सर्बिया में छात्रों की सरकार बनने के बाद अब किस देश की बारी?
मधुसूदन सिंह
बलिया।। सर्बिया में छात्र आंदोलन और सरकार के खिलाफ जनदबाव ने दुनिया का ध्यान आकर्षित किया है। लेकिन एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है—छात्रों के आंदोलन से सरकार का गिरना, छात्रों के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनना और छात्रों का चुनाव जीतकर सत्ता में आना, तीन अलग-अलग स्थितियां हैं।
अब सवाल यह है कि क्या सर्बिया की तरह दूसरे देशों में भी युवा और छात्र आंदोलन सत्ता परिवर्तन का कारण बन सकते हैं? इसका जवाब उस देश की राजनीतिक परिस्थितियों, जनता के असंतोष, चुनावी व्यवस्था और आंदोलन की व्यापकता पर निर्भर करता है।
किन देशों पर सरकार बदलने का दबाव?
1. अल्बानिया — भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन
अल्बानिया में अक्टूबर 2026 में लगातार विरोध प्रदर्शन हुए हैं। छात्र शिक्षा पर अधिक खर्च, कम फीस और भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। व्यापक आंदोलन में प्रधानमंत्री एदी रामा के इस्तीफे की मांग भी शामिल है। हालांकि, सरकार गिरना अभी तय नहीं है।
2. फ्रांस — छात्रों का बढ़ता असंतोष
सितंबर-अक्टूबर में स्कूलों और विश्वविद्यालयों में संसाधनों, शिक्षकों की कमी और शिक्षा संबंधी नीतियों को लेकर प्रदर्शन हुए। सरकार ने कुछ प्रस्ताव वापस लिए, लेकिन राजनीतिक सत्ता परिवर्तन की कोई निश्चित स्थिति नहीं है।
3. बुल्गारिया — युवा आंदोलन का राजनीतिक असर
यहां बजट और कर संबंधी प्रस्तावों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के बाद सरकार ने इस्तीफा दिया था। यह उदाहरण बताता है कि युवाओं का आंदोलन आर्थिक असंतोष और भ्रष्टाचार के मुद्दों से जुड़कर सरकार पर दबाव बना सकता है। लेकिन इसे अगली सरकार गिरने की भविष्यवाणी नहीं माना जा सकता।
सर्बिया में वास्तव में क्या हुआ?
26 अक्टूबर 2026 की रॉयटर्स रिपोर्ट के अनुसार, सर्बिया में छात्र-समर्थित उम्मीदवारों ने संसदीय चुनाव में लगभग 52.7% वोट और 250 में से 139 सीटें हासिल कीं। लंबे समय से प्रभावशाली रहे अलेक्जेंडर वुचिच के नेतृत्व वाले गठबंधन को 97 सीटें मिलीं। हालांकि, छात्र-समर्थित उम्मीदवारों की जीत और नई सरकार का औपचारिक गठन अलग-अलग चरण हैं।
इस आंदोलन की शुरुआत नवंबर 2024 में नोवी साद रेलवे स्टेशन की छतरी ढहने और 16 लोगों की मौत के बाद हुई थी। प्रदर्शनकारियों ने भ्रष्टाचार और निर्माण कार्यों में जवाबदेही की मांग उठाई थी। करीब दो साल के आंदोलन के बाद यह चुनावी सफलता मिली।
क्या भारत में भी ऐसा हो सकता है?
भारत में भी बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितता, भ्रष्टाचार और शिक्षा जैसे मुद्दों पर युवा आंदोलन होते रहे हैं। लेकिन भारत और सर्बिया की राजनीतिक परिस्थितियां, चुनावी व्यवस्था और संस्थागत संरचना अलग हैं। इसलिए केवल छात्र आंदोलनों के आधार पर भारत में सरकार बदलने की भविष्यवाणी करना उचित नहीं होगा।
निष्कर्ष: अभी अल्बानिया में जारी विरोध प्रदर्शन पर नजर रखना उपयोगी है। लेकिन किसी देश में अगली सरकार कब गिरेगी, इसका विश्वसनीय निष्कर्ष निकालने के लिए आंदोलन की व्यापकता, विपक्ष की स्थिति, संसद का समर्थन और चुनावी घटनाक्रम देखना होगा।








