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विश्व गौरैया दिवस पर विशेष : बलिया का डॉ राघव दंपत्ति,जो गौरया संरक्षण में लगा है दिनरात

 


बलिया ।। आज विश्व गौरैया दिवस है । यह हर साल 20 मार्च को मनाया जाता है । गौरैया के प्रति जागरुकता बढ़ाने के लिए साल 2010 में इस दिवस को मनाने की शुरुआत की गई थी । पिछले कुछ समय से गौरैया की संख्या में काफी कमी आई है ।

एक-दो दशक पहले हमारे घर-आंगन में फुदकने वाली गौरैया आज विलुप्ति के कगार पर है। इस नन्हें से परिंदे को बचाने के लिए ही पिछले तीन सालों से बड़े ही जोरशोर से प्रत्येक 20 मार्च को 'विश्व गौरैया दिवस' के रूप में मना रहे हैं, ताकि लोग इस नन्हीं-सी चिड़िया के संरक्षण के प्रति जागरूक हो सकें। भारत में गौरैया की संख्या लगातार घटती ही जा रही है। कुछ वर्षों पहले आसानी से दिख जाने वाला यह पक्षी अब तेज़ी से विलुप्त हो रही है। दिल्ली में तो गौरैया इस कदर दुर्लभ हो गई है कि ढूंढे से भी ये पक्षी नहीं मिलता, इसलिए वर्ष 2012 में दिल्ली सरकार ने इसे राज्य-पक्षी घोषित कर दिया।



 बलिया में भी एक परिवार अपने स्तर से इस पंछी की चहचहाहट को बढ़ाने में दिन रात एक किये हुए है । अपनी शैक्षणिक गतिविधियों के साथ साथ सामाजिक गतिविधियों में भी हमेशा सक्रिय रहने वाली डॉ निशा राघव व डॉ रविन्द्र प्रताप राघव, श्री मुरली मनोहर टाउन स्नातकोत्तर महाविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं। ये दोनों  सन 2001 से अपने निवास सेठ कालोनी, बलिया में गौरैया संरक्षण का प्रयास कर रहे हैं। वहां राघव दम्पत्ति व उनके पुत्र कनु यश ने मिलकर एक मिनी फारेस्ट बनाया है। जिसमें गौरेया के साथ साथ बुलबुल, सन-बर्ड, फाख्ता, वाटर बर्ड और भी कई पक्षियों का बसेरा है।




डॉ राघव परिवार ने 2003 से गौरया संरक्षण के लिए पहले गत्ते के पुराने डिब्बों से घर बनाये, जिनमें गौरेया ने बसेरा किया। फिर 2005 में प्लाई के घर डिजाइन किए। अभी लगभग 24 sparrow house है। लगभग सभी में एक जोड़ा गौरया का है।  अभी कुल मिलाकर 60-70 गौरया हैं। उनके लिए चावल फीडर व पानी को लिए मिट्टी के बर्तन रखें हैं। पूरे दिन गौरेया की चहचहाहट से घर में रौनक रहती है। 





डॉ निशा बताती हैं कि पर्यावरण की दृष्टि से बहुत सारे पेड़ों के बीजों के वितरण में तथा कीड़े और पेस्ट को समाप्त करने में गौरेया का महत्वपूर्ण योगदान रहता है। साथ ही धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से भी जहां गौरेया का वास होता है, वहां सुख, समृद्धि व खुशहाली के साथ साथ पाज़िटिविटी रहती है। 

राघव दम्पत्ति पूरे समाज को यह संदेश देना चाहते हैं कि हरेक व्यक्ति को गौरेया संरंक्षण में अपना योगदान देना चाहिए। कम से कम हर छत पर दाना पानी रखें।

कवि बरैया के शब्दों में

   

(1)-जब से कच्चे घर मिटे, मिटे मढ़ैया छान ।

     तब से गौरैया मिटी, होकर के हैरान ।

               

(2)-जगह न खाली छोड़ता, कोई घर के पास ।

     पक्के घर में नहिँ मिले, गौरैये आवास ।

               

 (3)-द्वार रही नहिँ नीमरी,  रहे न नीँबू पास।

       गौरैयाँ ठहरे कहाँ ,रहने  को नहीं वास।

             

 (4)-खेतों पर भी पेड़ अब, नहीं लगाते लोग ।

      बिना पेड़ की छाँव के,चिड़ियों को हैं रोग ।

              

 (5)बनें गैस पर रोटियां, अब घर घर हर गाँव ।

      गौरैया कब पायगी,अब पेडों की  छाँव ।

            

 (6)-  ट्रेक्टर खेती से घटा, बैल काठ का मान ।

         बिन गौरैया घट गयी, अब घर- घर की शान ।

                   

 (7)-घर घर पेड़ लगाइए,  कुछ छोड़ो आवास ।

       दाना पानी दीजिए,तब हो चिड़ियाँ वास ।

 (डॉ. राम सहाय बरैया ग्वालियर (म.प्र.))