महाशिवरात्रि विशेष :भगवान शिव चराचर जगत के अधीश्वर और भगवती उमा है जगजननी
नर्मदापुरम मध्यप्रदेश।। भगवान शिव इस अखिल ब्रह्मांड के अभियंता, नियंता, साक्षी एवं सर्वेसर्वा हैं, जो सदा एक रस प्रतिपल प्रत्येक स्थान पर सम एवं सर्व शक्तिमान हैं। आदिदेव भगवान शिव पूर्ण परब्र्म्ह परमात्मा सच्चिदानन्द-स्वरूप हैं। वे ही समस्त ब्रह्माण्ड में घ्याप्त होकर इस जगत् को उत्पत्ति, पालन और संहार आदि करते हैं। वे सत्यस्वरूप, ज्ञानस्थशाप, अनन्त, अविनाशी, निर्गुण निरःकार तथा सगुण-साकार हैं। ये ही सम्पूर्ण विद्याओंके ईश्वर तथा समस्त प्रणियोंके अधीश्वर हैं 'ईशानः सर्वविद्यानामीश्वरः सर्वभूतानाम्।' ये धर्मस्वरूप हैं और धर्म को मर्यादा स्थिर करते हैं। उन्ही से कल्याण-मंगलरूप परम शिव धर्म का प्रादुर्भाव हुआ है। भगवान् शिव को अचिन्त्य शक्ति व्यक्त रूप में उमा, पार्वती इत्यादि नामों से अभिहित हैं। वे दोनों धर्म के मूलतत्त्व श्रद्धा-विश्वास के रूप में अधिष्ठित हैं। भगवान् शिव समस्त चराचर जगत् के पिता और भगवती उमा जगज्जननी हैं। धर्मरूप वृष ही उनका अधिष्ठान है अर्थात् वे धर्मको स्थिर कर प्रतिष्ठित रहते हैं। भगवान् शिव के उपदेश बड़े ही कल्याण-मंगलकारी हैं। वैसे तो वे ही समस्त शास्त्रों तथा समस्त विद्याओं के उपदेष्टा हैं तथापि महर्षि वेदव्यासजीकी वाणी में जगजननी मा पार्वती को महाभारत में उनके दिये धर्मोपदेश गुम्फित हैं, जो इस प्रकार हैं जो अहिंसा परमो धर्मो हा हिंसा परमं सुखम्।अहिंसा धर्मशास्त्रेषु सर्वेषु परमं पदम् ॥
भगवान् शिव ने पार्वतीजी से कहा-देवि! अहिंसा परम धर्म है। अहिंसा परम सुख है। सम्पूर्ण धर्मशास्त्रों में अहिंसाको परमपद बताया गया है। अहिंसा सत्यवचनमक्रोधः क्षान्तिरार्जवम् ।गुरूणां नित्यशुश्रूषा वृद्धानामपि पूजनम्॥शीवादकार्यसंत्यागः सदा पथ्यस्य भोजनम्। एवमादिगुणं वृत्तं नराणां दीर्घजीविनाम् ॥अर्थात अहिंसा, सत्यभाषण, क्रोध का त्याग, क्षमा, सरलता, गुरुजनों की नित्य सेवा, बड़े-बूढ़ों का पूजन, पवित्रता का ध्यान रखकर न करने योग्य कर्मों का त्याग, सदा ही पथ्य भोजन इत्यादि गुणोंवाले आचारका पालन करनेवाले मनुष्य दीर्घजीवी होते हैं। स्वर्गे वा मानुये वापि चिरं तिष्ठन्ति धार्मिकाः ॥ अपरे पापकर्माणः प्रायशोऽनृतवादिनः । नास्तिका घोरकर्माणः सततं मांसपानपाः। हिंसाप्रिया गुरुद्विष्टा निष्क्रियाःशौचवर्जिताः॥पापाचारा गुरुद्विष्टाः कोपनाः कलहप्रियाः ॥एवमेवाशुभाचारास्तिष्ठन्ति निरये विरम्। तिर्यग्योनौ तथात्यन्तमत्पास्तिष्ठन्ति मानवाः॥ धर्मात्मा पुरुष स्वर्ग में हो या मनुष्य लोक में, वे दीर्घकाल तक अपने पद पर बने रहते हैं। इनके सिवा दूसरे जो पापकर्मी प्रायः झूठ बोलने वाले, हिंसाप्रेमी, गुरुद्रोही, अकर्मण्य, शौचाचार से रहित, नास्तिक, घोरकर्मी, सदा मांस खाने और मद्य पीने वाले, पापाचारी, गुरु से द्वेष रखनेवाले, क्रोधी और कलहप्रेमी हैं, ऐसे असदाचारी पुरुष चिरकालतक नरकमें पड़े रहते हैं तथा तिर्यग्योनिमें स्थित होते हैं, वे मनुष्य-शरीर में अत्यन्त अल्प समयतक ही रहते हैं।
सर्वभूतेषु यः सम्यन् ददात्यभयदक्षिणाम्। हिंसादोषविमुक्तात्मा स वै धर्मेण युज्यते ॥ सर्वभूतार्जवखतः । सर्वभूतानुकम्पी सर्वभूतात्मभूतश्च स वै धर्मेण युज्यते ॥ अर्थात -जो हिंसा-दोषसे मुक्त होकर सम्पूर्ण प्राणियों को अभयदान कर देता है, उसी को धर्म का फल प्राप्त होता है। जो सम्पूर्ण प्राणियों पर दया करता, सबके साथ सरलता का वर्ताव करता और समस्त भूतों को आत्मभाव से देखता है, वही धर्मके फलसे युक्त होता है। पात्रमित्येव दातव्यं सर्वस्यै धर्मकांक्षिभिः। आगमिष्यति यत् पात्रं तत् पात्रं तारयिष्यति ॥ धर्मकी अभिलाषा रखनेवाले पुरुषोंको चाहिये कि अपने घरपर आये हुए सभी अतिथियोंको दानका उत्तम पात्र समझकर दान दें। उन्हें यह विश्वास रखना चाहिये कि आज को पात्र आयेगा, वह हमारा उद्धार कर देगा। नास्ति भूमौ दागसमं नास्ति दानसमो निधिः । नास्ति सत्यात् परो धर्मो नानृतात् पातकं परम् ।। इस पृथ्बीपर दानके समान कोई दूसरी वस्तु नहीं है। दानके समान कोई निधि नहीं है। सत्यसे बढ़कर कोई धर्म नहीं है और असत्यसे बढ़कर कोई पातक नहीं है।
शुश्रूषन्ते ये पितरं मातरं च गृहाश्रमे ॥ भतार चैव या नारी अग्रिहोत्रं च ये द्विजाः। तेषु तेषु च प्रीणन्ति देवा इन्द्रपुरोगमाः ॥ पितरः पितृलोकस्थाः स्वधर्मेण स रज्यते। जो लोग गृहस्थाश्रममें रहकर माता-पिताकी सेवा करते हैं, जो नारी पतिकी सेवा करती है तथा जो ब्राह्मण नित्य अग्निहोत्र कर्म करते हैं, उन सबपर इन्द्र आदि देवता, पितृलोकनिवासी पितर प्रसन्न होते हैं एवं वह पुरुष अपने धर्मसे आनन्दित होता है। यथा मातरमाश्रित्य सर्वे जीवन्ति जन्तवः ॥ तथा गृहाश्रमं प्राप्य सर्वे जीवन्ति चाश्रमाः। जैसे सभी जीव माताका सहारा लेकर जीवन धारण करते हैं, उसी प्रकार सभी आश्रम गृहस्थ-आश्रमका आश्रय लेकर ही जीवन-यापन करते हैं। न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति। हविषा कृष्णवत्यैव भूय एवाभिवर्धते ॥ नास्ति तृष्णासमं दुःखं नास्ति त्यागसमं सुखम्। सर्वान् कामान् परित्यन्य ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ भोगोंकी तृष्णा कभी भोग भोगनेसे शान्त नहीं होती, अपितु घीसे प्रज्वलित होनेवाली आगके समान अधिकाधिक बढ़ती ही जाती है। तृष्णाके समान कोई दुःख नहीं है, त्यागके समान कोई सुख नहीं है। समस्त कामनाओंका परित्याग करके मनुष्य ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है।आर्जवं धर्ममित्याहुरधर्मों जिहा उच्यते। आर्जवेगेह संयुक्तो नरो धर्मेण युज्यते ॥ झान्तो दान्तो जितक्रोधो धर्मभूतो विहिंसकः । धर्मे रतमना नित्यं नरो धर्मेण युज्यते ॥ व्यपेततन्द्रिर्धमर्मात्मा शक्त्या सत्पथमाश्रितः। चारित्रपरमो बुद्धो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥
सरलताको धर्म कहते हैं और कुटिलताको अधर्म। सरलभावसे युक्त मनुष्य ही यहाँ धर्मके फलका भागी होता है। क्षमाशील, जितेन्द्रिय, क्रोधविजयी, धर्मनिष्ठ, अहिंसक और सदा धर्मपरायण मनुष्य ही धर्मके फलका भागी होता है। जो पुरुष आलस्यरहित, धर्मात्मा, शक्तिके अनुसार श्रेष्ठ मार्गपर चलनेवाला, सच्चरित्र और ज्ञानी होता है, वह ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है। आत्मसाक्षी भवेन्नित्यमात्मनस्तु शुभाशुभे।
मनसा कर्मणा वाचा न च कांक्षेत पातकम् ॥ यादृशं कुरुते कर्म तादृशं फलमश्नुते। स्वकृतस्य फलं भुक्ते नान्यस्तद्भोक्तुमर्हति ॥ अपने शुभ और अशुभ कर्ममें सदा अपने-आपको ही साक्षी माने और मन, वाणी तथा क्रियाद्वारा कभी पाप करनेकी इच्छा न करे। [श्री महेश्वर ने कहा- देवि!] जीव जैसा कर्म करता है, वैसा फल पाता है। यह अपने किये हुएका फल स्वयं ही भोगता है, दूसरा कोई उसे भोगने का अधिकारी नहीं है। उक्त लेख मे उल्लेखित समस्त मंत्र-श्लोक महाभारत के अनुशासन पर्व मे विस्तारित है।
अतामाराम यादव पीव वरिष्ठ पत्रकार
श्रीजगन्नाथधाम काली मंदिर के पीछे, ग्वालटोली
नर्मदापुरम मध्यप्रदेश मोबाईल -9993376616







