Breaking News

शरद पूर्णिमा पर चांद नहीं, स्त्री की पीठ की सुंदरता की चर्चा क्यों नहीं?

 




बड़ौदा गुजरात।। हमारी परंपरा केवल स्त्री को पिंजरे में बंद रखने वाली डरपोक परंपरा नहीं है। यदि शक्ति की पूजा करनी है, तो अपने सामने उपस्थित स्त्री के सौंदर्य का सम्मान करना भी सीखिए। यह भी जानिए कि प्राचीन भारत के साहित्य और मूर्तिकला में स्त्री की पीठ की सुंदरता का कितना अद्भुत वर्णन मिलता है।

शरद पूर्णिमा पर चांद की जगह स्त्री की पीठ की चर्चा करनी चाहिए थी? जी हां, नवरात्र के दौरान हर साल इसी तरह के विवाद उठते हैं। प्राचीन भारत में उत्सवों के लिए स्त्रियों के पहनावे पर कठोर मर्यादाएं थोपने की कोई एकरूप परंपरा नहीं थी। आज स्थिति यह है कि नवरात्र के गरबा उत्सव में दूसरे धर्मों के लोग आएं या न आएं, कुछ लोगों के मन में परंपरा के नाम पर इतनी संकीर्णता घर कर गई है कि उन्हें स्त्री के पहनावे और उसके सौंदर्य से ही परेशानी होने लगती है।

यह बात कड़वी लग सकती है, लेकिन चिंतन, अध्यात्म, मोक्ष, संन्यास और संयम की चर्चा करते-करते हमने अपनी समृद्ध रसिक परंपरा के एक बड़े हिस्से को स्वयं ही संकोच के पर्दे के पीछे छिपा दिया है। इससे न तो हमारा दर्शन महान हुआ और न ही समाज में वास्तविक संयम बढ़ा। भ्रष्टाचार, गंदगी, यातायात में अनुशासनहीनता और धन-बल की राजनीति को देखकर सहज ही सवाल उठता है कि हमारा अध्यात्म और संयम आखिर दिखाई कहां देता है?

विडंबना यह है कि सार्वजनिक जीवन में नैतिकता की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले कुछ लोग नवरात्रि में गरबा खेलने वाली महिलाओं के ब्लाउज की डोरियों तक को संस्कृति के लिए खतरा मानने लगते हैं। मानो सनातन संस्कारों की रक्षा की पूरी जिम्मेदारी स्त्री के पहनावे पर ही टिकी हो।

ऐसे लोग यह भूल जाते हैं कि पुरुष की दृष्टि और व्यवहार की जिम्मेदारी भी उसी की है। स्त्री के कपड़ों को लेकर आपत्तियां जताने वाले अनेक लोग सामाजिक माध्यमों पर महिलाओं की तस्वीरों और वीडियो पर अशोभनीय टिप्पणियां करने से भी नहीं चूकते। फिर वही लोग मर्यादा और संस्कारों की दुहाई देते हैं।

उनकी दलील होती है कि देवी के उत्सव में ऐसा पहनावा कैसे चल सकता है, बाकी दिनों में कोई कुछ भी करे। लेकिन सवाल यह है कि क्या देवी की भक्ति का अर्थ केवल कुछ दिनों के लिए स्त्रियों पर अतिरिक्त पाबंदियां लगाना है? क्या स्त्री की सुंदरता, उसका आत्मविश्वास और उसकी खुशी हमारी सांस्कृतिक परंपरा के विरोधी हैं?


 शृंगार भी भारतीय परंपरा का हिस्सा है

देवी को सोलह शृंगार से सजाने की परंपरा हमारे यहां सदियों से रही है। लेकिन जब कोई स्त्री स्वयं सज-संवरकर उत्सव में आती है, तो कुछ लोगों को परेशानी होने लगती है। प्रकृति ने स्त्री को मातृत्व की क्षमता दी है, लेकिन उसके शरीर और सौंदर्य को लेकर समाज में अनावश्यक संकोच और विरोधाभास पैदा कर दिए गए हैं।

प्राचीन भारत में वस्त्रों के अनेक रूप प्रचलित थे। स्तनपट्ट और उत्तरीय जैसे परिधान चोली तथा साड़ी के विभिन्न पारंपरिक रूपों से अलग थे। साहित्य और मूर्तिकला में इन वस्त्रों, आभूषणों और शारीरिक सौंदर्य का खुलकर चित्रण मिलता है। हमारे पूर्वजों के लिए सौंदर्य केवल छिपाने की वस्तु नहीं था; वह कला, कल्पना और जीवनानंद का विषय भी था।

स्त्री को नारायणी कहकर उसे घर के किसी कोने में बिठा देना और उसके सामने दीपक जला देना ही उसकी पूजा नहीं है। उसकी स्वतंत्रता, आनंद और सुरक्षा का सम्मान करना भी आवश्यक है। गुजरात को इस बात पर गर्व होना चाहिए कि यहाँ की महिलाएं आत्मविश्वास के साथ अपनी पसंद के कपड़े पहनकर रात में भी सुरक्षित वातावरण में उत्सवों का आनंद ले सकें। इसके बजाय यदि समाज का एक वर्ग स्त्रियों के पहनावे पर प्रतिबंध लगाने की माँग करने लगे, तो यह चिंता का विषय है।

इसीलिए शरद पूर्णिमा के अवसर पर भारतीय साहित्य और शिल्पकला की उस समृद्ध परंपरा की चर्चा करना उचित है, जिसमें स्त्री की पीठ, पतली कमर, केशराशि और शारीरिक भंगिमाओं को कलात्मक दृष्टि से देखा गया है। यह उस सांस्कृतिक विरासत की एक झलक है, जिसे हम अक्सर अपनी ही संकीर्णताओं के कारण भूल जाते हैं।


संस्कृत साहित्य में स्त्री की पीठ का सौंदर्य

संस्कृत के शृंगार साहित्य में स्त्री की पीठ का वर्णन प्रायः उसकी पतली कमर और सुडौल शरीर की अन्य विशेषताओं के साथ किया गया है। कवियों ने शरीर की भंगिमाओं को धनुष, लता और रथ जैसी उपमाओं के माध्यम से अभिव्यक्त किया है। एक प्रचलित संस्कृत पद्य में ऐसी सुंदरी की कल्पना की गई है, जो दोनों हाथ ऊपर उठाकर अंगड़ाई लेती है और अपनी कमर को थोड़ा पीछे की ओर मोड़ती है। उसकी पीठ का वक्र आकार कवि को कामदेव के खिंचे हुए धनुष की याद दिलाता है। यह उपमा केवल शारीरिक बनावट का वर्णन नहीं, बल्कि मानवीय सौंदर्य को काव्यात्मक कल्पना में बदलने का उदाहरण है।

इसी प्रकार एक अन्य प्रचलित शृंगारपरक पद्य में स्वर्णलता जैसी सुंदरी की पतली कमर और पीछे की ओर शरीर के सुडौल आकार का वर्णन किया गया है। कवि इसे कामदेव के किसी दिव्य अस्त्र की तरह प्रभावशाली बताता है। इन उपमाओं में तत्कालीन काव्य-परंपरा का शृंगारबोध दिखाई देता है।

यहां एक बात ध्यान देने योग्य है। प्राचीन साहित्य में प्रचलित हर संस्कृत पद्य को किसी प्रसिद्ध कवि या ग्रंथ से जोड़ देना उचित नहीं है। कई पद्यों के लेखक, मूल पाठ और संदर्भ को लेकर अनिश्चितता रहती है। इसलिए ऐसे उद्धरणों को प्रमाणित संदर्भ के बिना कालिदास, भर्तृहरि या किसी अन्य प्रसिद्ध कवि की रचना मानकर प्रस्तुत नहीं करना चाहिए।

महाभारत में द्रौपदी के सौंदर्य का वर्णन करते हुए उनके सुगंधित शरीर, सुंदर केश, पतली कमर और सुडौल काया का उल्लेख मिलता है। नल-दमयंती की कथा में भी स्त्री-सौंदर्य के वर्णन के लिए काव्यात्मक उपमाओं का प्रयोग हुआ है। इन प्रसंगों से स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारतीय साहित्य में सौंदर्य का चित्रण विविध रूपों में किया गया था।

भर्तृहरि से संबद्ध शृंगार शतक और अन्य शृंगारपरक रचनाओं में भी स्त्री के शारीरिक सौंदर्य, प्रेम, आकर्षण और मानवीय भावनाओं को प्रमुख स्थान मिला है। इन रचनाओं को पढ़ते समय उनके साहित्यिक संदर्भ और काव्यगत उद्देश्य को समझना जरूरी है।


प्रेम, आकर्षण और आलिंगन का साहित्य

कवि बिल्हण की ‘चौरपंचाशिका’ प्रेम और स्मृति से भरी एक प्रसिद्ध काव्यरचना है। इसमें प्रेमिका की सुंदरता और उसके साथ बिताए क्षणों की स्मृति को काव्यात्मक ढंग से अभिव्यक्त किया गया है। इसी तरह भानुदत्त की ‘रसमंजरी’ में नायक-नायिका की भाव-भंगिमाओं, प्रेम और आकर्षण का वर्णन मिलता है।

महाकवि भवभूति के नाटक ‘मालतीमाधव’ में भी प्रेम और आलिंगन से जुड़े प्रसंग हैं। इन रचनाओं से यह समझा जा सकता है कि भारतीय साहित्य में प्रेम और शृंगार को केवल त्याग या संन्यास के विपरीत नहीं देखा गया। मानवीय आकर्षण और भावनात्मक निकटता भी साहित्यिक अभिव्यक्ति के विषय रहे हैं।

इस परंपरा की विशेषता यह है कि इसमें प्रेम, सौंदर्य और भावनाओं को अनेक रूपों में व्यक्त किया गया। कहीं नायिका की अंगड़ाई है, कहीं उसके केशों की शोभा, कहीं प्रियतम की स्मृति और कहीं आलिंगन में मिलने वाले सुख का चित्रण। इस विविधता को नकारकर भारतीय संस्कृति को केवल कठोर नियमों और निषेधों तक सीमित कर देना उसके व्यापक साहित्यिक संसार को अनदेखा करना है।

देवी के सौंदर्य-वर्णन में भी शृंगार

यदि कोई यह तर्क दे कि शृंगारपरक वर्णन केवल लौकिक प्रेम तक सीमित होने चाहिए और देवी की उपासना में उनका कोई स्थान नहीं है, तो भारतीय स्तुतिसाहित्य का अध्ययन इस धारणा को अधिक व्यापक दृष्टि से देखने का अवसर देता है।

कांचीपुरम की देवी कामाक्षी, देवी पार्वती और अन्य शक्तिस्वरूपों की स्तुतियों में उनके रूप, आभूषण, केशराशि और दिव्य सौंदर्य का वर्णन मिलता है। शक्ति-उपासना की परंपराओं में देवी को केवल निर्गुण आध्यात्मिक सत्ता के रूप में ही नहीं, बल्कि साकार, सुंदर और अलंकारों से सुशोभित मातृशक्ति के रूप में भी प्रतिष्ठित किया गया है।

आदि शंकराचार्य से संबद्ध ‘सौंदर्यलहरी’ देवी के दिव्य रूप का काव्यात्मक वर्णन करने वाली प्रसिद्ध रचना है। इसमें देवी के अंग-प्रत्यंग, आभूषण और सौंदर्य के माध्यम से आध्यात्मिक भावों को अभिव्यक्त किया गया है। इसी व्यापक परंपरा में अनेक स्तुतियों ने देवी के रूप को सृष्टि की सुंदरता और शक्ति के प्रतीक के रूप में देखा।

हालांकि देवी से संबंधित प्रत्येक शृंगारपरक संस्कृत पद्य को किसी विशिष्ट ग्रंथ का प्रमाणित श्लोक मानना उचित नहीं होगा। ‘मूकपंचशती’, ‘श्यामला दंडकम्’ और ‘कृष्णकर्णामृतम्’ जैसे ग्रंथों के नाम पर प्रचलित उद्धरणों की प्रामाणिकता और मूल संदर्भ की जाँच आवश्यक है। सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करने का अर्थ उसके बारे में किए गए हर दावे को बिना जांच स्वीकार करना नहीं, बल्कि उसे सही रूप में समझना भी है।

महाकवि कालिदास के ‘कुमारसंभव’ में पार्वती के रूप, वस्त्र और लता जैसी सुंदरता का वर्णन मिलता है। उनके काव्य में प्रकृति और स्त्री-सौंदर्य के बीच अनेक समानताएं दिखाई देती हैं। फूलों से लदी लता, उगते सूर्य के समान लाल वस्त्र और पुष्पों के भार से झुकी डालियां जैसी उपमाएं सौंदर्य को प्रकृति के व्यापक संसार से जोड़ती हैं।

इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि भारतीय काव्य-परंपरा में देवी का सौंदर्य और लौकिक स्त्री का सौंदर्य हमेशा दो बिलकुल अलग खांचों में नहीं रखा गया। संदर्भ के अनुसार दोनों के वर्णन में शृंगार, प्रकृति और कलात्मक कल्पना के तत्व मिलते हैं।


पत्थरों में उकेरी गई सौंदर्य की परंपरा

साहित्य के अतिरिक्त भारतीय मंदिरों और ऐतिहासिक स्मारकों की मूर्तिकला में भी स्त्री की विविध मुद्राओं और सौंदर्य का विस्तृत चित्रण मिलता है। यदि इस विरासत को समझना हो, तो देश के कुछ प्रमुख स्थलों का अध्ययन किया जा सकता है।

1- चेन्नाकेशव मंदिर, बेलूर, कर्नाटक

होयसला स्थापत्य शैली के लिए प्रसिद्ध इस मंदिर में मदनिका या शिलाबालिकाओं की सुंदर मूर्तियां हैं। नृत्य, संगीत, शृंगार और दैनिक जीवन से जुड़ी मुद्राओं में निर्मित ये आकृतियां कलाकारों की असाधारण कल्पनाशक्ति और पत्थर पर उनकी पकड़ का परिचय देती हैं। शरीर के वक्र, आभूषण और केशसज्जा को जिस बारीकी से उकेरा गया है, वह विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

2- खजुराहो के कंदारिया महादेव और लक्ष्मण मंदिर, मध्य प्रदेश

खजुराहो के मंदिर अपनी समृद्ध मूर्तिकला के लिए प्रसिद्ध हैं। यहां नृत्य करती हुई, अंगड़ाई लेती हुई, दर्पण देखती हुई और आभूषण सँवारती हुई स्त्रियों की अनेक प्रतिमाएं हैं। इन मूर्तियों में शरीर की लचक, संतुलन और गति को पत्थर में जीवंत करने का प्रयास दिखाई देता है। इनका महत्व केवल शारीरिक सौंदर्य तक सीमित नहीं, बल्कि तत्कालीन कला, जीवन और धार्मिक-सांस्कृतिक कल्पना को समझने में भी है।

3- कोणार्क सूर्य मंदिर, ओडिशा

कलिंग स्थापत्य शैली का यह प्रसिद्ध मंदिर अपनी जटिल नक्काशी और नृत्य-संगीत से संबंधित मूर्तियों के लिए जाना जाता है। यहां की आकृतियों में शरीर की गतिशीलता, नर्तकियों की मुद्राएं आभूषणों की बारीकियां पत्थर पर उकेरी गई हैं। ऐसा लगता है कि कलाकार ने स्थिर पत्थर में भी गति का अनुभव पैदा करने की कोशिश की है।

4- रानी की वाव, पाटण, गुजरात

गुजरात की यह ऐतिहासिक बावड़ी अपनी बहुस्तरीय स्थापत्य योजना और उत्कृष्ट मूर्तिकला के लिए विश्वविख्यात है। इसकी दीवारों पर देवी-देवताओं, अप्सराओं और विभिन्न अलंकरणों से सजी स्त्री आकृतियों का विस्तृत संसार मिलता है। दर्पण देखती, केश संवारती और आभूषण धारण करती स्त्रियों की प्रतिमाएं तत्कालीन शिल्पियों की सूक्ष्म दृष्टि का परिचय देती हैं।

5- भूवराह स्वामी मंदिर, श्रीमुष्णम, तमिलनाडु

इस मंदिर की स्थापत्य और मूर्तिकला परंपरा भी अध्ययन योग्य है। दक्षिण भारतीय मंदिरों में स्त्री आकृतियों, केशसज्जा और अलंकरणों के विविध रूप मिलते हैं। हालांकि, किसी विशेष प्रतिमा के बारे में यह दावा करने से पहले उसके स्थान, काल और विशिष्ट पहचान की पुष्टि आवश्यक है।

इन स्थलों की यात्रा केवल सुंदर मूर्तियां देखने के लिए नहीं, बल्कि यह समझने के लिए भी की जा सकती है कि भारतीय कलाकारों ने मानव शरीर, भाव-भंगिमा, वस्त्र और आभूषणों को किस कलात्मक दृष्टि से प्रस्तुत किया।


संस्कृति का अर्थ केवल निषेध नहीं

इन उदाहरणों को देखने के बाद एक बुनियादी सवाल उठता है: क्या भारतीय संस्कृति को केवल त्याग, संन्यास, संयम और निषेध के आधार पर समझा जा सकता है? निश्चित रूप से नहीं। भारतीय परंपरा में दर्शन और अध्यात्म के साथ साहित्य, संगीत, नृत्य, प्रेम, शृंगार और सौंदर्यबोध की भी समृद्ध धाराएँ रही हैं।

इसका अर्थ यह नहीं कि प्राचीन भारत में स्त्रियों को हर क्षेत्र में समान स्वतंत्रता प्राप्त थी या समाज में कभी कोई बंधन नहीं था। इतिहास अधिक जटिल है। अलग-अलग कालों, क्षेत्रों और समुदायों में स्त्रियों की स्थिति तथा पहनावे से संबंधित मान्यताएं भी अलग रही हैं। फिर भी यह सच है कि भारतीय साहित्य और कला में स्त्री-सौंदर्य की प्रशंसा के अनेक उदाहरण मौजूद हैं।

इसलिए किसी महिला के कपड़ों के आधार पर उसके चरित्र, संस्कार या धार्मिक आस्था का फैसला करना उचित नहीं है। गरबा जैसे उत्सवों में सुरक्षा, सहमति और परस्पर सम्मान को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। पुरुषों को अपने व्यवहार की जिम्मेदारी स्वयं उठानी चाहिए। किसी स्त्री के पहनावे को अनुचित व्यवहार का कारण बताना इस जिम्मेदारी से बचना है।

स्त्री की स्वतंत्रता का अर्थ केवल यह नहीं कि वह अपनी पसंद के कपड़े पहन सके। इसका अर्थ यह भी है कि वह बिना डर, अपमान और अनावश्यक निगरानी के सार्वजनिक जीवन में भाग ले सके। उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करना समाज और व्यवस्था की जिम्मेदारी है, न कि उसके कपड़ों को नियंत्रित करके उस जिम्मेदारी से बच निकलना।

भारतीय संस्कृति के नाम पर बोलने वालों को अपने साहित्य, शिल्प और इतिहास का गंभीर अध्ययन करना चाहिए। यदि हमारी परंपरा में शृंगार और सौंदर्य के इतने विविध उदाहरण हैं, तो आज स्त्री के पहनावे को लेकर इतनी बेचैनी क्यों? परंपरा का सम्मान करने का अर्थ अतीत के हर विचार को आँख मूंदकर स्वीकार करना नहीं, बल्कि उसके व्यापक और बहुआयामी स्वरूप को समझना है।

सौंदर्य को देखने की दृष्टि में सम्मान होना चाहिए, अधिकार जताने की भावना नहीं। स्त्री को देवी कहकर उसकी स्वतंत्रता छीन लेना पूजा नहीं है। उसकी गरिमा, सुरक्षा, इच्छा और आनंद का सम्मान करना ही वास्तविक सांस्कृतिक परिपक्वता है।

हमारी विरासत में सौंदर्य भी है, शृंगार भी, अध्यात्म भी और जीवन का उत्सव भी। इन सबको एक साथ स्वीकार करने की उदारता ही उस विरासत को जीवित रख सकती है।


अनिकेत सिंह 

लवकुश कोचिंग क्लास, 

शाॅप नंबर-12, प्रथम तल,

अभिषेक एलिसियम, एक्सिस बैंक लेन, समा-सालवी रोड, न्यू समा,

बड़ौदा-390008 (गुजरात)

मो- 8368681336