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आई लव मोहम्मद की हकीकत और साज़िशों का सच,‘आई लव’ को लेकर मुस्लिम धर्मगुरूओं में मतभेद







अजय कुमार,                                

वरिष्ठ पत्रकार

लखनऊ ( उ. प्र.)

मो-9335566111

लखनऊ।।इस्लाम धर्म में बुतपरस्ती यानी मूर्तिपूजा को कड़ाई से हराम घोषित किया गया है। पैग़म्बर साहब की किसी तस्वीर, चित्र या मूर्ति बनाने पर हमेशा से पाबंदी रही है, क्योंकि इस्लाम का मूल संदेश एक ईश्वर की इबादत पर आधारित है, न कि किसी प्रतिमा या चित्र की पूजा पर। लेकिन इन दिनों उत्तर प्रदेश में नए तरह का चलन देखने को मिल रहा है, जिसमें जगह-जगह आई लव मोहम्मद लिखे बैनर और पोस्टर लगाए जा रहे हैं।मोहम्मद साहब के नाम पर समाज का माहौल खराब करने सहित दंगा फैलाया जा रहा है। सवाल यह है कि जब पैग़म्बर की तस्वीर तक बनाना मना है, तब क्या इस तरह के भावनात्मक नारे लगाकर धार्मिक और राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिशें जायज़ मानी जा सकती हैं? पैग़म्बर मोहम्मद साहब ने अपने जीवनकाल में तौहीद का संदेश दिया था। उन्होंने हर तरह की बुतपरस्ती और चित्र या मूर्ति पूजा का खंडन किया। लेकिन आई लव मोहम्मद जैसी कार्यवाहियाँ इस्लाम की उसी मूल भावना से टकराती नज़र आती हैं। यहाँ सवाल यह नहीं कि मोहम्मद साहब के प्रति प्रेम या आदर किया जा रहा है, बल्कि यह है कि उस प्रेम को किस रूप में प्रदर्शित किया जा रहा है। इस्लाम में अपने पैग़म्बर से मोहब्बत दिखाने का तरीका उनके बताए मार्ग पर चलना और अमल करना है, न कि नारेबाज़ी और पोस्टरों से हंगामा खड़ा करना। कानपुर से आई लव मोहम्मद के पोस्टर से जो चिंगारी निकली थी  बरेली में उसने उग्र रूप धारण कर लिया। उपद्रवियों ने जम कर हिंसा और लूटपाट की। इस अराजकता के लिये विवादित मुस्लिम मौलाना तौकीर रजा सीधे तौर पर उतरदायी है।बरेली में तौकीर रजा सहित दंगा फैलाने वालों पर कार्रवाई के बाद इस समय वहां तनावपूर्ण शांति है।


बीते कुछ महीनों से उत्तर प्रदेश के कई शहरों में आई लव मोहम्मद लिखे पोस्टर, दीवारों पर बने बड़े-बड़े बैनर और झंडे देखने को मिल रहे हैं। इन बैनरों को लगाने का नाम भले ही धार्मिक प्रेम दिखाना बताया जा रहा हो, लेकिन जानकारों का मानना है कि इसके पीछे गहरी राजनीतिक नीयत छिपी हुई है। यह सिर्फ साधारण नारा नहीं है, बल्कि एक सोची-समझी साज़िश है जिसमें धार्मिक भावनाओं को भड़काकर समाज में तनाव पैदा किया जा रहा है। इन बैनरों का उद्देश्य केवल अपने समुदाय में धार्मिक जोश जगाना नहीं, बल्कि दूसरे धर्मों के लोगों को उकसाना भी है। सार्वजनिक जगहों पर लगाए जाने वाले ये पोस्टर जब किसी अन्य संप्रदाय के इलाके में लगाए जाते हैं, तो स्वाभाविक रूप से टकराव की स्थिति बनती है। उत्तर प्रदेश के कई कस्बों और शहरों में यही देखने को मिला। मोहल्लों में एक वर्ग जब आई लव मोहम्मद के झंडे या बैनर लेकर निकलता है, तो दूसरा वर्ग इसे उकसावे की कार्रवाई मानता है। धीरे-धीरे माहौल गरमाने लगता है और छोटे-छोटे विवाद बड़े दंगों में बदल जाते हैं।  


गौरतलब है कि प्रदेश की कानून व्यवस्था लंबे समय से धार्मिक तनावों को लेकर चुनौती झेल रही है। प्रशासन अक्सर नारे लगाने और पोस्टर चिपकाने वालों के खिलाफ सख्ती नहीं दिखाता, क्योंकि इसे धार्मिक भावनाओं से जुड़ा मामला बना दिया जाता है। लेकिन सवाल ये उठता है कि जब इस्लामी शिक्षाओं में चित्र और मूर्ति जैसी चीज़ों का कोई स्थान नहीं है, तो फिर इन पोस्टरों को धार्मिक स्वतंत्रता कैसे माना जा सकता है? यह स्पष्ट है कि प्रशासन की शिथिलता के कारण ही ये साज़िशें परवान चढ़ रही हैं। धार्मिक नारों और बैनरों का दूसरा बड़ा पहलू राजनीति से जुड़ा हुआ है। हर चुनावी मौसम में समुदाय विशेष की भावनाओं को भड़काकर वोट पाना एक आम चलन बन चुका है। आई लव मोहम्मद आंदोलन भी यही खेल लगता है। आम लोगों की आस्था को हथियार बनाकर न केवल वातावरण दूषित किया जा रहा है, बल्कि दंगे-फसादों का डर दिखाकर राजनैतिक गोलबंदी भी की जा रही है। इन घटनाओं के कारण समाज के आम नागरिक लगातार दहशत में जी रहे हैं। जिन इलाकों में पोस्टर लगाए जाते हैं, वहां तनाव फैल जाता है। दुकानें जल्दी बंद हो जाती हैं, दैनिक जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है और छोटे-छोटे बच्चों तक के मन में डर बैठ जाता है। बड़ों के दिमाग में यह सवाल गूंजता है कि यह प्यार दिखाने का तरीका है या दंगे भड़काने की चाल?  


वहीं कई मुस्लिम विद्वानों ने खुलकर कहा है कि इस तरह के नारे और बैनर इस्लामी शिक्षा के खिलाफ हैं। पैग़म्बर मोहम्मद साहब से असली प्रेम उनका आदर्श जीवन अपनाने में है, न कि झंडे और पोस्टर लहराने में। लेकिन यही धार्मिक संदेश जब तक आम जनता तक सही रूप में नहीं पहुंचेगा, तब तक ये साज़िशें जारी रहेंगी। भारत का इतिहास धार्मिक उन्माद और दंगों से भरा पड़ा है। छोटी-सी चिंगारी बड़े विस्फोट में बदल जाती है। अंग्रेजों के जमाने से लेकर आज तक, फूट डालो और राज करो की नीति बार-बार दोहराई जाती रही है। फर्क बस इतना है कि अब राजनीति करने वाले आधुनिक तरीकों से यही काम कर रहे हैं। पोस्टर, बैनर और नारे इसी आधुनिक हथियार का हिस्सा हैं।  


बहरहाल,कुल मिलाकर इस्लामी विद्वानों को आम जनता को समझाना होगा कि मोहम्मद साहब के नाम का उपयोग राजनीतिक मंसूबों के लिए करना पाप है। असली अनुसरण उनके जीवन मूल्यों को अपनाने में है।किसी भी समुदाय की आस्था की आड़ लेकर शहर की शांति बिगाड़ने वालों पर तत्काल कार्रवाई होनी चाहिए। धार्मिक नारेबाज़ी के नाम पर पोस्टर या बैनर लगाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। समाज के सभी वर्गों को मिलकर यह समझना होगा कि ऐसे नारों के पीछे कौन-सी अंतरात्मा काम कर रही है। जब जनता खुद इन खेलों का शिकार नहीं बनेगी, तभी शांति कायम हो पाएगी। राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी’राजनीति का आधार धार्मिक भावनाएँ नहीं, बल्कि विकास और न्याय होना चाहिए। इसके लिए जनता को कठोर सवाल करना आवश्यक है।  

आई लव मोहम्मद जैसे नारों और पोस्टरों को देखने पर तत्कालीन भावनाएँ भले ही धार्मिक प्रेम की प्रतीक लगें, लेकिन असलियत में इनका इस्तेमाल समाज में नफरत फैलाने और दंगे भड़काने की साज़िश के रूप में किया जा रहा है। जब इस्लाम खुद पैग़म्बर साहब की तस्वीर तक हराम मानता है, तो ऐसे पोस्टर और नारे धर्म की सेवा नहीं बल्कि धर्म के नाम पर राजनीति करने का साधन हैं। शांति, भाईचारा और आपसी सम्मान ही असली संदेश है, जो इस्लाम समेत हर धर्म की आत्मा है। अगर उत्तर प्रदेश और देश को इन गहरी साज़िशों से बचाना है, तो समाज को सत्य पहचानना होगा और उस पर एकजुट होकर खड़ा होना होगा।  






  ‘आई लव’ को लेकर मुस्लिम धर्मगुरूओं में मतभेद  


संजय सक्सेना,लखनऊ

वरिष्ठ पत्रकार

skslko28@gmail.com

9454105568, 82990505


उत्तर प्रदेश की राजनीति बीते कुछ दिनों से आई लव मोहम्मद विवाद के साथ आई लव महादेव,आई लव महाकाल, आई लव योगी आदित्यनान और आई लव बुलडोजर जैसे पोस्टर-होर्डिंग्स के उभार से चर्चा के केंद्र में है। यह पोस्टर-बाज़ी केवल दिखावटी सियासत नहीं, बल्कि प्रदेश की चुनावी, धार्मिक और सामाजिक पहचान की जटिलता को गहराई से उजागर कर रही है.विवाद की बड़ी वजह यह है कि आई लव मोहम्मद जैसे पोस्टर सामने क्यों आ रहे हैं जबकि इस्लाम में मोहम्मद साहब का चित्र या उन्हें किसी भी रूप में प्रदर्षित करना बुत परस्ती माना जाता है। यही वजह है मुस्लिम समाज भी इसको लेकर दो हिस्सों में बंटा हुआ नजर आ रहा है। एक धड़ा वह है जो इसे गलत और इस्लाम के विरूद्ध मानता है वहीं दूसरा वर्ग जो कहीं न कहीं राजनीति से भी प्रेरित है उसे इमसें कोई बुराई नजर नहीं आती है। यही कारण है कि यह मुद्दा धार्मिक जगत से निकलकर सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर भी चर्चाओं का केंद्र बन गया है।  

विरोध करने वाले धर्मगुरूओं का तर्क है कि इस्लाम में पैग़ंबर मोहम्मद साहब के नाम के साथ किसी भी तरह के प्रदर्शन, नारेबाजी या पोस्टरबाजी को परंपरा के खिलाफ माना गया है। उनका कहना है कि मोहम्मद साहब को पूरी इंसानियत के लिए रहमतुल्लिल आलमीन कहा गया है और उनके प्रति प्रेम को दिल की गहराइयों में रखना ही सच्ची सुन्नत है। सार्वजनिक रूप से ‘आई लव मोहम्मद’ के पोस्टर निकालना या सोशल मीडिया पर इस तरह के अभियान चलाना कहीं न कहीं आस्था को प्रदर्शन का रूप दे देता है, जो शरीयत और इस्लामी तालीमात से मेल नहीं खाता। कई उलेमा का मानना है कि इस कदम से गैर-मुसलमानों के बीच यह संदेश जाएगा कि मुस्लिम समाज केवल नारे और पोस्टर की राजनीति कर रहा है। साथ ही कुछ धर्मगुरू यह भी आशंका जता रहे हैं कि इस तरह के अभियान आगे चलकर राजनीतिक दलों के लिए भी सियासी हथियार बन सकते हैं।  

दूसरी ओर, अभियान का समर्थन करने वाले धर्मगुरू और सामाजिक कार्यकर्ता यह दलील देते हैं कि मौजूदा समय में इस्लाम और पैग़ंबर मोहम्मद साहब को लेकर वैश्विक स्तर पर कई तरह की गलतफहमियां फैलाई गई हैं। ऐसे में अगर कोई समुदाय प्रेम और मोहब्बत का पैगाम देकर यह बताना चाहता है कि पैग़ंबर की शिक्षा इंसानियत, भाईचारे और रहमत की है, तो इसमें कोई बुराई नहीं है। इन धर्मगुरूओं के मुताबिक, यह प्रदर्शन अगर शांति और सौहार्द कायम करने की नीयत से किया जाए तो इसे विवाद की तरह नहीं देखा जाना चाहिए। समर्थन और विरोध के इस जंग में कई बड़े नाम सामने आए हैं। अहले सुन्नत से जुड़े कुछ प्रमुख मौलाना और सूफी संत इस अभियान का खुलकर साथ दे रहे हैं। उनका कहना है कि यह पैग़ंबर से मोहब्बत जाहिर करने का एक जमीनी तरीका है, जिससे युवाओं में भी सकारात्मक असर होगा। उनका यह भी तर्क है कि आज के दौर में सोशल मीडिया के जरिये नफरत के संदेश तेजी से फैलते हैं, तो क्यों न मोहब्बत का पैगाम भी उसी अंदाज में फैलाने की कोशिश की जाए। इसके उलट देवबंदी पंथ से जुड़े कई उलेमा और मजहबी रहनुमा इसे गैर-मुनासिब बता रहे हैं। उनका मानना है कि पैग़ंबर से प्रेम का इजहार आचरण, पांच वक्त की नमाज, रोजे और अच्छे अख्लाक से होना चाहिए, न कि पोस्टर या बैनर पर लिखे नारों से। उनके अनुसार, मोहब्बत का दावा करने वाले लोग अगर अपने अमल में पैग़ंबर की तालीम को उतार लें, तो यह समाज और देश दोनों के लिए ज्यादा हितकारी होगा। इस बहस का असर यह हुआ है कि मुस्लिम समाज दो धड़ों में बंट गया है। स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि मस्जिदों और मदरसों में इस विषय पर अलग-अलग बयान दिए जा रहे हैं, जिससे आम लोग भी असमंजस की स्थिति में हैं कि किसको सही माना जाए।  दिलचस्प बात यह है कि युवा वर्ग इस अभियान के प्रति अधिक उत्साहित दिख रहा है। कई जगहों पर कॉलेज और यूनिवर्सिटी के मुस्लिम छात्रों ने स्वयंसेवी तौर पर ‘आई लव मोहम्मद’ लिखे पोस्टर अपने आयोजनों और सोशल मीडिया पर साझा किए। वहीं बुजुर्ग आलिम वर्ग ने इस पर नाराजगी जताते हुए कहा कि नौजवानों को मूल तालीमात की ओर लौटने की जरूरत है, न कि सतही नारों की तरफ।  

बहरहाल, बात आई लव मोहम्मद प्रकरण की बात की जाये तो इसका आगाज़ कानपुर और बरेली से हुआ, जब बारावफात और जुमे के मौके पर मस्जिदों और सार्वजनिक स्थानों पर ‘आई लव मोहम्मद’ के पोस्टर लगाए गए. मुस्लिम समुदाय ने इसे पैगंबर के प्रति सम्मान की सार्वजनिक अभिव्यक्ति बताया, लेकिन हिंदू संगठनों ने इसे नई परम्परा और भावनाओं को भड़काने वाला कदम मानकर विरोध जताया. प्रशासन को विरोध-प्रदर्शन, नारेबाज़ी, झड़प और पथराव को नियंत्रित करने के लिए लाठीचार्ज और गिरफ्तारियों तक पहुंचना पड़ा. यह मुद्दा कानपुर, बरेली, मऊ, सहारनपुर, लखनऊ समेत कई शहरों से होते हुए राष्ट्रीय स्तर पर फैल गया.

‘आई लव मोहम्मद’ के पोस्टर्स के जवाब में खासकर धार्मिक व भाजपा समर्थक समूहों द्वारा ‘आई लव महादेव’ और ‘आई लव महाकाल’ के पोस्टर कई शहरों में सामने आए. इसी कड़ी में लखनऊ के चौराहों और सार्वजनिक स्थानों पर ‘आई लव योगी आदित्यनाथ’ और ‘आई लव बुलडोजर’ के होर्डिंग्स लगाए गए, जो सीएम योगी आदित्यनाथ एवं उनकी बुलडोजर एक्शन नीति का सख्त संदेश देते हैं. ये पोस्टर भाजपा युवा मोर्चा के नेताओं द्वारा एयरपोर्ट चौराहा, हजरतगंज, वीवीआईपी रोड जैसी प्रमुख जगहों पर लगाए गए. इस अभियान में योगी आदित्यनाथ की इमेज को कानून-व्यवस्था के ‘रक्षक’ और अपराध के खिलाफ ‘बुलडोजर एक्शन’ से जोड़ा जा रहा है, जिससे हिंदू युवा वर्ग व भाजपा समर्थकों में बेहद लोकप्रियता मिल रही है.वर्तमान पोस्टर-होर्डिंग्स ट्रेंड चुनावी ध्रुवीकरण, पहचान की सियासत और संवादहीनता का प्रतीक बन गया है। मुख्यमंत्री योगी के पोस्टर, बुलडोजर की छवि और ‘आई लव महादेव’ जैसी टैगलाइन भाजपा के रणनीतिक ध्रुवीकरण के हथियार हैं, जिससे पार्टी हिंदू वोट बैंक और मध्यम वर्ग को मजबूती दे रही है. दूसरी ओर विपक्षी दल इस अभियान को बेरोजगारी, महंगाई और जनसमस्याओं से ध्यान हटाने का साधन मानते हैं तथा जनता को असल मुद्दों के बजाय भावनात्मक सवालों में उलझा देने की राजनीति करार देते हैं.इसके साथ ही, धार्मिक भावनाओं के खुले प्रदर्शन से साम्प्रदायिक तनाव बढ़ते हैं। समाज में वर्गीय, धार्मिक व सांस्कृतिक ध्रुवीकरण की स्थिति बन रही है, जिससे शांति व्यवस्था और प्रशासन को लगातार निपटना पड़ रहा है.

एक तरफ जहाँ ये अभियान हिंदू-मुस्लिम पहचान को सियासी मंच पर सामने लाते हैं तो दूसरी ओर कानून-व्यवस्था के लिए सवाल भी खड़े कर देते हैं. कई जगहों पर आम लोगों, युवाओं और महिलाओं का भी सार्वजनिक प्रदर्शन, झड़प और गिरफ्तारियों तक से माहौल तनावपूर्ण बना है.राज्य सरकार इन पोस्टर्स को सख्ती से नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है, लेकिन सोशल मीडिया, प्रचार और विपक्षियों की प्रतिक्रियाओं से यह विवाद लगातार तूल पकड़ता जा रहा है.कुल मिलाकर आई लव वाली ब्रांडिंग अब उत्तर प्रदेश की राजनीति में सिर्फ धार्मिक समर्थन का नहीं, बल्कि चुनावी रणनीति, जनभावनाओं की दिशा और राजनीतिक संवाद का शक्तिशाली औजार बन चुकी है. इससे सियासत अब विकास, रोजगार व जनकल्याण जैसे मुद्दों से हटकर पहचान, छवि और ध्रुवीकरण के इर्द-गिर्द घूमती दिखती है। साम्प्रदायिक तनाव, प्रशासनिक चुनौतियां और मुद्दों का भावनात्मकरण इस अभियान की बड़ी प्रवृत्ति बन चुके हैं।