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बहादुरी या घोर लापरवाही, असली बम होता तो? किसकी होती जम्मेदारी?






मधुसूदन सिंह 

मऊ / बलिया।। मऊ रेलवे स्टेशन पर काशी एक्सप्रेस मे बम होने की अफवाह पर ट्रेन रोक कर तत्काल सभी यात्रियों को सुरक्षित निकालने की कार्यवाही प्रशंसनीय है। जिस संजीदगी व सतर्कता के साथ ट्रेन का चप्पा चप्पा खंगाला गया, उसकी जितनी तारीफ की जाय कम है। लेकिन उसके बाद ट्रेन मे मिले लावारिश बैग को जिस तरह से एक इंस्पेक्टर द्वारा डंडे के सहारे ट्रेन से पहले प्लेटफार्म और फिर यहां से बाहर ले जाया गया है, वह पुलिस को दी गयी ऐसी परिस्थितियों के लिये ट्रेनिंग का हिस्सा तो नही हो सकता है। इन बहादुर बनने के शौक़ीन इंस्पेक्टर ने न सिर्फ अपनी जान को जोखिम मे डाला है बल्कि सरकारी संपत्ति को भी अपनी लापरवाही से खतरे मे डाला है।बैग को घसीटते वक़्त ये कितने सतर्क है, यह भी वीडियो मे साफ दिख रहा है।

सोचिये, अगर बम होता और डंडा से उतारते वक़्त फट जाता, प्लेटफार्म पर फट जाता या बाहर निकालते वक़्त फट जाता तो क्या होता? क्या पुलिस विभाग मे बम को ऐसे ही हटाने की ट्रेनिंग इस इंस्पेक्टर को दी गयी है? संयोग अच्छा था जो यह बम नही था, अगर होता तो इंस्पेक्टर साहब कहां होते सोचा जा सकता है।

बम को बम निरोधक दस्ता ही ले जाता है एक जगह से दूसरी जगह 



किसी भी लावारिश संभावित विस्फोटक को डिफ्यूज करने या सुरक्षित जगह पर ले जाने का काम, इस विधा के एक्सपर्ट और सुरक्षा उपकरणों से युक्त जवान ही करते है। जब बम स्क्वाड को बुलाया गया था तो इंस्पेक्टर साहब को इसमें टांग अड़ाने की क्या जरूरत थी। ट्रेन की बोगी मे लावारिस बैग था, बम स्क्वाड वही जा कर इसकी जांच करता और जांच के बाद जो भी जरुरी होता करता, इंस्पेक्टर साहब की तरह तमाशा तो नही करता। अगर ट्रेन की बोगी मे ही असली बम होता और फटता तो सिर्फ बोगी का नुकसान होता लेकिन इंस्पेक्टर साहब की नादानी के चलते प्लेटफार्म और स्टेशन की बिल्डिंग को भी नुकसान हो जाता, जानमाल का भी नुकसान हो सकता था।

बलिया एक्सप्रेस का सुझाव है कि ऐसे मौको पर बहादुरी दिखाने के शौक़ीनो को दूर रखा जाय और विशेषज्ञ को ही परिस्थिति से निपटने की छूट दी जाय।