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गोरक्षनाथ घाट हादसा: वज्रपात के बाद गिरी गुंबद की छत, मलबे में दबे दोनों अधिवक्ताओं की मौत

 



एम्बुलेंस से निर्माण तक सवालों के घेरे में


गोरखपुर।। राजघाट स्थित गुरु गोरक्षनाथ घाट पर रविवार को हुआ हादसा अब दो परिवारों के लिए कभी न भूलने वाला दुख बन गया है। अंतिम संस्कार में शामिल होने पहुंचे दो अधिवक्ता आलोक अस्थाना (45) और संजय सिंह (42) की मौत हो गई। दोनों बारिश से बचने के लिए घाट के एक चबूतरे पर बने गुंबदनुमा छज्जे के नीचे बैठे थे। इसी दौरान मौसम बिगड़ा, आकाशीय बिजली गिरी और देखते ही देखते छज्जा भरभराकर दोनों के ऊपर आ गिरा। दोनों मलबे में दब गए और गंभीर रूप से घायल हो गए। आसपास मौजूद लोगों ने किसी तरह मलबा हटाकर दोनों को बाहर निकाला, लेकिन इलाज के दौरान दोनों की जान नहीं बच सकी।


हादसा रविवार, 6 सितंबर को सुबह करीब 11:30 से 11:45 बजे के बीच हुआ। उस समय गुरु गोरक्षनाथ घाट पर साथी अधिवक्ता विनोद तिवारी की मां के अंतिम संस्कार की प्रक्रिया चल रही थी। अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए बड़ी संख्या में अधिवक्ता और अन्य लोग घाट पर मौजूद थे। बताया जा रहा है कि घाट पर उस समय 50 से अधिक लोग मौजूद थे। अचानक मौसम बदला और बारिश शुरू हो गई। बारिश से बचने के लिए कई लोग घाट परिसर में बने चबूतरों और उनके ऊपर बने गुंबदनुमा छज्जों के नीचे पहुंच गए। इसी दौरान तेज आवाज के साथ वज्रपात हुआ और जिस गुंबद के नीचे आलोक अस्थाना और संजय सिंह बैठे थे, उसका छज्जा अचानक नीचे आ गिरा।




कुछ ही सेकंड में वहां चीख-पुकार मच गई। भारी मलबे के नीचे दोनों अधिवक्ता दब गए। मौके पर मौजूद लोगों और घाट के सफाईकर्मियों ने बिना समय गंवाए मलबा हटाना शुरू किया। काफी मशक्कत के बाद दोनों को बाहर निकाला गया। दोनों की हालत गंभीर थी। सूचना मिलते ही राजघाट पुलिस भी मौके पर पहुंची और घायलों को अस्पताल पहुंचाने की व्यवस्था शुरू की गई।


लेकिन हादसे के बाद दूसरा बड़ा सवाल घायलों को अस्पताल पहुंचाने में हुई कथित देरी को लेकर खड़ा हुआ। मृतक अधिवक्ता के परिजनों और साथी अधिवक्ताओं का आरोप है कि घटना के तुरंत बाद एंबुलेंस के लिए फोन किए गए, लेकिन एंबुलेंस समय पर मौके पर नहीं पहुंची। अलग-अलग विवरणों में करीब 45 मिनट तक इंतजार किए जाने की बात सामने आई है। आखिरकार घायलों को निजी साधनों से अस्पताल ले जाना पड़ा। कुछ विवरणों में संजय सिंह को मैजिक और आलोक अस्थाना को ऑटो से ले जाने की बात सामने आई, जबकि कुछ प्रत्यक्षदर्शी विवरणों में पिकअप और ई-रिक्शा का भी उल्लेख है।


यही वजह रही कि हादसे के बाद गुस्सा केवल घाट तक सीमित नहीं रहा और जिला अस्पताल पहुंचते-पहुंचते यह आक्रोश विरोध-प्रदर्शन में बदल गया। हालांकि एंबुलेंस की वास्तविक देरी कितनी थी और उस देरी का इलाज पर क्या प्रभाव पड़ा, यह अभी जांच का विषय है। प्रशासन ने एंबुलेंस के कॉल रिकॉर्ड और रिस्पॉन्स टाइम की जांच शुरू कर दी है।


जिला अस्पताल पहुंचने के बाद दोनों की हालत गंभीर बनी हुई थी। आलोक अस्थाना की स्थिति ज्यादा नाजुक थी। चिकित्सकों ने उन्हें बेहतर उपचार के लिए बीआरडी मेडिकल कॉलेज रेफर किया। उन्हें मेडिकल कॉलेज ले जाया गया, लेकिन उनकी हालत लगातार बिगड़ती गई और चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। दूसरी तरफ संजय सिंह को भी गंभीर अवस्था में बीआरडी मेडिकल कॉलेज के इमरजेंसी ट्रॉमा सेंटर में भर्ती कराया गया। डॉक्टरों की निगरानी में उनका उपचार चलता रहा, लेकिन कई घंटे तक जिंदगी और मौत से जूझने के बाद रविवार देर शाम करीब आठ से नौ बजे के बीच उन्होंने भी दम तोड़ दिया।


इस तरह जिस हादसे में शुरुआत में एक अधिवक्ता की मौत की खबर सामने आई थी, वह कुछ ही घंटों में दो मौतों की त्रासदी में बदल गया। दोनों अधिवक्ता एक ही अंतिम संस्कार में शामिल होने पहुंचे थे और एक ही स्थान पर बारिश से बचने के लिए बैठे थे। कुछ देर बाद वही जगह दोनों के लिए मौत का कारण बन गई।


आलोक अस्थाना की मौत की खबर जिला अस्पताल और मेडिकल कॉलेज पहुंचते ही बड़ी संख्या में अधिवक्ता वहां जुटने लगे। एंबुलेंस की कथित देरी और इलाज में लापरवाही के आरोपों को लेकर अधिवक्ताओं में भारी नाराजगी रही। जिला अस्पताल की इमरजेंसी के सामने प्रदर्शन हुआ। सड़क पर भीड़ जुटने से कुछ समय के लिए जाम और अफरा-तफरी की स्थिति बन गई। पुलिस-प्रशासन के अधिकारी और कई थानों की पुलिस मौके पर पहुंची। कुछ रिपोर्टों में प्रदर्शन के दौरान एक एंबुलेंस में तोड़फोड़ किए जाने की बात भी सामने आई है।


इसी बीच मृतक अधिवक्ता आलोक अस्थाना की पत्नी शालिनी अस्थाना की ओर से पुलिस को शिकायत दी गई। शिकायत में हादसे के बाद अस्पताल पहुंचने से लेकर उपचार तक में लापरवाही के आरोप लगाए गए। शिकायत में सीएमओ डॉ. राजेश झा और जिला अस्पताल के स्वास्थ्यकर्मियों पर भी आरोप लगाए गए। पत्नी ने एक कथित बातचीत का उल्लेख करते हुए आपत्तिजनक टिप्पणी किए जाने का आरोप लगाया। पुलिस ने शिकायत के आधार पर मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।


हालांकि सीएमओ डॉ. राजेश झा ने इन आरोपों को बेबुनियाद बताया है। उनका कहना है कि घटना की जानकारी उन्हें जिलाधिकारी के माध्यम से मिली थी और वह तत्काल जिला अस्पताल पहुंचे थे। उन्होंने कहा कि उनकी मृतक अधिवक्ता की पत्नी से न मुलाकात हुई और न ही बातचीत। अस्पताल में मौजूद कुछ लोगों ने एंबुलेंस को लेकर मौखिक शिकायत की थी, जिसके बाद जांच के आदेश दिए गए। इसलिए उपचार में लापरवाही या कथित बातचीत से जुड़े आरोपों को फिलहाल अंतिम तथ्य नहीं माना जा सकता। पुलिस और प्रशासनिक जांच के बाद ही स्थिति पूरी तरह स्पष्ट होगी।


हादसे का तीसरा और बेहद गंभीर पहलू अब घाट पर बने गुंबदनुमा छज्जों की निर्माण गुणवत्ता बन गया है। गुरु गोरक्षनाथ घाट का निर्माण और सुंदरीकरण करीब 27 करोड़ 85 लाख 71 हजार रुपये की लागत से कराया गया था। परियोजना का प्रस्ताव वर्ष 2019 में तैयार हुआ था और 16 फरवरी 2021 को इसका लोकार्पण किया गया था। घाट पर अंतिम संस्कार में आने वाले लोगों के बैठने और विश्राम के लिए आठ से अधिक ऊंचे चबूतरे बनाए गए हैं। इन्हीं चबूतरों के ऊपर गुंबदनुमा छज्जे बनाए गए हैं।


अब सवाल यह है कि जिस संरचना को लोगों को बारिश और धूप से बचाने के लिए बनाया गया था, वह वज्रपात के दौरान इतनी आसानी से कैसे ढह गई? क्या संरचना पहले से कमजोर थी? क्या निर्माण में मानकों का पालन हुआ था? क्या समय-समय पर इसकी तकनीकी जांच और मेंटेनेंस हुआ था? और हादसे के बाद घाट पर मौजूद बाकी गुंबदों की सुरक्षा कितनी है? इन सभी सवालों के जवाब अब जांच में तलाशे जा रहे हैं।


जिलाधिकारी दीपक मीणा ने हादसे को गंभीरता से लेते हुए निर्माण की गुणवत्ता और घटना के कारणों की जांच के निर्देश दिए हैं। तत्कालीन जेई, एई और संबंधित ठेकेदार की भूमिका भी जांच के दायरे में है। पुलिस और क्राइम ब्रांच ने निर्माण से जुड़े लोगों से पूछताछ शुरू कर दी है और कुछ अधिकारियों तथा ठेकेदार को हिरासत में लेकर पूछताछ किए जाने की जानकारी सामने आई है।


इतना ही नहीं, जिलाधिकारी ने पूरे मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित कर दी है। इसमें अपर जिलाधिकारी नगर, पुलिस अधीक्षक नगर और बीआरडी मेडिकल कॉलेज के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. बीएन शुक्ला को शामिल किया गया है। समिति को हादसे के सभी पहलुओं की जांच कर सात दिन के भीतर रिपोर्ट देने के निर्देश दिए गए हैं।


इस समिति के सामने केवल यह सवाल नहीं होगा कि छज्जा क्यों गिरा। जांच में यह भी देखा जाएगा कि वज्रपात और छज्जा गिरने के बीच वास्तविक घटनाक्रम क्या था, संरचना की तकनीकी स्थिति कैसी थी, निर्माण में कौन-कौन अधिकारी और एजेंसी जिम्मेदार थी, घायलों को कितनी देर में अस्पताल पहुंचाया गया, एंबुलेंस को सूचना कब मिली और वह मौके पर कब पहुंची, अस्पताल में इलाज की प्रक्रिया क्या रही और कहीं किसी स्तर पर लापरवाही हुई या नहीं।


हादसे के बाद घाट परिसर की अन्य संरचनाओं को लेकर भी सावधानी बढ़ा दी गई है। सोमवार को श्रीगोरक्ष घाट और श्रीराम घाट परिसर में बने अन्य गाजीबो और प्रवेश द्वारों का निरीक्षण किया गया। निरीक्षण के दौरान एक प्रवेश द्वार में हल्की दरार भी दिखाई दी। संभावित खतरे को देखते हुए संबंधित स्थानों के आसपास बैनर लगाकर लोगों को दूर रहने की अपील की गई।


घाट के हैंडओवर को लेकर भी एक नया सवाल सामने आया है। नगर निगम का कहना है कि घाट अभी औपचारिक रूप से उसे हैंडओवर नहीं हुआ है, जबकि सिंचाई विभाग की ओर से वर्ष 2025 में हैंडओवर प्रक्रिया पूरी कर दस्तावेज सौंपे जाने का दावा किया गया है। यदि हैंडओवर हो चुका था तो रखरखाव और सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी थी और यदि नहीं हुआ था तो घाट की संरचनाओं की निगरानी कौन कर रहा था—यह बिंदु भी जांच में महत्वपूर्ण हो सकता है।


उधर, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने घटना का संज्ञान लेते हुए दोनों मृत अधिवक्ताओं के परिवारों को तत्काल राहत उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं। प्रशासन के मुताबिक दोनों परिवारों को आपदा राहत कोष से चार-चार लाख रुपये की सहायता राशि उपलब्ध करा दी गई है। इसके अतिरिक्त मुख्यमंत्री राहत कोष से पांच-पांच लाख रुपये की सहायता के लिए शासन को प्रस्ताव भेजा गया है। स्वीकृति मिलने के बाद यह राशि भी दोनों परिवारों को उपलब्ध कराई जाएगी।


आलोक अस्थाना की मौत के बाद रविवार देर शाम जब उनका शव घर पहुंचा तो परिवार में कोहराम मच गया। पत्नी शालिनी अस्थाना और बेटी सिद्धि का रो-रोकर बुरा हाल था। रिश्तेदार और परिचित परिवार को संभालते रहे। परिवार के मुताबिक आलोक का बेटा आदित्य एनआईटी पंजाब में बीटेक कर रहा है और उसके आने के बाद अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी की जानी थी।


सोमवार को दोनों अधिवक्ताओं को अंतिम विदाई दी गई। संजय सिंह का अंतिम संस्कार सहारा इस्टेट के मुक्तिपथ पर किया गया, जबकि आलोक अस्थाना का अंतिम संस्कार नगर निगम के मुक्तिधाम में हुआ। दोनों की अंतिम यात्रा में परिवार के सदस्यों के साथ बड़ी संख्या में अधिवक्ता और परिचित शामिल हुए।


गोरखपुर सिविल कोर्ट में भी दोनों अधिवक्ताओं के निधन पर शोक व्यक्त किया गया। बार के अधिवक्ताओं ने आलोक अस्थाना और संजय सिंह को श्रद्धांजलि दी। बार एसोसिएशन के अध्यक्ष एडवोकेट उमापति उपाध्याय और कार्यकारिणी के नेतृत्व में दोनों दिवंगत अधिवक्ताओं को श्रद्धासुमन अर्पित किए गए। अधिवक्ता समाज ने दोनों के आकस्मिक निधन को अपूरणीय क्षति बताया।



अब इस पूरे हादसे की सबसे बड़ी तस्वीर यही है कि दो अधिवक्ताओं की जान एक ऐसी संरचना के नीचे चली गई, जिसे लोगों की सुविधा और सुरक्षा के लिए बनाया गया था। हादसे के तत्काल बाद स्थानीय लोगों ने मलबा हटाकर दोनों को बाहर निकाला, लेकिन इसके बाद एंबुलेंस की कथित देरी, इलाज को लेकर लगाए गए आरोप, अस्पताल में हुआ विरोध, निर्माण की गुणवत्ता, अधिकारियों और ठेकेदार की भूमिका तथा घाट के रखरखाव की जिम्मेदारी जैसे कई सवाल सामने आ गए।


फिलहाल इतना स्पष्ट है कि दोनों अधिवक्ताओं की मौत छज्जा गिरने से लगी गंभीर चोटों के बाद उपचार के दौरान हुई। लेकिन एंबुलेंस की कथित देरी या उपचार में कथित लापरवाही को दोनों मौतों का अंतिम कारण अभी नहीं माना जा सकता। इसी तरह वज्रपात के दौरान छज्जा गिरने की घटना सामने आई है, लेकिन क्या केवल वज्रपात ही छज्जा गिरने का कारण था या निर्माण की गुणवत्ता अथवा संरचना की कमजोरी ने भी भूमिका निभाई, इसका जवाब तकनीकी जांच के बाद ही मिलेगा।


सात दिन में आने वाली तीन सदस्यीय समिति की रिपोर्ट, पुलिस जांच, निर्माण से जुड़े अभिलेखों की पड़ताल और एंबुलेंस के कॉल रिकॉर्ड इस मामले की आगे की तस्वीर साफ करेंगे। अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या यह महज प्राकृतिक आपदा थी, या प्राकृतिक घटना ने पहले से मौजूद किसी निर्माण अथवा व्यवस्था की कमजोरी को उजागर कर दिया? इसका फैसला जांच रिपोर्ट ही करेगी।