भोजशाला विवाद : मुस्लिम पक्ष की दलिलो का हिन्दू पक्ष ने जोरदार ढंग से किया विरोध
भोपाल।।आज मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में भोजशाला 5 की सुनवाई के दौरान, हिंदू पक्ष की ओर से याचिकाकर्ता कुलदीप ति8वारी के अधिवक्ता श्री मनीष गुप्ता ने मुस्लिम पक्ष की आपत्तियों का विस्तृत एवं पुरजोर खंडन किया।
मुस्लिम पक्ष ने हिंदू पक्ष की याचिकाओं को सुनवाई योग्य न होना बताते हुए इन्हें विलंब से प्रस्तुत करना बताया। उन्होंने भोजशाला से प्राप्त मूर्ति को मां वाग्देवी के बजाय जैन अंबिका की मूर्ति होना बताया तथा यह दावा किया कि भोजशाला हमेशा से मस्जिद रही है। साथ ही, उन्होंने अलाउद्दीन खिलजी के 1305 ई. के आक्रमण से पूर्व हिंदू राजाओं द्वारा पांच बार धार पर आक्रमण कर मंदिर तोड़ने का उल्लेख किया, लेकिन खिलजी द्वारा मंदिर तोड़ने का कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया।
श्री मनीष गुप्ता ने इन आपत्तियों का ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर समग्र खंडन करते हुए भोजशाला को प्राचीन मंदिर घोषित करने की मांग दोहराई। उनके द्वारा निम्नलिखित तर्क माननीय न्यायालय के समक्ष रखे गए हैं:
1. *याचिका की सुनवाई योग्यता:* यह याचिका पूजा एवं धार्मिक अधिकारों से संबंधित है तथा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की वैधानिक जिम्मेदारियों को सुनिश्चित करने हेतु प्रस्तुत की गई है, अतः पूर्णतः सुनवाई योग्य है।
2. *विलंब का अभाव*: हर शुक्रवार भोजशाला में नमाज़ आयोजित होने से याचिका प्रस्तुत करने का कारण निरंतर उत्पन्न होता रहता है, इसलिए कोई विलंब नहीं है।
3. *मूर्ति की पहचान:* ब्रिटिश संग्रहालय में संरक्षित मां वाग्देवी की मूर्ति के नीचे अंकित शिलालेख स्पष्टतः इसे मां वाग्देवी की मूर्ति घोषित करता है। इसमें उल्लेख है कि राजा भोज ने विक्रम संवत् 1091 में इसकी प्राण-प्रतिष्ठा करवाई थी।
4. *मंदिर के लक्षण:* किसी इमारत को मस्जिद सिद्ध करने हेतु विशिष्ट लक्षण अनिवार्य हैं—जैसे मीनार (अजान हेतु), वजू-स्थान तथा पश्चिम दिशा निर्देशक मेहराब। भोजशाला में ये अनुपस्थित हैं। भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा प्रस्तुत सर्वेक्षण रिपोर्ट से सिद्ध होता है कि पश्चिमी दीवार के मध्य में मेहराब बाद में काटकर बनाई गई, क्योंकि पूरी नींव पश्चिमी दीवार के नीचे मौजूद है किंतु मेहराब के नीचे नींव नहीं है। इस इमारत में कोई वजू खाना भी नहीं है और मीनार भी नहीं है।
5. *मंदिर के प्रमाण:* राजा भोज रचित 'समरांगण सूत्रधार' ग्रंथ के अनुसार, भोजशाला की लंबाई-चौड़ाई 6x4 अनुपात में है। मध्य में चौकोर हवन कुंड (9 हस्त लंबाई-चौड़ाई) ईंटों से निर्मित है, जबकि संपूर्ण इमारत पत्थरों की है। मंदिर का मुख्य द्वार पूर्व की ओर है —जो ग्रंथानुसार मंदिर का स्पष्ट लक्षण है।
6. *शिलालेखों का महत्व:* भोजशाला से प्राप्त नाग की आकृति के सर्पबंधी शिलालेख उज्जैन के जूना महाकाल मंदिर एवं चौबेरा देव मंदिर में भी विद्यमान हैं, जो पाणिनि की संस्कृत अष्टाध्यायी के नियमों को समझाने हेतु बनाए गए थे। चूंकि वे दोनों मंदिर हैं, इसलिए भोजशाला भी मंदिर ही है।
7. *पूर्व राजाओं द्वारा विध्वंस:* अधिवक्ता श्री मनीष गुप्ता ने तर्क दिया कि हिंदू राजाओं द्वारा कभी मंदिरों या मूर्तियों का विध्वंस नहीं किया गया, जबकि मुस्लिम आक्रमणकारियों द्वारा यह क्रम निरंतर चला। उन्होंने श्री सीताराम गोयल रचित प्रसिद्ध पुस्तक "हिंदू मंदिर: उनका क्या हुआ" का विशेष उल्लेख किया, जिसमें समकालीन अभिलेखों एवं ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर मुस्लिम आक्रमणकारियों द्वारा लगभग 2,800 हिंदू मंदिरों के विध्वंस की प्रामाणिक जानकारी संकलित है।
मुस्लिम पक्ष का यह दावा कि मस्जिद का निर्माण 1305 ई. में हुआ, उसी वर्ष अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति द्वारा धार पर आक्रमण के साथ मेल खाता है—जिससे स्पष्ट होता है कि मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाने का प्रयास किया गया था।इन निर्विवाद प्रमाणों से स्पष्ट है कि भोजशाला मां वाग्देवी को समर्पित प्राचीन हिंदू मंदिर है।







