विकसित भारत में फटेहाल फैशन : सांस्कृतिक असुरक्षा और उपभोक्तावादी मानसिकता का परिणाम -आदेश चौबे
समाजशास्त्री, शिक्षक व चिंतक ‘आदेश चौबे’ का मत और जनता से अपील
फोटो - आदेश चौबे
डॉ सुनील कुमार ओझा
बलिया।। भारत आज तकनीकी, आर्थिक और वैश्विक स्तर पर तेजी से विकसित राष्ट्र के रूप में उभर रहा है। अंतरिक्ष अनुसंधान, डिजिटल क्रांति और सांस्कृतिक वैभव—इन सभी ने देश की छवि को नई ऊँचाइयाँ दी हैं। लेकिन इसी चमकदार विकास के बीच एक विडंबना भी उभरती दिख रही है—फटेहाल फैशन का बढ़ता चलन।
समाजशास्त्री व चिंतक आदेश इसे सिर्फ कपड़ों का ट्रेंड नहीं, बल्कि सांस्कृतिक असुरक्षा और उपभोक्तावादी मानसिकता का परिणाम मानते हैं। उनके अनुसार विकसित भारत में फटे कपड़ों को आधुनिकता का प्रतीक मानना एक सामाजिक भ्रम है।
वे कहते हैं, “जब विकास अपनी जड़ों को छोड़ने लगे, तब वह प्रगति नहीं, भ्रम होता है।”
आदेश का मानना है कि गरीब की मजबूरी को अमीरों का फैशन बनाना संवेदनहीनता है। जहाँ एक ओर गरीब अपने फटे कपड़ों को छिपाता है, वहीं दूसरी तरफ बड़े ब्रांड इन्हें हजारों रुपये में बेचकर इसे ‘स्टाइल’ बना देते हैं। यह असमानता का सबसे कटु रूप है।
उनके अनुसार बाजार और मीडिया ने युवाओं में “अलग दिखने” की चाह को भुनाकर इसे ट्रेंड बना दिया। परिधान, जो गरिमा और उपयोगिता के प्रतीक थे, उन्हें बाजारवाद ने दिखावे का माध्यम बना दिया। यह पहचान के संकट और सांस्कृतिक विचलन का स्पष्ट संकेत है।
आदेश कहते हैं कि परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है। फैशन अपनाएँ, लेकिन विवेक के साथ। कपड़े हमारी संस्कृति का दर्पण हों, न कि हीन–ग्रंथि का प्रदर्शन।
उनकी अपील है कि युवा बाजार के मोह से बाहर निकलें और भारतीयता को गर्व से अपनाएँ। फटा कपड़ा किसी की गरीबी का प्रतीक है, उसे फैशन बनाना सामाजिक असंवेदनशीलता है।
अंततः, विकसित भारत में यह फैशन बहस केवल पहनावे की नहीं, बल्कि समाज की दिशा, मूल्य और मानसिकता की है। आदेश का स्पष्ट संदेश है—विकास तभी सार्थक है जब वह संस्कृति, गरिमा और विवेक के साथ चले।



