अस्सी फीसदी दम्पति दो वर्ष के बच्चों को लेना चाहते हैं गोद : डॉ. कृपाशंकर चौबे
लाखों बच्चों के दत्तक ग्रहण और पारिवारिक पुनर्वास खड़ी हुई बड़ी चुनौती
चौदहवीं ऑनलाइन सेमिनार में दत्तक ग्रहण की कानूनी पेंचों पर विचार
प्रभुनाथ शुक्ल
भदोही ।। देश में 80 फीसदी दम्पति दो वर्ष से कम आयु के बच्चों को गोद लेना पसंद करते हैं। जबकि भारत से विदेश जाने वाले दत्तक बच्चों के मामलों में 90 फीसदी परिवार दो वर्ष से ऊपर आयु को प्राथमिकता देते है। लिहाजा दो वर्ष से ऊपर वाले लाखों बच्चों के दत्तक ग्रहण या पारिवारिक पुनर्वास की बड़ी चुनौती खड़ी हुई है। यह जानकारी सोमवार को चाइल्ड कंजर्वेशन फाउंडेशन के सचिव डॉ कृपाशंकर चौबे ने 14 वीं ऑल इंडिया ई- संगोष्ठी में दी।
संगोष्ठी में मप्र के अलावा बिहार, उत्तर प्रदेश, आसाम, राजस्थान, दिल्ली, चंडीगढ, छत्तीसगढ़, बंगाल के बाल अधिकार कार्यकर्ताओं ने भाग लिया। चौबे ने बताया कि बर्ष 2018 -19 में कुल 3374 बच्चे देश में गोद लिए गए वहीं 653 का दतक ग्रहण विदेशों में भारत से हुआ है। इनमें भी सर्वाधिक 301 अमेरिका,115 इटली और 85 स्पेन में हुए। डॉ. चौबे के अनुसार भारत मे अभी भी नवजात बच्चों को गोद लेने की मानसिकता ठीक न होने की वजह से अधिक आयु के जरूरतमंद अभ्यर्पित, समर्पित, अनाथ बच्चों का पारिवारिक पुनर्वास जेजे एक्ट की बुनियादी भावनाओं के अनुरूप नहीं हो पा रहा है।
केंद्रीय दत्तक ग्रहण प्राधिकरण उपसमिति की मानद सदस्य सुश्री कविता भंडारी नई दिल्ली ने संगोष्ठी को संबोधित करते हुए कहा कि भारत में दत्तक ग्रहण के लिए बहुत ही प्रमाणिक औऱ समावेशी कानून सरकार द्वारा बनाया गया है। मौजूदा जेजे एक्ट का परिपालन" हेंग घोषणापत्र" की भावनाओं से उदभूत है जो प्रत्येक बालक को जन्मजात गरिमा औऱ उत्कर्ष की सर्व सुलभता उपलब्ध कराने के लिए वचनबद्ध है। केंद्रीय दत्तक ग्रहण एजेंसी,राज्य दत्तक ग्रहण एजेंसी, बाल कल्याण समिति,जिला बाल कल्याण इकाई जैसे स्टेक होल्डर्स को इस मामले में कानूनी शक्तियां प्रदान कर एक जबाबदेह औऱ संवेदनशील भूमिका की अपेक्षा की गई है।
डॉ भंडारी ने बताया कि अभ्यर्पित,समर्पित एवं सरंक्षण योग्य बालकों के हित मे दत्तक ग्रहण एक तरह से राज्य और समाज की कानून सम्मत नैतिक जबाबदेही का काम भी है। इसलिये सभी स्टेक होल्डर्स को सर्वप्रथम यही प्रयास करना चाहिये कि ऐसे बालकों को उनके जैविक माता पिता की सरपरस्ती ही सुनिश्चित हो। कानून के अनुसार सबसे योग्य निसन्तान दम्पति को ही दत्तक ग्रहण के लिये प्राथमिकता दी जाना चाहिये। एक सन्तान वाले दम्पति को विपरीत लिंगी बालक का दत्तक ग्रहण करने की अनुमति है लेकिन दो सन्तान वालों को ऐसी सुविधा नही है ।
दत्तक ग्रहीता दम्पति औऱ बालक की आयु में 25 वर्ष का अंतर देखा जाना आवश्यक है। जिला बाल कल्याण इकाई को दत्तक ग्रहण के सबन्ध में आवश्यक प्रचार प्रसार स्थानीय स्तर पर करना चाहिये ताकि आम जन इस मामले में गलत लोगों के बहकाबे में न आएं और विधि सम्मत प्रक्रिया का अनुपालन करें। उन्होंने बताया कि यह कानून बालक की गोपनीयता को उच्च प्राथमिकता पर सुनिश्चित करता है इसलिए विहित प्रक्रिया में गोपनीयता का तत्व हमेशा ध्यान में रखना चाहिये। सभी पक्षों की सामाजिक आर्थिक जानकारी से लेकर पश्चावर्ती देखरेख के मामले भी संवेदनशीलता के साथ पूरा किया जाना जरूरी है।
ई संगोष्ठी को रेडियो मन के एमडी राम रघुवंशी ने संबोधित करते हुए बताया कि कोरोना संकट के दौर में बच्चों को मोबाइल के दुष्प्रभावों से बचाने में सामुदायिक रेडियो बहुत ही प्रभावी तरीके से काम कर सकते है।विदिशा में इस मॉडल पर बेहतरीन काम किया गया।बाल हित में रेडियो मन द्वारा विदिशा के आसपास 25 किलोमीटर के दायरे में प्रायः हर घर,दुकान,सार्वजनिक स्थल पर मात्र 100 रुपए में रेडियो सेट स्थापित किये गए है जिन पर नियत समय मे बच्चों से जुड़े कार्यक्रम प्रसारित होते है। इन कार्यक्रमों को पूरी तरह बाल प्रतिस्पर्धी स्वरूप में डिजाइन किया गया इससे बच्चों में सोशल मीडिया से दूरी निर्मित हो रही है। आभार प्रदर्शन उज्जैन के बाल कल्याण समिति अध्यक्ष डॉ लोकेन्द्र शर्मा ने व्यक्त किया ।






