जिन शिक्षको ने लाखों भविष्य संवारे, आज वही अपने भविष्य को लेकर क्यों है लाचार
25 वर्षों से कक्षाओं में ज्ञान बांट रहे अनुदानित स्ववित्तपोषित महाविद्यालयों के शिक्षकों की पीड़ा अब सुनी जानी चाहिए
बलिया।।कभी किसी शिक्षक से पूछिए कि उसके जीवन की सबसे बड़ी पूंजी क्या है? वह शायद कहेगा—उसके विद्यार्थी।
शिक्षक अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण समय विद्यार्थियों को पढ़ाने, उन्हें योग्य बनाने और उनके भविष्य को संवारने में लगा देता है। वह हजारों विद्यार्थियों को नौकरी, शोध, प्रतियोगिता और जीवन की चुनौतियों के लिए तैयार करता है। लेकिन आज उत्तर प्रदेश के हजारों स्ववित्तपोषित महाविद्यालयों के शिक्षक एक ऐसे प्रश्न के सामने खड़े हैं, जिसका उत्तर उनके पास स्वयं नहीं है—“हमारे अपने भविष्य का क्या होगा?”
यह प्रश्न केवल नौकरी का नहीं है। यह सम्मान का प्रश्न है। यह परिवार की सुरक्षा का प्रश्न है। यह वृद्धावस्था की चिंता का प्रश्न है और सबसे बढ़कर उस शिक्षक की पीड़ा का प्रश्न है, जिसने अपने जीवन के लगभग 25 वर्ष शिक्षा को दे दिए।
अनुदानित महाविद्यालयों में संचालित स्ववित्तपोषित पाठ्यक्रमों की व्यवस्था के अंतर्गत प्रदेश के लगभग 3000 शिक्षक वर्षों से अपनी सेवाएं दे रहे हैं। इनमें अनेक शिक्षक ऐसे हैं जिन्होंने अपनी युवावस्था से लेकर आज 45, 50 और 60 वर्ष की आयु तक विद्यार्थियों को पढ़ाया है। पीढ़ियां बदल गईं, विद्यार्थी बदल गए, पाठ्यक्रम बदले, शिक्षा की तकनीक बदली, लेकिन इन शिक्षकों की सेवा का भविष्य आज भी अनिश्चित बना हुआ है।
जिस उम्र में व्यक्ति अपने भविष्य को सुरक्षित मानकर परिवार के लिए निश्चिंत होना चाहता है, उसी उम्र में अनेक शिक्षक अपनी नौकरी और आय की स्थिरता को लेकर चिंतित हैं।
यह पीड़ा केवल शिक्षक की नहीं होती। उसके साथ उसका पूरा परिवार जीता है। घर का किराया, बच्चों की पढ़ाई, माता-पिता की जिम्मेदारी, बेटी की शिक्षा, पारिवारिक आवश्यकताएं और आने वाला बुढ़ापा—इन सबके बीच जब आय और सेवा की निश्चितता न हो तो शिक्षक बाहर से भले ही कक्षा में सामान्य दिखाई दे, लेकिन भीतर से वह लगातार चिंता में रहता है।
फिर भी उसने पढ़ाना नहीं छोड़ा।
क्योंकि उसके सामने विद्यार्थी होते हैं।
वह कक्षा में जाता है, पढ़ाता है, परीक्षा कराता है, विद्यार्थियों की समस्याएं सुनता है और उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है। शायद यही शिक्षक की सबसे बड़ी मजबूरी भी है और उसकी सबसे बड़ी महानता भी।
चिकित्सा सुरक्षा जरूरी है, लेकिन सेवा सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी
प्रदेश सरकार द्वारा शिक्षकों के लिए कैशलेस चिकित्सा सुविधा जैसी योजना निश्चित रूप से स्वास्थ्य सुरक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है। शिक्षक संगठन इसका उद्देश्य नकारता नहीं है।
लेकिन शिक्षकों का प्रश्न है—यदि शरीर के इलाज की सुविधा मिल जाए, तो क्या उस शिक्षक की चिंता समाप्त हो जाएगी जिसका रोजगार और भविष्य ही अनिश्चित है?
एक शिक्षक के लिए स्वास्थ्य सुरक्षा आवश्यक है, लेकिन उसके साथ रोजगार सुरक्षा, सम्मानजनक पारिश्रमिक और सेवा की स्थिरता भी आवश्यक है।
इसी पीड़ा को शासन तक पहुंचाने के लिए शिक्षक संगठन ने कैशलेस चिकित्सा योजना के बहिष्कार के माध्यम से अपना विरोध दर्ज कराने का निर्णय लिया है। यह किसी कल्याणकारी योजना के विरोध की भावना से नहीं, बल्कि सरकार का ध्यान वर्षों से लंबित मूल सेवा समस्या की ओर आकर्षित करने का प्रयास है।
*25 वर्षों की प्रतीक्षा अब समाप्त होनी चाहिए*
शिक्षकों का कहना है कि पिछले कई वर्षों से वे शासन, जनप्रतिनिधियों और संबंधित विभागों के सामने अपनी समस्याएं रखते आ रहे हैं। ज्ञापन दिए गए, पत्र भेजे गए, जनप्रतिनिधियों से संपर्क किया गया और विभिन्न स्तरों पर विषय उठाया गया। संगठन के अनुसार 50 से अधिक जनप्रतिनिधियों के समर्थन पत्र भी शासन को भेजे गए हैं।
लेकिन सवाल वही है—
आखिर कब तक?
एक शिक्षक जब 20-25 वर्ष सेवा कर चुका हो तो क्या उसकी पूरी जिंदगी केवल इस प्रतीक्षा में बीत जानी चाहिए कि कभी उसकी सेवा का भविष्य तय होगा?
सरकार से शिकायत नहीं, उम्मीद है
शिक्षक समाज सरकार से टकराव नहीं चाहता। शिक्षक व्यवस्था का विरोधी नहीं है। शिक्षक तो स्वयं व्यवस्था को मजबूत करने वाला वर्ग है।
इसीलिए आज प्रदेश के स्ववित्तपोषित शिक्षक मुख्यमंत्री जी से शिकायत से अधिक संवेदनशील हस्तक्षेप की उम्मीद कर रहे हैं।
उनकी मांग है कि अनुदानित महाविद्यालयों में संचालित स्ववित्तपोषित पाठ्यक्रमों की वर्षों पुरानी दोहरी व्यवस्था का स्थायी नीतिगत समाधान किया जाए। निर्धारित शैक्षणिक योग्यता के अनुरूप वर्षों से कार्यरत शिक्षकों की सेवाओं को नियमानुसार विनियमित अथवा संरक्षित करने पर विचार किया जाए। यदि यह तत्काल संभव न हो तो कम से कम यूजीसी मानकों के अनुरूप निश्चित एवं सम्मानजनक मानदेय तथा सेवा सुरक्षा की व्यवस्था की जाए।
यह मांग केवल शिक्षकों की आर्थिक मांग नहीं है।
यह उस व्यक्ति के सम्मान की मांग है, जो समाज को शिक्षित करता है।
माननीय मुख्यमंत्री जी से एक शिक्षक की पुकार
माननीय मुख्यमंत्री जी,
आपसे शिक्षक कोई विशेष सुविधा नहीं मांग रहा।
वह केवल यह चाहता है कि उसके 20-25 वर्षों के श्रम को देखा जाए।
उसकी कक्षा में पढ़े विद्यार्थियों की सफलता को देखा जाए।
उसके परिवार की चिंता को समझा जाए।
उसकी उम्र को देखा जाए।
और उस प्रश्न को सुना जाए जो आज हजारों शिक्षक अपने मन में लेकर बैठे हैं—
“हमने हजारों विद्यार्थियों का भविष्य बनाया, क्या हमारे भविष्य की चिंता भी सरकार करेगी?”
यह प्रश्न केवल लगभग 3000 शिक्षकों का नहीं है। यह हजारों शिक्षक परिवारों का प्रश्न है। यह उन विद्यार्थियों का प्रश्न है जिन्हें ये शिक्षक वर्षों से पढ़ाते आए हैं। यह प्रदेश की उच्च शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा प्रश्न है।
जनहित केवल सड़क, बिजली, पानी और स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। जनहित में वह शिक्षक भी शामिल है जो आने वाली पीढ़ी को तैयार करता है।
इसलिए आज आवश्यकता किसी पक्ष या विपक्ष की नहीं, बल्कि संवेदनशील संवाद और स्थायी समाधान की है।
शिक्षक आज भी कक्षा में खड़ा है।
उसके हाथ में वही किताब है।
सामने वही विद्यार्थी हैं।
बस मन में एक सवाल है—
“जब हम अपने विद्यार्थियों को कहते हैं कि मेहनत का फल जरूर मिलता है, तो अपने जीवन के 25 वर्षों की मेहनत का फल हमें कब मिलेगा?”
यही प्रश्न आज शासन, समाज और जनप्रतिनिधियों के सामने है।
और हमें विश्वास है कि इस प्रश्न का उत्तर संवेदनशीलता, संवाद और न्यायपूर्ण नीति के माध्यम से अवश्य खोजा जा सकता है।
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लेखक : डॉ सुनील कुमार ओझा, असिस्टेंट प्रोफेसर
अमर नाथ मिश्र पी जी कालेज दुबेछपरा बलिया उत्तर प्रदेश।
प्रदेश मीडिया प्रभारी, अनुदानित स्ववित्तपोषित शिक्षक संगठन उत्तरप्रदेश।

