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क्यो अब आम आदमी से भी कमतर हो गयी पत्रकार की हैसियत,कब सोचेगे पत्रकारों की मठाधीशी करने वाले



मधुसूदन सिंह

बलिया ।। कभी पत्रकार और पत्रकारिता की हनक व जलवा हुआ करता था । बिना आमंत्रण के कोई भी पत्रकार किसी भी बड़े नेता,अधिकारी या मंत्री के यहां नही जाता था । अखबार में खबर छपते ही हड़कम्प मच जाता था । जबकि उस समय के पत्रकारों के पास न तो आज जैसी इलेक्ट्रॉनिक सुविधाएं थी, न ही सबके पास आवागमन के लिये साधन ही होता था, बस अगर था तो स्वाभिमान व खुद्दारी ,जो आजकल ढूंढने पर यदाकदा कही दिखती है । आज तो हम एक्सक्लूसिव के चक्कर मे अपना मान सम्मान सबकुछ ताक पर रख पर बिन बुलाये कही भी पहुंच जा रहे है ।



 तब पत्रकारिता मिशन थी,आज यह कमीशन में बदल गयी है । तब आलोचना होती थी अब चाटुकारिता की खबरों के कारण आलोचना वाली खबरों के लिये जगह ही नही बचती है । तब स्वाभिमान था,अब तो अपमान शब्द भी छोटा पड़ रहा है । मीडिया घरानों की सत्ता की चाटुकारिता ने पत्रकारों को ऐसा बंधुआ मजदूर बना दिया है जिसकी हैसियत एक आम आदमी से भी कमतर हो गयी है ।

 लखीमपुरखीरी कांड को ही ले लीजिये । मृत किसानों के परिजनों को 45 लाख की आर्थिक मदद,एक परिजन को सरकारी नौकरी मिल रही है । लेकिन इसी घटना को कवर करते हुए जीप से रौंद दिये गये पत्रकार रमन कश्यप के लिये न तो किसान यूनियन ने, न ही बीजेपी ने और न ही सरकार ने यह घोषित करने की सोची कि इस हादसे में एक पत्रकार भी मरा है,उसके परिजनों को भी यही मुआवजा व एक व्यक्ति को सरकारी नौकरी देने की घोषणा कर दी जाय । क्या एक पत्रकार की हैसियत किसानों से भी गई गुजरी हो गयी है ।



हद तो तब हो गयी जब एक चैनल के पत्रकार ने रमन कश्यप के भाई के मुंह से यह कहलवाने की कोशिश की कि कश्यप की मौत जीप से कुचलने से नही किसानों द्वारा लाठी डंडों से पीटपीट कर मारने से हुई है । जब स्व कश्यप के भाई ने कहा कि मेरे भाई की मौत जीप से कुचलने से हुई है तो वो आग बबूला होकर बोले कि पत्रकार के भाई नही होते तो तुमको समझाते । अब इस घटना से साफ है कि पत्रकारिता कैसे राजनेताओ के आगे बिक चुकी है जो अपने आका के आदेश के अनुसार न्यूज बना रही है ।

अब गिरावट का स्तर काफी नीचे आ गया है । अब खबरों में गांव गिराव, खेती किसान खलिहान,नौजवान बेरोजगारी, महंगाई भूखो रहने की लाचारी खबर नही रह गयी है । अब फला उद्योगपति या राजनेता क्या खाते है,कैसे नवरात्रि की पूजा करते है,कितने नौकर चाकर है,यह प्रमुख खबरे हो रही है । शाहरुख खान का बेटा अन्य 6 लड़को के साथ पकड़ा जाता है ड्रग केस में,लेकिन खबर सिर्फ शाहरुख के बेटे की दिखती है,अन्य 6 की नही । आखिर ये 6 किसके बेटे है,कौन रईसजादे इन सबके पिता है,इसको बताने में शर्म आ रही है क्या ? ।

जब देश मे सरकार की असफलता के चलते आक्रोश बढ़ता है तो खबरे यह नही बल्कि   यह बनती है भारत ने चीन को आंख में आंख डालकर दिया जबाब,पाकिस्तान में प्याज टमाटर हुए दो सौ पार । कही वर्ग संघर्ष हो गया तो पहले उसमे हिन्दू मुसलमान ढूंढा जाता है और नही मिलता है तो अगड़े पिछड़े का संघर्ष बताने की होड़ लग जाती है ।



लखीमपुरखीरी की घटना हम पत्रकारों को सोचने पर मजबूर कर रही है कि आखिर हमारी औकात क्या रह गयी है ? अगर अब भी नही चेते तो दलाल मीडिया घराना पत्रकार और पत्रकारिता दोनों को अपने खजाने को भरने के लिये भांड भी बना दे तो अतिशयोक्ति नही होगी । इस लिये पत्रकार साथियो जागो और अपने अंदर के पत्रकार को जगाओ,दासता छोड़ो,पत्रकारिता करो ।

मेरी बात अगर कड़वी लगी हो तो क्षमा प्रार्थी हूं लेकिन यह कटु सत्य है ।

   मधुसूदन सिंह

प्रांतीय महासचिव

भारतीय राष्ट्रीय पत्रकार महासंघ

उत्तर प्रदेश