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भारतीय क़ानून व्यवस्था की जंग लगी धाराओं की कमियों पर चोट करने जा रहे है लाल बिहारी मृतक, मनाएंगे 30 जुलाई 2026 को अपनी मृत्यु की 50 वी वर्षगांठ




कागज़ की मुहर ज़िंदा इंसान से भारी

मधुसूदन सिंह 

बलिया।। चाहे इंसान हो या जानवर उसको जिंदा साबित करने के लिये उसकी सांसों का चलते पाया जाना जरुरी होता है। चिकित्सक जिसकी सांस नही चलती है उसको मृतक घोषित कर देता है। चिकित्सक के प्रमाण पत्र पर कोई सवाल नही उठाया जाता है। यहां तक कि सेवानिवृत्त पेंशन भोगियो से सरकार प्रति वर्ष जीवित होने का प्रणाम पत्र लिखित रूप से लेती है, तब पेंशन की अगली किस्त जारी करतीं है। लेकिन अगर दुर्भाग्य से किसी को कागज की मुहर से सरकारी दस्तावेजों मे मृत दिखा दिया गया हो और वह व्यक्ति जिंदा हो, तो भी भारतीय क़ानून का मकड़जाल इतना है कि उसको जिंदा साबित करने के लिये असली रूप से मरने के दिन तक संघर्ष करना पड़ सकता है, कागज की मुहर जिंदा इंसान पर भारी पड़ जाती है । कोर्ट कचहरी, मंत्री मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री तक माथा टेकना पड़ सकता है, फिर भी वो कागजी तौर पर (जिस्मानी तौर पर तो जीवित है ही ) जिंदा साबित होगा कि नही यह कहा नही जा सकता है। क्योंकि जिस स्तर से, जिसने किया होता है, वह उसको मृतक किया गया होता है, वह उसको पुनः जीवित करने मे अपनी गलती को स्वीकार करता ही नही है। जिसके चलते कागजी मृतक की जिंदगी बद से बदत्तर हो जाती है।

विश्व का सबसे बड़े संविधान होने के बावजूद ऐसे प्रकरण देखने को अक्सर मिल ही जाते है, जो दर्शाते है क़ानून की किताबों ने एक आम इंसान को कितना संघर्ष कराने को मजबूर किया होता है। इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है कि एक जीवित आदमी अपने को कागजों मे जीवित कराने के लिये दशकों संघर्ष करें। आज वही आदमी एक बार फिर क़ानून की उन दफाओ की कमियों को उजागर कर अपने को मृतक घोषित करने की 50 वी वर्षगांठ 30 जुलाई 2026 को मनाने जा रहा है। यह हमारे क़ानून की विडंवना ही है कि ताकतवर क़ानून को अपने हिसाब से परिभाषित करके बच जाते है और गरीब कानूनी शिकंजो मे जकड़ जाता है। हम बात कर रहे है उत्तरप्रदेश के आजमगढ़ जनपद के मुबारकपुर थाना क्षेत्र खलीलाबाद निवासी लाल बिहारी मृतक की। जिनको नायब तहसीलदार तहसील सदर आजमगढ़ ने 30 जुलाई 1976 को साजिशन ग्राम खलीलाबाद के सरकारी अभिलेखों मे मृतक घोषित कर दिया था। 18 वर्षो की अनवरत लड़ाई के बाद 30 जून 1994 को मुख्य राजस्व अधिकारी आजमगढ़ ने लाल बिहारी को मृतक से सरकारी अभिलेखों मे जीवित करने का आदेश दिया।



लाल बिहारी मृतक का वायरल आमंत्रण पत्र 

समस्त देशवाशियों को नव वर्ष 2026 की हार्दिक शुभकामनाएं

(आमंत्रण पत्र)

निवेदन के साथ जनता की अदालत व भारत की व्यवस्थाओ को अवगत करा रहा हूँ। कि मुर्दा की 50वीं पुण्यतिथि वर्षी पर शोक संवेदना जीवित को श्रद्धांजलि दिनांक-30-07-2026 को मृतक संघ और मृतक संघ जनकल्याण ट्रस्ट के सयुक्त कार्यक्रम आजमगढ़ में मनाया जायेगा । न्यायालय नायब तहसीलदार तहसील सदर आजमगढ़ मुकदमा नं. 298 दिनांक-30-07-1976 अभिलेखों में जीवित को मृत घोषित कर दिया था । (2) मुख्य राजस्व अधिकारी, जिला अधिकारी आजमगढ़ ने 18 वर्ष में दिनांक-30-जून 1994 में ग्राम खलीलाबाद के अभिलेखों में मृतक से पुनः जीवित घोषित कर खतौनी में दर्ज कर दिया । (3) सहकारी समिति अमिलो के सचिव से 1 किलो चिनी 1985 में मांगने पर सचिव के गुंडों द्वारा जानलेवा हमला कर थाना मुबारकपुर में फर्जी मुकदमा दर्ज किया | कई बार वारंट में गिरफ़्तारी 14 वर्ष में न्यायालय मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट आजमगढ़ दिनांक- 05-11-1999 में दोष मुक्त किया । (5) भ्रष्ट लेखपाल के विरुद्ध थाना सीधारी आजमगढ़ के नाम से वारंट था । लेकिन थाना मुबारकपुर की पुलिस ने फर्जी वारंट में लाल बिहारी मृतक को गिरफ्तार कर शौचालय वाले जग में पानी पीने को दिया | न्यायालय मुख्य न्यायिक आजमगढ़ ने बिना जमानत दिनांक-18-08-2001 को छोड़ दिया | (6) न्यायालय उपजिलाधिकारी तहसील निजामाबाद आजमगढ़ ने दिनांक-07-09-2016 में चचेरे भाईयों कि ग्राम खलीलाबाद की जमीन पर लाल बिहारी मृतक के नाम फर्जी खतौनी में नाम दर्ज कर खुनी संघर्ष कराने की साजिस में शासन प्रशासन ने किया | मुक‌द्मा नम्बर 163 दिनांक 16-01-2017 तीन बार सह खातेदार दर्ज किया | (8) हाईकोर्ट खंडपीठ लखनऊ मुकदमा नं. 503 2005 में 25 करोड़ रूपये का मानहानि क्षतिपूर्ति में न्यामूर्ति श्रीमती संगीता चंद्रा जे. न्यायमूर्ति श्री मनीष कुमार जे. ने कोर्ट का समय नष्ट करने का आरोप लगाकर 10000 रु० जुरमाना लगाकर 18 वर्ष में दिनांक-22-02-2023 को मुकदमा खारिज कर दिया । (9) सुप्रीम कोर्ट नई दिल्ली न्यायमूर्ति श्री वी.वी. नागरत्ना न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा ने दिनांक-07-07-2023 को जुर्माना सहित मुकदमा खारिज कर दिया | सरकारी दोनों फाइल गायब कर अज्ञात व्यक्तियों के विरुद्ध 3 मुकदमा नं. 34, 66, 67 2018 में थाना कोतवाली आजमगढ़ की पुलिस ने जांच कर फाइनल रिपोर्ट पुलिस लगा दिया । मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट आजमगढ़ के कार्यालय, न्यायालय में फाइनल रिपोर्ट सहित 5 फाइलें नहीं मिल रही है । न तो मुलजिम मिला न 1976 और 1994 की गायब फाइल मिल रही है । अभिलेख को गायब कर साक्ष्य मिटाना हत्या है नक़ल माँगा था की फोलियो नम्बर  41,42,43 दिनांक-30-08-2025 को वापस कर दिया,करोड़ों रुपया बर्बाद हो गया ।

अतः समस्त विद्वानों, साहित्यकारों, पत्रकारों, छायाकारों, समाजसेवियों, न्यायिक व्यक्तियों मानवतावादियों से हाथ जोड़कर निवेदन है कि संविधान व न्यायालय कानून के सम्मान जनन्याय, कल्याण में अपना बहुमूल्य समय देकर लाल बिहारी मृतक दागी के 50वीं पुण्यतिथि श्रद्धांजली विचार गोष्टी में दिनांक 30 जुलाई 2026 को विकसित भारत में जीवित आत्मा को शांति प्रदान कर जागरूक करने का कष्ट करें ।

लाल बिहारी मृतक दागी मो. 9415153511


कैसे शुरू हुई अपने को जिंदा साबित करने की कहानी 

“सरकार ने मुझे मरा हुआ घोषित किया, पर मैं अब भी ज़िंदा हूँ।”

यह एक साधारण आदमी की नहीं, बल्कि असाधारण जज़्बे की कहानी है — लाल बिहारी ‘मृतक’ की।उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ ज़िले के अमिलो गाँव के रहने वाले लाल बिहारी को एक दिन पता चला कि सरकारी रिकॉर्ड में वे मर चुके हैं। उनके अपने रिश्तेदारों ने, सरकारी अधिकारियों की मिलीभगत से, ज़मीन हड़पने के लिए उन्हें मरा हुआ दर्ज करवा दिया था।और फिर शुरू हुई — एक ऐसी लड़ाई, जो पचास साल से जारी है।


मृतक बनकर ज़िंदा रहने की शुरुआत

साल 1976  के आसपास लाल बिहारी को पहली बार यह पता चला कि वे “मृतक” घोषित कर दिए गए हैं।जब उन्होंने अपने साड़ी के बिज़नेस के लिए लोन लेने के लिए  ज़मीन का रिकॉर्ड निकलवाना चाहा, तो वहां लिखा था — “मृतक लाल बिहारी”।


उनकी ज़मीन पर अब उनके रिश्तेदारों ने कब्ज़ा कर लिया था।उन्होंने अधिकारियों से कहा — “मैं तो ज़िंदा हूँ!”लेकिन किसी ने उनकी बात नहीं मानी। सरकारी फाइलों में दर्ज नाम ने ज़िंदा इंसान की सांसों से ज़्यादा ताक़त दिखाई।


              सिस्टम से टकराने का फैसला

लाल बिहारी ने अदालत का दरवाज़ा खटखटाया, लेकिन किसी ने उनकी अर्जी स्वीकार नहीं की।क्योंकि — कानून के मुताबिक तो वे मर चुके थे। तब उन्होंने तय किया कि वे इस “मृतक” टैग को ही अपना अस्त्र बना लेंगे।उन्होंने खुद को “लाल बिहारी ‘मृतक’” कहना शुरू किया।


समाज और मीडिया की नज़र में आए ‘मृतक

उन्होंने “मृतक संघ” नाम से एक संगठन भी बनाया — ताकि ऐसे सभी लोगों की आवाज़ उठाई जा सके जिन्हें जीवित होते हुए भी कागज़ों में मरा हुआ बताया गया।

धीरे-धीरे उनकी कहानी ने अख़बारों और टीवी चैनलों में जगह पाई।उन्होंने कई बार अनोखे तरीके से विरोध जताया —कभी “मृतक” नाम से चुनाव लड़ा,कभी अधिकारियों को “श्रद्धांजलि” पत्र भेजा।उनकी सादगी और व्यंग्य ने उन्हें एक प्रतीक बना दिया —भारत के उस सिस्टम का प्रतीक, जो जीवित नागरिकों को भी फाइलों में दफना देता है।


            18 साल बाद घोषित हुए जिंदा 


18 वर्षों की जद्दोजहद, अपीलें और संघर्ष के बाद 1994 में आखिरकार उन्हें आधिकारिक रूप से ज़िंदा घोषित किया गया।लेकिन तब तक उनकी ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा मृतक साबित करने में निकल चुका था।बाद में पता चला कि वह फ़ाइल ही रिकॉर्ड से ग़ायब है जिसमें वह मृतक और बाद में जीवित घोषित हुए. अब वह फाइल को खोजने की लड़ाई लड़ रहे हैं. दुख की बात यह है कि आज भी, इतने वर्षों बाद भी, सैकड़ों लोग “कागज़ों में मरे हुए” हैं।


       मुख्यमंत्री से मुलाक़ात और निराशा

हाल ही में लाल बिहारी ‘मृतक’ ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाक़ात की। वे उम्मीद लेकर गए थे कि शायद राज्य सरकार उन लोगों के लिए कोई ठोस कदम उठाएगी जो अब भी अपने ज़िंदा होने की लड़ाई लड़ रहे हैं।लेकिन मुलाक़ात के बाद वे कहते हैं “मुख्यमंत्री से मिला, पर निराश लौटा। सिस्टम अब भी वही है — फाइलों में इंसान की कोई कीमत नहीं।”


क्यों ज़रूरी है ‘मृतक संघ’ की लड़ाई आज भी

लाल बिहारी बताते हैं कि आज भी देशभर में ऐसे सैकड़ों मामले हैं जहां ज़मीन हड़पने के लिए रिश्तेदार और अधिकारी मिलकर किसी को ‘मृतक’ घोषित कर देते हैं।उनका कहना है —“मैं लड़ रहा हूँ ताकि कोई और लाल बिहारी ‘मृतक’ न बने।”

यह कहानी सिर्फ़ लाल बिहारी की नहीं — यह एक पूरे तंत्र की कहानी है,जहां कागज़ की मुहर ज़िंदा इंसान से भारी पड़ती है।