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चार माह के रेयांश की जिंदगी पर संकट, SMA टाइप-1 से जंग; इलाज के लिए परिवार ने मांगी मदद





गोरखपुर। बांसगांव क्षेत्र के दुबौली गांव निवासी आलोक का चार माह का बेटा रेयांश एक दुर्लभ और गंभीर आनुवंशिक बीमारी स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी यानी SMA टाइप-1 से जूझ रहा है। बीमारी ने मासूम की मांसपेशियों को तेजी से कमजोर कर दिया है। परिजनों के मुताबिक अब वह अपने हाथ-पैर भी सामान्य रूप से नहीं चला पा रहा है। बच्चे की हालत को देखते हुए परिवार जल्द से जल्द इलाज शुरू कराने की कोशिश में जुटा है, लेकिन उपचार की भारी लागत उनके सामने बड़ी चुनौती बनकर खड़ी है। परिवार ने मुख्यमंत्री, जनप्रतिनिधियों, समाजसेवियों और आम लोगों से आर्थिक सहयोग की अपील की है।


गोरखपुर जर्नलिस्ट्स प्रेस क्लब में आयोजित प्रेस वार्ता के दौरान बच्चे के पिता आलोक ने बताया कि रेयांश के जन्म के कुछ समय बाद ही उसके शरीर में सामान्य बच्चों से अलग लक्षण दिखाई देने लगे थे। शुरुआत में परिवार को बीमारी की गंभीरता का अंदाजा नहीं था। चिकित्सकीय जांच और जरूरी परीक्षणों के बाद डॉक्टरों ने SMA टाइप-1 की पुष्टि की। इसके बाद से परिवार बच्चे के उपचार के लिए लगातार प्रयास कर रहा है।


SMA ऐसी बीमारी है, जिसमें शरीर की उन तंत्रिका कोशिकाओं पर असर पड़ता है जो मांसपेशियों को चलाने और नियंत्रित करने का काम करती हैं। सामान्य स्थिति में SMN1 जीन शरीर में SMN नाम का एक जरूरी प्रोटीन बनाने में मदद करता है। SMA से प्रभावित बच्चों में इस जीन की कार्यक्षमता में गंभीर कमी होने के कारण यह प्रोटीन पर्याप्त मात्रा में नहीं बन पाता। इसका सीधा असर मोटर न्यूरॉन्स पर पड़ता है और समय के साथ मांसपेशियों की ताकत कम होने लगती है।


यह बीमारी संक्रामक नहीं होती, बल्कि आनुवंशिक कारणों से होती है। कई मामलों में माता-पिता स्वयं स्वस्थ दिखाई देते हैं, लेकिन वे खराब जीन की एक-एक प्रति के वाहक हो सकते हैं। यदि बच्चे को दोनों तरफ से प्रभावित SMN1 जीन मिल जाएं तो उसमें SMA विकसित हो सकती है। यही वजह है कि कई बार परिवार में पहले किसी व्यक्ति को यह बीमारी न होने के बावजूद बच्चे में इसके लक्षण सामने आ जाते हैं।


SMA के अलग-अलग प्रकार होते हैं, जिनमें टाइप-1 सबसे गंभीर रूपों में शामिल है। यह अक्सर शिशु के जीवन के शुरुआती महीनों में दिखाई देता है। ऐसे बच्चों में मांसपेशियों की कमजोरी के कारण गर्दन संभालने, पलटने, बैठने और हाथ-पैर चलाने जैसी गतिविधियां प्रभावित हो सकती हैं। गंभीर स्थिति में निगलने और सांस लेने वाली मांसपेशियां भी कमजोर हो सकती हैं। इसी कारण SMA टाइप-1 में बीमारी की पहचान और उपचार में देरी को गंभीर माना जाता है।


रेयांश के मामले में परिवार जिस उपचार की उम्मीद कर रहा है, उसमें जोल्जेन्स्मा (Zolgensma) जीन थेरेपी का नाम सामने आया है। यह सामान्य दवाओं या नियमित रूप से लगाए जाने वाले इंजेक्शन से अलग उपचार है। इसमें एक विशेष वायरल वेक्टर के माध्यम से कार्यशील SMN1 जीन की प्रति शरीर की कोशिकाओं तक पहुंचाने का प्रयास किया जाता है, ताकि शरीर आवश्यक SMN प्रोटीन का निर्माण कर सके। यह उपचार एक बार दिया जाता है और इसके लिए विशेषज्ञ चिकित्सकों की निगरानी जरूरी होती है।


जोल्जेन्स्मा की कीमत करोड़ों रुपये में होने की सबसे बड़ी वजह इसकी अत्याधुनिक जीन थेरेपी तकनीक है। सामान्य दवाओं की तरह इसका उत्पादन बड़े पैमाने पर नहीं होता। इसके विकास में लंबे समय तक वैज्ञानिक शोध, क्लीनिकल ट्रायल, जीन आधारित तकनीक और बेहद नियंत्रित निर्माण प्रक्रिया शामिल होती है। इसके अलावा SMA एक दुर्लभ बीमारी है, इसलिए इसके संभावित मरीजों की संख्या सामान्य बीमारियों की तुलना में बहुत कम है। इन सभी कारणों से ऐसी जीन थेरेपी की कीमत बहुत अधिक हो जाती है। भारत सरकार के दुर्लभ रोग संबंधी दस्तावेज में भी Zolgensma की अनुमानित लागत करीब 16 करोड़ रुपये बताई गई है।


हालांकि चिकित्सा विज्ञान में SMA के उपचार के लिए केवल एक ही विकल्प नहीं है। बीमारी की गंभीरता, बच्चे की उम्र, आनुवंशिक जांच और चिकित्सकीय स्थिति के आधार पर विशेषज्ञ अलग-अलग उपचारों पर विचार करते हैं। Zolgensma के अलावा nusinersen और risdiplam जैसी उपचार पद्धतियां भी SMA के प्रबंधन में इस्तेमाल की जाती हैं। इसलिए किसी बच्चे के लिए कौन-सा उपचार उपयुक्त होगा, इसका निर्णय संबंधित विशेषज्ञ चिकित्सक ही कर सकते हैं।


रेयांश के परिवार के लिए समस्या बीमारी जितनी गंभीर है, उतनी ही बड़ी चुनौती इलाज की लागत भी है। पिता आलोक का कहना है कि एक सामान्य परिवार के लिए करोड़ों रुपये की व्यवस्था करना संभव नहीं है। परिवार ने मुख्यमंत्री, बांसगांव सांसद कमलेश पासवान, अन्य जनप्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों, समाजसेवियों और आर्थिक रूप से सक्षम लोगों से मदद की अपील की है। परिजनों का कहना है कि उन्हें उम्मीद है कि सामूहिक सहयोग से बच्चे के इलाज के लिए आवश्यक राशि जुटाई जा सकेगी।


SMA जैसी बीमारी में समय का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि बीमारी के कारण मोटर न्यूरॉन्स को लगातार नुकसान हो सकता है। उपलब्ध उपचारों का उद्देश्य बीमारी की प्रगति को रोकना या कम करना और बच्चे की शारीरिक क्षमताओं को बेहतर बनाए रखना होता है। शुरुआती अवस्था में उपचार मिलने से परिणाम बेहतर होने की संभावना रहती है। हालांकि उपचार के परिणाम हर बच्चे में उसकी स्थिति और बीमारी के स्तर के अनुसार अलग हो सकते हैं।


रेयांश अभी केवल चार महीने का है। परिवार के लिए यह उम्र उसके जीवन की शुरुआत है, लेकिन बीमारी ने इसी उम्र में उनके सामने करोड़ों रुपये के इलाज की चुनौती खड़ी कर दी है। पिता की अपील है कि यदि समाज और जनप्रतिनिधियों का सहयोग मिले तो उनके मासूम बेटे को समय पर उपचार दिलाया जा सकता है। अब परिवार की उम्मीद उन मददगार हाथों पर टिकी है, जिनके सहयोग से रेयांश के इलाज का रास्ता खुल सके।