सूचना विभाग की जारी सूची से सूचना विभाग पर ही उठे सवाल, क्या तहसीलों के बड़े ब्रांड के संवाददाता भी है फर्जी?
RTI में रसड़ा के 7 नामों पर प्रशासन का साफ जवाब — “कोई अभिलेख नहीं”
अधिवक्ता भी कर रहे है पत्रकारिता, इस पर सूचना विभाग की क्यों है मौन स्वीकृति
मान्यता प्राप्त पत्रकारों की सूची मे भी है गड़बड़ी, करेगा कौन जांच, क्या सभी से ली गयी है वेतन स्लिप और नया अथॉरिटी लेटर
मधुसूदन सिंह
बलिया।। जिला सूचना अधिकारी द्वारा RTI के जबाब मे पत्रकारों की जो सूची जारी की गयी है, वह अपने आप मे सवाल पैदा कर रही है। इस सूची के जारी होने से यह सिद्ध हो गया कि बलिया का सूचना विभाग कुम्भकर्णी निद्रा मे सोता रहता है। इसकी तंद्रा तब टूटती है, जब कोई इससे सवाल करता है। अब सवाल यह उठता है कि सूचना विभाग की गाइड लाइन मे फर्जी कौन है? क्या इसकी नजर मे फर्जी वह है जो ग्रामीण अंचलों मे पत्रकारिता करता है और उसका संस्थान उसको कोई परिचय पत्र तक जारी नही करता है? वह जो बड़े ब्रांड के लिये कार्य तो करता है लेकिन उसके लिये संस्थान सूचना विभाग को कोई पत्र नही देता है?
अगर सूचना विभाग द्वारा जारी रसड़ा के स्थानीय पत्रकार फर्जी है तो ऐसी कोई तहसील नही है जहां दैनिक अखबारों के लिये कार्य करने वाले पत्रकार इस नियम के अनुसार फर्जी न बन जाये। सूचना विभाग को अपनी सूची जारी करने से पहले इन पत्रकारों से जबाब मांगना चाहिये था कि आप किस संस्थान मे काम कर रहे है, इनको अपना पक्ष रखने का मौका देना चाहिये था जो नही दिया गया। सूचना विभाग को पूरे जनपद भर के पत्रकारों की सूची जांच करके जारी करनी चाहिये। सूचना विभाग को यह सोचना चाहिये कि मजीठिया आयोग की रिपोर्ट लागू होने के बाद अखबारों ने पत्रकारों को नियुक्ति पत्र तो छोड़िये अपने नाम से परिचय पत्र तक नही देता है। ऐसे मे क्या ये सारे पत्रकार फर्जी है? जी नही, ये फर्जी नहीं है क्योंकि इनकी सूचना कोई भी संस्थान सूचना अधिकारी को नही देता है। मीडिया संस्थान सिर्फ जिला संवाददाता या ब्यूरोचीफ, विज्ञापन प्रभारी, फोटोग्राफर की ही सूचना लिखित मे भेजते है। सूचना अधिकारी को हमारी बात पर विश्वास न हो तो श्रम विभाग मे जाकर देख ले कि बड़े संस्थान किन किन नामों की सूची पंजीकृत कराये है।माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट आदेशित किया है कि पत्रकारिता व वकालत दोनों एक साथ नही चल सकती है तो सूचना विभाग द्वारा जारी सूची मे अधिवक्ता का नाम पत्रकार के रूप मे कैसे है?
सूचना विभाग को जरा मान्यता प्राप्त पत्रकारों पर भी निगाह दौड़ा लेनी चाहिये, जिनको आंख बंद करके संस्तुति कर के नवीनीकरण करा देते है। जिला सूचना अधिकारी इसका भी जबाब सार्वजनिक करें कि कितने मान्यता प्राप्त पत्रकारों ने अपना बैंक स्टेटमेंट देते हुए अपने वेतन स्लिप को प्रमाणित कराया है? कितने संस्थानों से अथॉरिटी लेटर की क्रॉस वेरिफिकेशन विभाग ने कराया है? कितने मान्यता प्राप्त पत्रकारों पर गंभीर दफाओ मे मुकदमे विचाराधीन है, अगर है तो इनका नवीनीकरण कैसे हुआ है?
जांच हो तो पूरी हो और पूरी पारदर्शिता के साथ हो। कुछ लोगों को बदनाम करने के लिये न हो। हमारा मानना है कि पत्रकारिता से फर्जीवाड़ा समाप्त होना चाहिये लेकिन किसी की शिकायत पर नही बल्कि जिला प्रशासन की पहल पर हो। किसी को भी सूचना विभाग मे नाम दर्ज न होने के कारण फर्जी कहना कही से भी सही नही है। बलिया मे पेपर लिक मामले मे तीनों पत्रकारों के संबंध मे भी यही सूचना विभाग ये पत्रकार नही है की बात लखनऊ शासन को भेजा था, क्या वे तीनों लोग पत्रकार नही थे?
जांच सही हो, नही तो भारतीय राष्ट्रीय पत्रकार महासंघ, शासन को पत्र भेजकर जांच कराने के लिये विवश होगा।



