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छठवे दिन की कथा मे पंडित प्रदीप मिश्रा ने बताया, कैसे अटूट गुरु भक्ति, दृढ संकल्प और शिव की कृपा जीवन को बना देती है अति सुन्दर

 

 


मधुसूदन सिंह 

बलिया।। बाबा बालखंडी नाथ के सानिध्य मे दिउली ग्राम मे परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह के आयोजकत्व मे चल रही शिव महापुराण कथा के छठवे दिन शिव भक्तों का महासागर उमड़ पड़ा। लगभग 8लाख शिवभक्तो (99.99% महिलाये ) को जीवन को सुन्दर, वैभवशाली बनाने के साथ संस्कार युक्त कैसे बनाया जाय, उसको सुप्रसिद्ध कथा वाचक पंडित प्रदीप मिश्रा ने कई प्रसंगों के माध्यम से समझाया।

अपने प्रवचन के शुभारम्भ मे श्री मिश्रा ने कहा कि जब शिव के प्रति विश्वास अटूट बन जाता है, कोई आडंबर नहीं रहता है,कर्मो मे सहजता और सरलता आ जाती है, भोला भंडारी तुरंत अपनी कृपा बरसाने लगते है। बताया कि लोग अपने जीवन को धन कमाने मे, घर बनाने मे, परिवार को सुख देने मे अज्ञानता के कारण बिता देते है। बताया कि मनुष्य योनि को लेकर 84 लाख योनियां है। हर योनी मे बीबी बच्चे, घर परिवार मिलता है। लेकिन मानव योनी को छोड़कर किसी भी योनी मे शिव को एक लोटा जल चढ़ाने का सौभाग्य नहीं मिलता है।

समझाया कि जिस तरह बारिश की एक ही बूंद होती है। जब वह मिट्टी पर गिरती है तो कीचड़ बन जाती है लेकिन यही बूंद जब सीप मे गिरती है तो मोती बन जाती है। इसी तरह भोलेनाथ है, आप पूरे विश्वास के साथ इनपर आस्था बनाये रखे। बाबा कब आपके एक लोटा जल से आपका जीवन मोती जैसा बना देंगे, कहा नहीं जा सकता है।





                             समुद्र से ले सीख 

पंडित प्रदीप मिश्रा ने शिव भक्तों को अपना हृदय समुद्र जैसे गहरा बनाने की सलाह दी। बताया कि जिस तरह समुद्र कूड़े कर्कट को अपनी लहरों के माध्यम से किनारे फेक देता है और सोना चांदी हीरे मोती आदि बहुमूल्य चीजों को अपनी गहराई मे छुपा लेता है, उसी तरह हमारा भी हृदय होना चाहिये। अगर कोई हमको अपना जानकर अपनी पीड़ा दुःख दर्द को बता है तो हमें समुद्र की तरह ही उसे बहुमूल्य समझकर हृदय की गहराइयों मे छुपा लेना चाहिये और अपनी सामर्थ्य के अनुसार समाधान करना चाहिये। यह नहीं कि उसकी बातों को जगह जगह कह कर उसको हंसी का पात्र बनाना चाहिये।

मौन स्वरुप से सनकादि ऋषियों की शंका का किया समाधान 

 चार महान ऋषियों (सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार) को यज्ञ होम तपस्या आदि करने के बाद भी चित्त मे शांति नहीं मिल रही है। ये चारो ऋषि अपने अशांत चित्त को लेकर बहुत परेशान थे। तब भोलेनाथ ने इन बाल ऋषियों के अशांत चित्त को शांत करने के लिये, ज्ञान देने के लिये गुरु के रूप मे मौन साधना करके बैठ गये।भगवान भोलेनाथ का यह रूप दक्षिणामूर्ति भगवान के रूप मे प्रसिद्ध है।

दक्षिणामूर्ति हिंदू धर्म में भगवान शिव का वह रूप है, जो उन्हें ज्ञान, योग, संगीत और विद्या के सर्वोच्च गुरु (आदिगुरु) के रूप में दर्शाता है। इस रूप में, शिव दक्षिण दिशा की ओर मुख करके एक वट (बरगद) वृक्ष के नीचे मौन मुद्रा में विराजमान रहते हैं।

प्रमुख विशेषताएँ और रूप,दक्षिण दिशा से संबंध

संस्कृत में 'दक्षिण' का अर्थ 'दाहिना' (Right) भी होता है, जो ज्ञान के मार्ग (दाहिने रास्ते) का प्रतीक है। इसके अलावा, दक्षिण दिशा को परिवर्तन और ज्ञान का मार्ग भी माना जाता है।चार ऋषियों को ज्ञान: इस स्वरूप में, शिव अपने से बहुत कम उम्र के चार महान ऋषियों (सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार) को ज्ञान प्रदान करते हैं। यह ज्ञान शब्दों के माध्यम से नहीं, बल्कि मौन और एक विशेष मुद्रा के द्वारा दिया जाता है।

चिन्मुद्रा (ज्ञान मुद्रा)

उनका दाहिना हाथ ज्ञान मुद्रा (चिन्मुद्रा) में होता है। अंगूठा 'ब्रह्म' और तर्जनी 'जीव' का प्रतीक है, जो दोनों के मिलन को दर्शाती है। उनके हाथों में आमतौर पर रुद्राक्ष की माला, आग की लौ, और वेद (शास्त्र) होते हैं।

दार्शनिक महत्व 

दक्षिणामूर्ति का रूप यह सिखाता है कि आत्म-साक्षात्कार और परम ज्ञान मौन (साइलेंस) और आंतरिक शांति के माध्यम से ही प्राप्त किया जा सकता है।आदिगुरु शंकराचार्य द्वारा रचित प्रसिद्ध 'दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम' का पाठ करके भक्त इस रूप का ध्यान और स्तुति करते हैं।





पशुपति व्रत, उपमन्यु ऋषि और भगवान श्रीकृष्ण से संबंध 

पशुपति व्रत के संबंध मे बताते हुए पंडित प्रदीप मिश्रा ने कहा कि यह इतना शक्तिशाली व्रत है, जिसको भगवान श्रीकृष्ण को भी संतान प्राप्ति के लिये करना पड़ा था। कहा कि 5 साल के उपमन्यु ऋषि का जन्म गरीब परिवार मे हुआ था। एक दिन उनको अन्य बच्चों की तरह ही दूध पीने की इच्छा हुई। उन्होंने अपनी मां से दूध पीने की जिद कर दी। बच्चे की जिद और अपनी गरीबी से मां के आँखों से अश्रु बह गये। मां ने गिलास मे आटा घोलकर दूध कहकर पीने को दिया। उपमन्यु ने दूध पीते ही उसको थूकते हुए कहा कि मुझे दूध चाहिये, ये तो आटा है। तब रोती हुई मां ने कहा कि अगर दूध पीना है तो शिव की आराधना कर वही पूरे संसार को दूध देते है।

छोटे से उपमन्यु ने मां की बात मानकर जंगल मे पार्थिव शिवलिंग बनाकर घोर तपस्या शुरू की। एक दिन शिव जी उपमन्यु की परीक्षा लेने के लिये इंद्र का रूप बनाकर गये। उपमन्यु से बोले शिव की पूजा क्यों कर रहो हो, क्या चाहिये? उपमन्यु ने कहा कि मुझे भोलेनाथ से दूध चाहिये। तब भोलेनाथ ने कहा कि भगवान विष्णु की करों जो तुम्हे हर तरह का सुख संपत्ति, वैभव दे देंगे। अन्य देवताओ की करों जो तुम को मनचाहा वरदान दे देंगे। तब उपमन्यु ने कहा कि मुझे जब पिता (शिव ) से ही सब कुछ मिल जायेगा, तब दूसरे से क्या मांगना है।जब पूरे संसार का खजाना विश्वनाथ भरते है तो दूसरे से क्या याचना करना है। तब भगवान भोलेनाथ ने प्रसन्न होकर उपमन्यु को कभी खत्म न होने वाली सम्पदा और पशुपति व्रत की विधि बतायी।साथ ही शिवजी ने उन्हें अमरत्व, अक्षय ज्ञान और अपने गणों का सर्वोच्च नेतृत्व (ईश्वरत्व) प्रदान किया

जब भगवान श्रीकृष्ण को 16108 रानियों के बाद भी संतान की प्राप्ति नहीं हो रही थी तो वे उपमन्यु ऋषि के पास गये। उपमन्यु ऋषि ने भगवान श्रीकृष्ण से सपत्निक पशुपति व्रत कराया। भगवान श्रीकृष्ण की एक एक पत्नी ने पशुपति व्रत करने के साथ 11-11 दिन पार्थिव शिवलिंग का पूजन किया। जिससे भोलेनाथ प्रसन्न होकर बोले कि हे श्रीकृष्ण आपकी पत्नियों ने मेरी 11-11 बार पार्थिव लिंग के रूप मे पूजा की है, इसलिए सभी के गर्भ से 11-11 संताने होंगी जिसमे 10 पुत्र और 1 पुत्री होंगी। इस आशीर्वाद से भगवान श्रीकृष्ण को 177686 संतान का पिता बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

 

भगवान के लिये भक्त भी करते है त्याग 

प्रदीप मिश्रा ने ताड़कासूर के प्रसंग के माध्यम से यह समझाने का प्रयास किया कि केवल भगवान ही नहीं बल्कि उनके भक्त भी भगवान की भलाई के लिये त्याग और अपना बलिदान देते है। श्री मिश्रा ने ताड़कासूर का ब्रह्मा जी से भगवान शिव के पुत्र के हाथों ही मारे जाने का वरदान प्राप्त करने और भगवान कार्तिकेय से युद्ध का वर्णन करते हुए बताया कि ताड़कासूर का बध करने निकले भगवान कार्तिकेय को माता पार्वती ने समझाया कि पुत्र ताड़कासूर के हृदय मे तीर मत मारना क्योंकि उसके हृदय मे देवाधिदेव महादेव निवास करते है। इसके बाद कार्तिकेय जी ने ताड़कासूर का बध उसके उदर मे तीर मारकर किया। जब ताड़कासूर मर रहा था तो उसके सामने भोलेनाथ खड़े थे। भोलेनाथ ने कहा -तुम मेरे ही पुत्र के हाथों मारे जाने का वरदान क्यों मांगे? तो ताड़कासुर ने कहा - महादेव आप मेरे आराध्य है, आप माता सती के जाने के बाद अकेले पड़ गये थे और विवाह नहीं कर रहे थे। आपके अकेलापन को दूर करने के लिये ही मैंने यह वरदान माँगा था जिससे आपका पुनः विवाह हो जाये और आपका पुत्र पैदा होकर मेरा बध करें। यह भक्त का अपने आराध्य के प्रति आत्म निछावर का सबसे बड़ा उदाहरण है।

कथा के अंत मे श्री गणेश जी का रिद्धि सिद्धि के साथ विवाह को दर्शाया गया और राज्य सभा के उप सभापति श्री हरवंश जी, मंत्री मनोज पांडेय, परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह, मंत्री दयालु मिश्रा, पूर्व मंत्री नारद राय, धर्मेंद्र सिंह के साथ ही माता तेतरी देवी व अन्य परिजनों ने भगवान शिव की आरती की। इसके बाद छठे दिन की कथा का विश्राम हुआ।