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बलिया मे बोले पंडित प्रदीप मिश्रा : शिव तत्व से जुड़ने का रास्ता है शिव महापुराण, शिवत्व है जीवन जीने की कला

 


 

बलिया मे श्री शिव महापुराण की कथा हुई प्रारम्भ :बाबा बालेश्वरनाथ और बलिया की शौर्य गाथाओ का हुआ वर्णन 

परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह ने कराया है आयोजन, व्यवस्था संभाल रहे है धर्मेंद्र सिंह 

मधुसूदन सिंह 

बलिया।। शिव तत्व से मिलने की राह शिव महापुराण की कथा दिखाती है। यह कथा हमें सच्चा जीवन जीने की कला सिखाती है। सत्यम शिवम् सुंदरम को सांसारिक जीवन मे कैसे शामिल किया जाय, कैसे जीवन के सर्वोच्च लक्ष्य मोक्ष को हासिल किया जाय, यह सिखाती है। उपरोक्त बातें अंतर्राष्ट्रीय लब्ध ख्याति कथावाचक पंडित प्रदीप मिश्रा जी ने कथा के दौरान कही।

 सूच्य हो कि बाबा बालखंडी नाथ मंदिर दिउली के निकट सात दिवसीय शिव महापुराण की कथा का मंगलवार 9 जून को भव्य स्वरुप मे शुभारम्भ हुआ। इस कथा के शुभारम्भ से एक दिन पूर्व ही लाखों श्रद्धालु पहुंच चुके थे। कथा का शुभारम्भ पंडित प्रदीप मिश्रा जी द्वारा पोथी पूजन व भगवान शिव के पूजन के साथ हुआ। परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह ने व्यासपीठ पर आसीन पंडित प्रदीप मिश्रा फूल माला और अंगवस्त्रम से स्वागत किया। राज्य सभा सदस्य नीरज शेखर, आयोजन कर्ता परिवहन मंत्री के छोटे भाई धर्मेंद्र सिंह, बीजेपी जिलाध्यक्ष संजय मिश्रा ने भी आचार्य जी का पूजन अर्चन किया।









बलिया का महात्म व शौर्य का वर्णन 

अपनी पहले दिन की कथा का शुभारम्भ पंडित प्रदीप मिश्रा ने राजा बलि की कथा और बाबा बालेश्वर नाथ की उत्पत्ति के इतिहास को बड़े ही सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किया। पंडित मिश्रा ने कहा कि बलिया वह पुण्यभूमि है जहां भगवान विष्णु को वामन रूप मे आना पड़ा था। कहा कि राजा बलिया की राजधानी बलिया मे वामन रूप मे भगवान आकर राजा बलिया से तीन पग जमीन मांगे। गुरु शुक्राचार्य ने अपनी दिव्य दृष्टि से देख लिया था कि ये वामन रूप मे स्वयं विष्णु छल कर रहे है। राजा बलिया को दान देने से रोकने के लिये शुक्राचार्य कमंडल के जल मे घूस गये। जिसको भगवान ने देख लिया और शुक्राचार्य की एक आंख अंगुली से फोड़ दी। गुरु के मना करने के बाद भी राजा बलिया ने वामन भगवान को तीन पग जमीन देने का संकल्प ले लिया। जिसके बाद वामन भगवान ने अपना विशाल स्वरुप बनाकर तीन पग मे तीनों लोक राजा बलिया से ले लिया।

पूरा राजपाट दान मे दे देने के बाद बलिया ने गुरुदेव शुक्राचार्य से पूंछा कि अब मै अपना वैभव पुनः वापस कैसे प्राप्त कर सकता हूं, तो शुक्राचार्य ने कहा कि महादेब की शरण मे जाओ, वही दे सकते है। इसके बाद राजा बलि ने गंगा के तट पर बालू का शिव लिंग बनाकर पूजा की, जो पत्थर मे बदल गया और बाबा बालेश्वनाथ के रूप मे बलिया मे लोगों की आस्था का प्रतीक है।इस पूजन के बाद राजा बलिया ने अपना वैभव पुनः हासिल किया।

तीन की दृष्टि होती है समय 

आपने आगे कहा कि तीन लोग ऐसे होते है जिनकी दृष्टि हमेशा सम होती है। पहली दृष्टि मां की सम होती है। मां अपने सभी बच्चों को समान दृष्टि से देखती है। दूसरी सम दृष्टि पिता की होती है। पिता भी अपने बच्चों मे भेद नहीं करता है। तीसरी सम दृष्टि गुरु की होती है। तीनों का स्नेह जिसको मिला, वह निश्चित जीवन मे सफलता प्राप्त करता है। यह समता का भाव शिवत्व से आता है। जिसके अंदर समता का भाव रहता है, वही सफल व सारे वैभव हासिल करता है।

पंडित प्रदीप मिश्रा ने बलिया मे शिव महापुराण की कथा का आयोजन करने वाले परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह की जमकर तारीफ की। कहा कि पांच दिनों के अंदर इतनी भव्य दिव्य व बड़ी व्यवस्था और कही नहीं हो सकती थी। मंत्री जी ने ऐसा कर के साबित कर दिया कि इनके अंदर शिवत्व मौजूद है। साथ ही इस बात की भी तारीफ की कि यहां पर मंत्री जी ने वीवीआईपी कल्चर को समाप्त कर दिया है। इस लिये जो पहले आया, वह पहले बैठा है। कहा कि शिव महापुराण की कथा भी यही कहती है कि जिसके हृदय मे समता का भाव है, उसको उन्नति के शिखर पर पहुँचने से कोई नहीं रोक सकता है।

बताया क्यों है बलिया बागी 

श्री मिश्रा ने कहा कि बलिया ऐसा जनपद है जिसके चारोतरफ प्रसिद्ध शिवालय विराजमान है। शिवत्व से ऊर्जा हासिल करने वाल यह जिला है, जिसके क्षेत्र मे मां गंगा की पवित्र धारा भी बहती है जो शक्ति व शांति प्रदान करती है। शिव व माता गंगा की ऊर्जा की ही देन है कि 1857 मे मंगल पांडेय ने अंग्रेजों के खिलाफ गोली चलाकर सशस्त्र विद्रोह की बिगुल फूंकी। जिसके बाद 19 अगस्त 1942 को जब पूरा देश अंग्रेजों का गुलाम था, बलिया के लोगों ने अंग्रेजों को मार मार कर भगा दिया और अपने को आजाद घोषित कर दिया था।

साथ ही यह भी कहा कि मै भी यह सोच रहा था कि इतने कम समय मे बलिया मे इस कथा का आयोजन कैसे संभव हो गया। कहा कि बलिया की मिट्टी के कण कण मे शिवत्व व माता गंगा की ऐसी चुंबकीय भक्ति की शक्ति विद्यमान है जो चुंबक की तरफ खींच कर शिव महा पुराण की कथा अपने यहां कराने को मुझे विवश कर दी।

कहा ऐसे तीन मित्रों -ताली थाली प्याली से रहे बच के 

पंडित प्रदीप मिश्रा ने कहा कि जीवन मे सफल होना चाहते है तो ऐसे तीन मित्रों से बच कर रहे। श्री मिश्रा ने कहा कि पहला वो मित्र जो सिर्फ आपकी तारीफ ही करें, अपने हर कार्य मे ताली बजाये, उससे दूर रहना ही बेहतर होना चाहिये। जो मित्र आपकी कमियों के वावजूद तारीफ करें, वह आपका सच्चा मित्र नहीं हो सकता है।

ऐसा दूसरा मित्र जो आपको बार बार होटल मे बिना किसी प्रयोजन के खाना खिलाने ले जाय, उससे भी बच के रहना चाहिये। क्योंकि बार बार होटल मे खाना खाने से आपको घर का खाना अच्छा ही नहीं लगेगा, जिससे आप स्वयं भी होटल मे खाने के आदी हो जायेंगे। जिससे आपकी सेहत तो ख़राब होंगी ही, आर्थिक तंगी भो होने लगेगी।

तीसरे ऐसे मित्र से जो आपको मदिरालय ले जाय और आपको इसकी आदत पकड़ा दे। मदिरा की लत आपका जीवन नष्ट कर देगी। इस लिये ताली थाली प्याली वाले दोस्तों से दूरी बनाना ही श्रेयष्कर है।

इसको समझाने के लिये राजा सगर के जन्म की कथा को विस्तार से समझाया। बताया कि राजा सगर के पिता राजा बाहु जो हमेशा उपरोक्त तीनों गुणों वाले मित्रों से घिरे रहते थे और कैसे इन लोगों ने राजा बाहु का पूरा राजपाट लेकर जंगल मे भगा दिया था। राजा बाहु की दो पत्नियां थी, जिसमे एक गर्भवती थी। जंगल मे जब राजा की मौत हो गयी तो दोनों रानियों ने चिता के साथ जलकर सती होने की तैयारी की। इसी समय औरव नामक मुनि आ गये और दोनों रानियों को समझाया कि गर्भवती स्त्री का सती होने से उसके कोख के बच्चे की भी मौत हो जायेगी जो महापाप होगा।

मुनि के समझाने पर दोनों रानियों ने अपने पति का अंतिम संस्कार करके मुनि के ही आश्रम मे शरण ले ली। रानियों ने मुनि से पूंछा मुनिदेव ऐसा कौन सा हम लोग कर्म करें कि अपने पति का वैभव पुनः हासिल कर सके। मुनि ने कहा कि देवो के देव महादेव के मंदिर मे झांडू पोछा लगाओ, वो तुम्हारे सारे बुरे लेखो को मिटा देंगा। दोनों रानियों ने शिवालय मे रोज सेवा कि जिसके परिणाम स्वरुप राजा सगर का जन्म हुआ। जिनके आगे कुल मे भगीरथ जी का जन्म हुआ जिन्होंने गंगा माता को धरती पर लाकर अपने कुल के सभी परिजनों का उद्धार करा दिया।

दो क्षण की शिव कथा भी कर देती है उद्धार 

अपनी कथा के अगले प्रसंग मे श्री मिश्रा ने कहा कि दो क्षण की शिव कथा भी आपके कानो मे समा गयी तो आपका कल्याण होना निश्चित है। बताया कि एक देवराज नामक ब्राह्मण था जो पर स्त्री के संपर्क मे जीवन जी रहा था। एक दिन उस स्त्री ने कहा कि रानी जो हार पहनी है, वह हार मुझको लाकर के दो। ब्राह्मण ने रात मे रानी का हार चुरा लिया। किसी व्यक्ति के महल मे घुसने की आहत से राजा ने अपने सिपाहियों को चोर को पकड़ने के लिये लगा दिया। चोर ब्राह्मण पहले से ही अस्वस्थ था। भागते भागते वह शिवालय मे पहुंच गया, जहां शिव महा पुराण की कथा हो रही थी। छुपने के समय चोर ब्राह्मण के कानो मे भी कथा चली गयी। सिपाहियों के जाने के बाद वह बाहर निकला और बेलपत्र के पेड़ के नीचे जाकर प्राण त्याग दिया। भोलेनाथ नंदी के साथ आकर उसको अपने धाम मे ले गये। यह फल होता है दो क्षण की कथा सुनने का।

जहां रहते है शिव व मंदिर नहीं बल्कि होता है शिवालय 

पंडित प्रदीप मिश्रा ने मंदिर व शिवालय मे विभेद को परिभाषित किया। श्री मिश्रा ने कहा कि जहां मूर्तियां स्थिर होती है उसको मंदिर कहते है। लेकिन जहां देवाधिदेव शिव लिंग के रूप मे विराजमान होते है, उसे शिवालय कहते है।

शिव महापुराण की कथा के लिये नहीं दिये जाते है निमंत्रण 

पंडित प्रदीप मिश्रा ने कहा कि भागवत जी की कथा हो तो निमंत्रण दिया जाता है। श्री रामायण जी की कथा हो तो भी निमंत्रण दिया जाता है। शिव महा पुराण की कथा को छोड़ कर किसी भी पुराण की कथा हो तो निमंत्रण देना पड़ता है। लेकिन शिव महापुराण की एक ऐसी कथा है जिसको सुनते ही भक्त खुद ही चले आते है किसी को निमंत्रण देने की जरूरत ही नहीं पड़ती है।

तीन मौत पर नहीं मिलती है मुक्ति 

पंडित मिश्रा ने कहा कि तीन ऐसी मौत है, जिसके द्वारा मौत होने पर मुक्ति नहीं मिलती है। पानी मे डूब कर मरे व्यक्ति की आत्मा को मुक्ति नहीं मिलती है। ऐसे ही सर्प के डसने से हुई मौत वाली आत्मा को मुक्ति नहीं मिलती है। तीसरी ऐसी मौत जिसमे पत्नी ही अपने पति कि हत्या कर दे, ऐसे व्यक्ति की आत्मा को भी मुक्ति नहीं मिलती है।

अंत मे बिन्दुक और चंचूला की कहानी की संक्षेप मे शुरुआत करके पहले दिन की कथा को विश्राम दिया।