बेरोजगारी : देश के भविष्य के सामने खड़ा सबसे बड़ा सवाल,डिग्रियां बढ़ रही हैं, रोजगार के अवसर क्यों घट रहे हैं?
मधुसूदन सिंह
भारत आज दुनिया की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। विकास, बुनियादी ढांचे और तकनीक के क्षेत्र में देश ने उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन इसी तस्वीर का दूसरा पहलू बेहद चिंताजनक है—बेरोजगारी और रोजगार की गुणवत्ता का संकट। लाखों युवा वर्षों तक पढ़ाई करने के बाद भी स्थायी और सम्मानजनक रोजगार की तलाश में भटक रहे हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं में कुछ हजार पदों के लिए लाखों आवेदन इस समस्या की गंभीरता को स्वयं बयान करते हैं।
बेरोजगारी केवल नौकरी न मिलने का नाम नहीं है,कम वेतन, अस्थायी रोजगार, योग्यता के अनुरूप काम न मिलना और रोजगार की असुरक्षा भी इसी संकट का हिस्सा हैं। देश का युवा जब अपनी योग्यता के बावजूद अवसरों के लिए संघर्ष करता है तो उसका असर केवल उसके परिवार पर नहीं, बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था और सामाजिक व्यवस्था पर पड़ता है।
सरकारी नौकरी ही क्यों बनी सफलता का पर्याय?
बेरोजगारी की चर्चा करते समय एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि युवाओं के बीच सरकारी नौकरी की इतनी बड़ी होड़ क्यों है? इसका एक कारण निजी क्षेत्र में नौकरी की अस्थिरता और अपेक्षाकृत कम वेतन है। दूसरी ओर सरकारी नौकरी में सामाजिक प्रतिष्ठा, स्थायित्व और अनेक सुविधाएं युवाओं को आकर्षित करती हैं।
समस्या यह है कि सरकारी क्षेत्र अकेले इतनी बड़ी युवा आबादी को रोजगार नहीं दे सकता। इसलिए आवश्यकता ऐसी आर्थिक व्यवस्था की है जिसमें निजी उद्योग, छोटे व्यवसाय, स्टार्टअप, कृषि आधारित उद्योग और सेवा क्षेत्र बड़े पैमाने पर गुणवत्तापूर्ण रोजगार पैदा करें।
सरकारों को केवल रोजगार मेलों या घोषणाओं तक सीमित रहने के बजाय यह देखना होगा कि जिन युवाओं को प्रशिक्षण दिया जा रहा है, उन्हें वास्तव में नौकरी या स्वरोजगार का अवसर मिल भी रहा है या नहीं।
शिक्षा और रोजगार के बीच बढ़ती खाई
आज बड़ी संख्या में युवा स्नातक और परास्नातक हैं, लेकिन उद्योगों को जिस प्रकार के कौशल की आवश्यकता है, वह शिक्षा व्यवस्था में पर्याप्त रूप से विकसित नहीं हो पा रहा। यही कारण है कि एक तरफ कंपनियां योग्य कर्मचारियों की तलाश करती हैं और दूसरी तरफ डिग्रीधारी युवा नौकरी के लिए भटकते हैं।
डिग्री और रोजगार के बीच की इस खाई को पाटना समय की सबसे बड़ी जरूरत है। स्कूल और विश्वविद्यालय स्तर पर व्यावसायिक शिक्षा, तकनीकी प्रशिक्षण, डिजिटल कौशल, अप्रेंटिसशिप और उद्योग से जुड़े पाठ्यक्रमों को मजबूत करना होगा। युवाओं को केवल परीक्षा पास करने के लिए नहीं, बल्कि रोजगार योग्य बनने के लिए शिक्षित करना होगा।
रोजगार सृजन की दिशा में ठोस नीति जरूरी
देश की विशाल युवा आबादी को बोझ नहीं बल्कि ताकत बनाना होगा। इसके लिए श्रम प्रधान उद्योगों को प्रोत्साहन, छोटे एवं मध्यम उद्योगों को आसान ऋण, स्थानीय स्तर पर रोजगारपरक योजनाएं और स्वरोजगार को मजबूत आधार देना आवश्यक है।
गांवों में कृषि के साथ खाद्य प्रसंस्करण, डेयरी, हस्तशिल्प और छोटे उद्योगों को बढ़ावा दिया जाए तो युवाओं का पलायन भी कम हो सकता है। जिलों और छोटे शहरों में ऐसे औद्योगिक क्लस्टर विकसित करने की जरूरत है जहां स्थानीय युवाओं को उनके घर के आसपास रोजगार मिल सके।
सरकारों को रोजगार के आंकड़ों पर केवल राजनीतिक बहस करने के बजाय नौकरियों की संख्या, गुणवत्ता, वेतन और रोजगार की स्थिरता को लेकर स्पष्ट और पारदर्शी नीति अपनानी चाहिए।
युवा केवल नौकरी मांगने वाला नहीं, रोजगार देने वाला भी बने
यह भी सच है कि बदलती अर्थव्यवस्था में हर युवा के लिए सरकारी नौकरी संभव नहीं है। इसलिए युवाओं को उद्यमिता और स्वरोजगार के लिए तैयार करना होगा। लेकिन इसके लिए केवल यह कहना पर्याप्त नहीं कि "नौकरी खोजने के बजाय नौकरी देने वाला बनिए।" इसके लिए पूंजी, प्रशिक्षण, बाजार, तकनीकी सहायता और प्रशासनिक सहयोग की वास्तविक व्यवस्था करनी होगी।
भारत का युवा अवसर मिलने पर अपनी क्षमता साबित कर सकता है। आवश्यकता केवल इतनी है कि नीति और नियत दोनों रोजगार केंद्रित हों।
बेरोजगारी किसी एक सरकार, दल या वर्ग की समस्या नहीं है। यह देश के भविष्य से जुड़ा प्रश्न है। जिस देश की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा आबादी है, वहां युवाओं के हाथ में काम और आंखों में भविष्य का भरोसा होना चाहिए।
सरकारें बदल सकती हैं, नीतियां बदल सकती हैं, लेकिन रोजगार का सवाल हर सरकार के सामने खड़ा रहेगा। अब समय आ गया है कि रोजगार को चुनावी घोषणा का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया जाए।
युवाओं को सिर्फ डिग्री नहीं, दिशा चाहिए; सिर्फ परीक्षा नहीं, अवसर चाहिए; सिर्फ वादा नहीं, रोजगार चाहिए।







