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क्या उन्मादी प्रदर्शनों से प्रभावित होकर हो रहा है अदालतों मे न्याय? कुलदीप सिंह सेंगर की बेटी ने खुला पत्र लिख कर कह दी ये बात- भरोसा टूटने न दीजिये

 




उन्नाव।। भाजपा के पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की छोटी बेटी इशिता सेंगर ने सोमवार को एक इमोशनल पोस्ट लिखी। 8 साल की कानूनी दांव पेंच मे उलझी इशिता ने कहा है कि उसे देश व क़ानून पर जो भरोसा है, उसको क़ायम रहने दिया जाय। इशिता का आशय पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की जमानत के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा रोक लगाया जाना, उन्मादी प्रदर्शनों के दबाव का परिणाम है। वैसे देश मे कई बलात्कार के दोषियों को जमानत मिलती रही है, जिसका इतना विरोध नही हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने भी जमानत पर रोक ही लगायी है, निरस्त नही किया है।यहां अभी कुलदीप सिंह सेंगर को अपना पक्ष मजबूती के साथ रखने का पूरा मौका है।इशिता को अभी अपना भरोसा देश की अदालत पर कायम रखना चाहिये। प्रदर्शनों के बाद ही सीबीआई जागी और सुप्रीम कोर्ट मे जमानत का विरोध किया, अगर इसको सच भी मान ले तो भी कुलदीप सिंह सेंगर को कोर्ट ने मौका तो दिया ही है। अब कुलदीप सिंह सेंगर और इनके परिजनों का दायित्व है कि वो कौन से साक्ष्य दे, जिससे इनको पुनः जमानत मिल सके।

उन्नाव रेप केस के 8 साल बाद इशिता सेंगर ने पहली बार अपनी पीड़ा एक खुले लेटर के जरिए देश के सामने रखी है।इशिता ने खुद को थकी हुई और डरी-सहमी बताया। कहा-मैंने 8 साल इंतजार किया। लेकिन अब धीरे-धीरे अपना विश्वास खो रही हूं। इसलिए लिख रही हूं। इन वर्षों में मुझे सोशल मीडिया पर कई बार टारगेट किया गया। कहा गया कि मेरा बलात्कार होना चाहिए। मार दिया जाना चाहिए।


इशिता का यह लेटर तब आया है, जब सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी है, जिसमें उनके पिता की आजीवन कारावास की सजा को सस्पेंड कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने 23 दिसंबर के दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी। निर्देश दिया कि कुलदीप सिंह सेंगर को उन्नाव रेप केस में जेल से रिहा नहीं किया जाएगा।


सेंगर की बड़ी बेटी ऐश्वर्या ने अपनी छोटी बहन इशिता के X पोस्ट को री-ट्वीट किया है। लिखा- लड़ेंगे, हारेंगे नहीं...


                 इशिता सेंगर का यह है लेटर 


मैं डरी और थकी हुई हूं। धीरे-धीरे विश्वास खो रही हूं। लेकिन उम्मीद नही छोड़ी। मैंने और मेरे परिवार ने धैर्य पूर्वक 8 साल से इंतजार किया। यह मानते हुए कि अगर हम सब कुछ सही तरीके से करेंगे, तो सच खुद-ब-खुद सामने आ जाएगा। हमने कानून-संविधान पर भरोसा किया। लेकिन मेरा यह विश्वास टूट रहा है। आज मैं इसलिए लिख रही हूं।


मेरी बात सुने जाने से पहले ही मेरी पहचान एक ठप्पे में बदल दी जाती है- बीजेपी विधायक की बेटी। जैसे इससे मेरी इंसानियत मिट जाती हो। जिन लोगों ने मुझे कभी देखा नहीं, एक भी दस्तावेज नहीं पढ़ा, एक भी अदालती रिकॉर्ड नहीं देखा, उन्होंने तय कर लिया है कि मेरी जिंदगी की कोई कीमत नहीं है।

इन वर्षों में सोशल मीडिया पर अनगिनत बार टारगेट किया गया। कहा गया कि मुझे बलात्कार का शिकार होना चाहिए, मार दिया जाना चाहिए। यह नफरत निरंतर है। जब आपको एहसास होता है कि इतने सारे लोग मानते हैं कि आप जीने के लायक भी नहीं हैं, तो यह आपको अंदर से तोड़ देता है।


हमने मौन इसलिए नहीं चुना, क्योंकि हम शक्तिशाली थे, बल्कि इसलिए क्योंकि हम संस्थाओं में विश्वास रखते थे। हमने विरोध प्रदर्शन नहीं किए। हमने टेलीविजन बहसों में शोर नहीं मचाया। हमने पुतले नहीं जलाए और न ही हैश-टैग ट्रेंड किए। हमने प्रतीक्षा की क्योंकि हमारा मानना था कि सत्य को तमाशे की आवश्यकता नहीं होती।


उस मौन की हमें क्या कीमत चुकानी पड़ी? हमारी गरिमा को धीरे-धीरे छीन लिया गया है। आठ वर्षों तक हर दिन हमारा अपमान किया गया, हमारा उपहास किया गया। हमें अमानवीय व्यवहार का सामना करना पड़ा। एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर भागते-भागते, चिट्ठियां लिखते, फोन करते और अपनी बात सुनाने की गुहार लगाते हुए हम आर्थिक, भावनात्मक और शारीरिक रूप से पूरी तरह से थक चुके हैं। ऐसा कोई दरवाजा नहीं है जिस पर हमने दस्तक न दी हो। ऐसा कोई प्राधिकरण नहीं है जिससे हम संपर्क न कर चुके हों। ऐसा कोई मीडिया हाउस नहीं है जिसे हमने पत्र न लिखा हो।

फिर भी किसी ने नहीं सुना। इसलिए नहीं कि तथ्य कमजोर थे। इसलिए नहीं कि सबूतों की कमी थी। बल्कि इसलिए कि हमारा सच असुविधाजनक था। लोग हमें ताकतवर कहते हैं। मैं पूछती हूं- किस तरह की ताकत आठ साल तक किसी परिवार को बे-आवाज छोड़ देती है? कैसी ताकत होती है, जिसमें आप रोज अपना नाम कीचड़ में घसीटते देखते हैं, चुपचाप बैठे रहते हैं। एक ऐसे सिस्टम पर भरोसा करते हुए, जो आपकी मौजूदगी को स्वीकार करने को भी तैयार नहीं दिखता?


जानबूझकर डर पैदा किया गया, ताकि जज, पत्रकार, संस्थाएं और आम नागरिक सब खामोशी में धकेल दिए जाएं। एक ऐसा डर, ताकि कोई हमारे साथ खड़ा होने की हिम्मत न करे, कोई हमें सुनने की हिम्मत न करे। कोई यह कहने की हिम्मत न करे- आइए, तथ्यों को देखें।


यह सब होते देखना मुझे गहराई से झकझोर गया है। अगर सच को इतनी आसानी से आक्रोश और गलत जानकारी में डुबो दिया जा सकता है, तो मेरे जैसी इंसान कहां जाए? अगर दबाव और सार्वजनिक उन्माद सबूतों और उचित प्रक्रिया पर हावी होने लगें, तो एक आम नागरिक के पास सचमुच कौन-सी सुरक्षा बचती है?


 मैं यह पत्र किसी को धमकाने के लिए नहीं लिख रही हूं। मैं यह पत्र सहानुभूति पाने के लिए नहीं लिख रही हूं। मैं इसलिए लिख रही हूं, क्योंकि मैं डरी हुई हूं। क्योंकि मुझे अब भी विश्वास है कि कहीं न कहीं कोई ऐसा होगा, जो सुनने की परवाह करेगा। हम किसी एहसान की मांग नहीं कर रहे।


हम यह नहीं कह रहे कि हमारी पहचान के कारण हमें संरक्षण मिले। हम न्याय मांग रहे हैं, क्योंकि हम इंसान हैं। कृपया कानून को बिना डर के बोलने दीजिए। कृपया सबूतों को बिना दबाव के परखा जाने दीजिए। कृपया सच को सच माना जाए। मैं एक बेटी हूं, जिसे अब भी इस देश पर भरोसा है। कृपया मुझे उस भरोसे पर पछताने के लिए मजबूर मत कीजिए।

सादर

न्याय की प्रतीक्षा में एक बेटी