे जबकि प्रशासनिक लोगों ने दो से तीन लोगों को ही अंदर जाने देने की बात कही थी, जिससे वो नाराज हो गये और वापस जाकर अनर्गल आरोप लगाये है।

खबर चलाने वाले पत्रकार को हकीकत आकर पांडाल के पास देखनी चाहिये थी, जिसके बाहर लाखों महिला शिवभक्त खड़े होकर कथा सुन रही है। शिव की सबसे बड़ी भक्त महिलाये ही होती, उनको सुविधा नहीं केवल कथा चाहिये।


कृष्ण क्यों बार बार जाते थे द्रौपदी के पास 

महाभारत की कथा के माध्यम से पंडित प्रदीप मिश्रा ने समझाया कि कैसे भगवान की शरण मे चले जाने पर भगवान खुद भक्त की हमेशा चिंता करते है। बताया कि एक बार सत्यभामा को संशय हुआ कि क्यों कृष्ण बार बार द्रौपदी के पास जाते है। यही बात सत्यभामा ने रुक्मिणी से भी कही। भगवान श्रीकृष्ण भांप गये कि इन लोगों को संशय हो गया है। जब वो द्रौपदी के पास जाने लगे तो बोले द्रौपदी के पास जा रहा हूं किसी को चलना है? रुक्मिणी और सत्यभामा दोनों भी साथ चल दी। जब तीनों लोग द्रौपदी के पास पहुंचे तो द्रौपदी अपना केश संवार रही थी। श्री कृष्ण ने कहा -द्रोपदी आज तुम्हारा केश तुम्हारी भाभियाँ संवारेगी। सत्यभामा को अच्छा मौका मिला। उसने केश संवारते समय एक बाल खिंचा तो आवाज आई हे कृष्ण। सत्यभामा डर गयी।

तब श्री कृष्ण ने दोनों का संशय दूर करते हुए कहा कि द्रौपदी के पूरे साढ़े तीन करोड़ रोम छिद्र केवल हे कृष्ण का ही जाप करते है, इसी लिये जब भी द्रोपदी का कोई रोम छिद्र हे कृष्ण कहता है, मै दौड़ा दौड़ा द्रौपदी के पास पहुंच जाता हूं।

यह प्रसंग यहै समझाता है कि जो प्रभु की शरणागति मे चला जाता है, प्रभु /शिव उसकी सुधि लेने खुद उसके पास चले जाते है। इसके साथ ही श्री मिश्रा ने माता पार्वती के बालपन मे पार्थिव शिवलिंग बनाने और अपने पिता हिमालय राज को बताना कि आज मैंने शिव लिंग बनाया है, अब यही शिवलिंग मुझे मंजिल तक पहुँचायेगा।

शिव का ही क्यों कहलाता है परिवार 

पंडित प्रदीप मिश्रा ने कहा कि एक बार देवराज इंद्र ने देवर्षि नारद से पूंछा कि मुनिवर -विष्णु  भगवान का परिवार परिवार नहीं होता है, ब्रह्मा जी का परिवार परिवार नहीं है, मेरा परिवार परिवार नहीं है लेकिन क्या कारण है कि शिव का परिवार ही परिवार कहलाता है।

देवर्षि नारद ने इंद्र को अपने साथ लेकर ब्रह्मा जी के पास गये। ब्रह्मा जी के साथ ब्राह्मणी सरस्वती भी बैठी थी। दोनों लोगों ने दोनों लोगों को प्रणाम किया। माता सरस्वती ने कहा - कहो नारद, बहुत दिन बाद आये हो, कोई परेशानी है क्या? नारद जी ने कहा कि नहीं माता दर्शन करने की इच्छा हुई थी, इसी लिये आ गया,अब जा रहा हूं। किसी ने रोका नहीं।

यहां से दोनों लोग भगवान विष्णु के पास गये। भगवान विष्णु के साथ माता लक्ष्मी भी थी। दोनों लोगों ने भगवान और माता लक्ष्मी को प्रणाम किया। मारा लक्ष्मी ने भी कहा कि बहुत दिन बाद आये हो, बैठो, पानी पियोगे। नारद जी ने कहा नहीं माता दर्शन लाभ के लिये आया था, अब जा रहा हूं।

इसके बाद दोनों लोग भगवान शिव के धाम गये। भगवान शिव ध्यान मुद्रा मे थे और माता पार्वती सेवा कर रही थी। दोनों लोगों ने भोलेनाथ और माता को प्रणाम किया। माता ने कहा कि आप लोग बैठो अभी जलपान कराती हूं और अंदर गयी और जलपान लेकर आ गयी। जलपान खत्म होते ही बोली बिना भोजन किये नहीं जाना है। अंदर गयी और भोजन लेकर आ गयी। दोनों लोग भोजन करके वापस निकले तो नारद जी इंद्र से कहा कि आपके प्रश्न का उत्तर मिल गया होगा। जिस घर की औरत अतिथि को अपने घर से बिना भोजन कराये वापस नहीं जाने देती, वही शिव परिवार है।