हरिजन एक्ट : कांग्रेस के बाद क्या बीजेपी की है महा पतन की बारी?ना ख़ुदा ही मिला, न विसाले-सनम
1989 की सियासत, हरिजन एक्ट और कांग्रेस का महा-पतन
कहीं मोदी तो इस दिशा में नहीं मुड़ रहे हैं
लखनऊ।। भारतीय राजनीति के फलक पर 1980 के दशक का आखिरी दौर सत्ता के संतुलन के बिखरने की दास्तान है। मशहूर शायर जिगर मुरादाबादी का मिसरा—"ना ख़ुदा ही मिला, न विसाले-सनम, न इधर के रहे, न उधर के रहे"—यह किसी दौर की कांग्रेस और तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की रणनीतिक भूलों पर सबसे सटीक बैठती है, तो वह 1989 का दौर था। 1984 में 400 से अधिक सीटों के प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आई पार्टी ने कुछ ही वर्षों में अपने पैरों तले की ज़मीन कुछ इस तरह खोई कि फिर कभी अपने दम पर दिल्ली की पूर्ण सत्ता का मुंह नहीं देख सकी।
कांशीराम का उभार और सत्ता के गलियारों में खलबली
आजादी के बाद से उत्तर भारत, विशेषकर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का आधार एक अटूट सामाजिक गठजोड़ था—ब्राह्मण, मुस्लिम और दलित। इस समीकरण को सबसे पहली और गहरी चुनौती दी बामसेफ और डीएस-4 के जरिए सामाजिक जमीन तैयार कर चुके कांशीराम ने। 1984 में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के गठन के बाद कांशीराम ने सीधे दलितों के आत्मसम्मान और सत्ता में हिस्सेदारी का बिगुल फूंका।
1987 के हरिद्वार और 1988 के इलाहाबाद लोकसभा उपचुनावों ने कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की नींद उड़ा दी। जब कांशीराम और मायावती ने बिना किसी बड़े संसाधन के सीधे कांग्रेस के पारंपरिक दलित वोटों में भारी सेंध लगाई, तो कांग्रेस खेमे में भारी बेचैनी फैल गई। दशकों से कांग्रेस को अपना स्वाभाविक अभिभावक मानने वाला यह वर्ग अब अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहा था।
हरिजन एक्ट का दांव : हड़बड़ाहट में उठाया गया कदम
बोफोर्स विवाद, वी.पी. सिंह के बगावती तेवर और राम जन्मभूमि आंदोलन के उभार से चौतरफा घिरी राजीव गांधी सरकार को लगा कि अगर दलित वोट छिटक गया, तो सत्ता हाथ से निकल जाएगी। इसी घबराहट और हड़बड़ाहट में सितंबर 1989 के आम चुनाव से ठीक पहले संसद से अत्यंत सख्त अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (जिसे बोलचाल में हरिजन एक्ट कहा गया) पारित कराया गया।
रणनीतिकारों का सोचना था कि इस कानून के जरिए दलित समुदाय को हमेशा के लिए पार्टी के पाले में बांध लिया जाएगा। लेकिन राजनीति में प्रतीकों और समय का बड़ा महत्व होता है। यह कानून न तो दलितों के बीच कांशीराम के प्रभाव को रोक पाया और न ही कांग्रेस को उसका पुराना जनाधार लौटा सका। दलित समाज ने इसे कांग्रेस की सद्भावना के बजाय अपनी बढ़ती ताकत और कांशीराम के दबाव का नतीजा माना। नारा गूंज उठा—"वोट हमारा, राज तुम्हारा—नहीं चलेगा।"
सामाजिक दरार और जातियों का नया ध्रुवीकरण
इस कड़े कानून के पारित होते ही उत्तर भारत के ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में गहरा सामाजिक तनाव और अविश्वास पैदा हो गया। अगड़ी और प्रभावशाली मध्यवर्ती जातियों के बड़े तबके को लगा कि सत्ता अपनी कमजोरी छिपाने के लिए एकतरफा संतुलन बना रही है। इस असंतोष ने उस सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर दिया, जिस पर कांग्रेस दशकों से राज कर रही थी।जातिगत चेतना की जो धारा इस दौर में फूटी, उसने राजनीति को हमेशा के लिए खंडित कर दिया।
जनता दल और मंडल का तूफान : वी.पी. सिंह के नेतृत्व में जनता दल पहले से ही सत्ता विरोधी लहर पर सवार था। आगे चलकर जब मंडल आयोग की सिफारिशें लागू हुईं, तो पिछड़ी जातियों का बड़ा वर्ग पूरी तरह जनता दल की रीढ़ बन गया।
मुलायम सिंह यादव और सपा का उदय: जनता दल के बिखराव के बाद मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी का गठन कर अन्य पिछड़ा वर्ग (विशेषकर यादव) और मुस्लिम मतदाताओं को एकजुट कर एक नया, अभेद्य सामाजिक समीकरण तैयार कर लिया।
कमंडल और भाजपा का उभार: कांग्रेस से नाराज और असुरक्षित महसूस कर रहा अगड़ा वर्ग तेजी से भारतीय जनता पार्टी के राम मंदिर आंदोलन और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की ओर मुड़ गया।
बसपा का अभेद्य किला: दलित समुदाय ने पूरी तरह कांशीराम और मायावती के नेतृत्व को अपना राजनीतिक ठिकाना बना लिया।
कांग्रेस का सूर्यास्त: न इधर के रहे, न उधर के रहे
1989 का यह फैसला कांग्रेस के लिए ऐसा आत्मघाती मोड़ साबित हुआ जहां पार्टी के हाथ से सब कुछ रेत की तरह फिसल गया। दलित पूरी तरह बसपा के साथ चले गए, पिछड़ा वर्ग और मुसलमान मुलायम-लालू-वी.पी. सिंह के खेमे में बंट गए, और पारंपरिक सवर्ण मतदाता भाजपा की झोली में जा गिरा।
उत्तर प्रदेश, जो 85 (अब 80) सांसदों के साथ देश की सत्ता की दिशा तय करता था, वहां कांग्रेस तीसरे-चौथे नंबर का हाशिए का दल बनकर सिमट गई। 1989 के आम चुनाव में राजीव गांधी की सरकार गिरी और उसके बाद से आज तक कांग्रेस पार्टी संसद में अपने बूते पर 272 के जादुई आंकड़े को दोबारा कभी नहीं छू सकी। वोट बैंक बचाने की बेचैनी में लाया गया वह एक कदम आखिरकार कांग्रेस के उस ऐतिहासिक एकाधिकार के अंत का सबब बन गया, जिसकी भरपाई वह दशकों बाद भी नहीं कर पाई।
रणनीतिकारों का कहना है कि राजीव गांधी की ही गलती प्रधानमंत्री श्री मोदी भी दुहरा रहे है। दलित मतदाताओं को बसपा से खींचने के चक्कर मे यूजीसी लाकर अपने कोर सवर्ण मतदाताओं को नाराज कर बैठे है। दलित तो बीजेपी के साथ आये नहीं अल्बता सवर्ण मतदाताओं का दूर होने की संभावना बलवती हो गयी है।







