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बलिया : घोषणाओं को सुनने के आदि हो चुके ओझवलिया के ग्रामीणों में हजारी प्रसाद की मूर्ति लगने की सुगबुगाहट से जगी उम्मीद की किरण : पूर्व सांसद के प्रयास से पानी की टंकी प्रवेश द्वार के बनने के बाद वर्तमान सांसद के प्रयास से लगने जा रही है आदमकद प्रतिमा


 मात्र घोषणाओं को सुनने के आदि हो चुके ओझवलिया के ग्रामीणों में हजारी प्रसाद की मूर्ति लगने की सुगबुगाहट से जगी उम्मीद की किरण : पूर्व सांसद के प्रयास से पानी की टंकी प्रवेश द्वार के बनने के बाद वर्तमान सांसद के प्रयास से लगने जा रही है आदमकद प्रतिमा

बलिया 8 जुलाई 2019 ।।
पद्मभूषण , हिंदी और ज्योतिष के प्रकांड विद्वान , अद्वितीय समालोचक , बागी बलिया के साहित्यिक परचम को देश विदेश में लहराने वाले आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के पैतृक गांव के ग्रामीणों में विकास के मामले में उपेक्षा का दंश वर्षो से झेलने के बाद भी इनके चेहरे पर इस समय उम्मीद की किरण झलकती हुई दिख रही है । यह किरण अपने गांव के अनमोल रत्न आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की आदमकद प्रतिमा लगाने की सुगबुगाहट से आयी है । बता दे कि विकास की दौड़ में काफी पीछे छूट चुके इस गांव ओझवलिया को सांसद आदर्श गांव के रूप में चयनित करके निवर्तमान सांसद भरत सिंह ने विकसित करने का प्रयास किया था लेकिन लाल फीताशाही की अकड़ कहिये , या प्रयास की कमी , मात्र एक प्रवेश द्वार , पानी की टंकी और प्राथमिक विद्यालय में कम्प्यूटर देने के अलावा सांसद जी और कार्य नही करा पाये । ग्रामीणों की वर्षो से मूर्ति लगाने की मांग भी पूरी नही करा पाये । एक बार फिर इस गांव की तरफ विकास की किरण निकलने के लिये आतुर दिख रही है । वर्तमान सांसद वीरेंद्र सिंह मस्त के निर्देश पर उनके छोटे भाई मोहन जी आचार्य हजारी प्रसाद की आदमकद मूर्ति लगाने के लिये जी जान से लग गये है । इस खबर से ग्रामीणों में खुशी की लहर दौड़ गयी है । श्री मोहन जी ने बताया है कि मेरा प्रयास है कि मूर्ति स्थापना आचार्य जी के जन्म दिन 19 अगस्त को की जाय और इसका अनावरण आचार्य जी के जीवित शिष्य के हाथों कराया जाय ।
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी 

(सुशील द्विवेदी ओझवलिया)
सुरसरिता पतित- पावनी गंगा के पवित्र तट पर स्थित महर्षि भृगु की तपशर्या के तेज से अद्यावधि प्रकाश- पुञ्ज बिखेरती हुई अनादि-काल से ज्ञान-विज्ञान की खान जनपद बलिया की यशोधरा भूमि के पूर्वीय कोण में पवित्र गंगा तट पर स्थित सुप्रसिद्ध ओझवलिया ग्राम में 19 अगस्त सन् 1907 ई. को ज्योतिष मर्मज्ञ श्री अनमोल द्विवेदी की पत्नी श्रीमती ज्योतिष्मती देवी की कुक्षि से श्री व्योमकेश द्विवेदी का जन्म हुआ । जन्म के पश्चात ही इनके नाना श्री देवनारायण पाण्डेय ने एक कठिन एवं लम्बा अभियोग जीतकर विजय स्वरूप हजार रूपया भी प्राप्त किया जो अपने नाती को दे दिये । इस उल्लास में व्योमकेश, "हजारी प्रसाद" हो गये जो अपने युग में हिंदी के प्रकाण्ड विद्वान के रूप में प्रसिद्ध हुए । सरयू जल के समान निर्मल स्वभाव वाले सरयूपारीण ब्राह्मण परिवार में जन्मे भारत-प्रसिद्ध हिंदी भाषा-भास्कर ज्योतिर्विद् डाॅ. हजारी प्रसाद द्विवेदी की शिक्षा-दीक्षा ग्रामीण विद्यालय रेपुरा से प्राइमरी एवं वर्नाकुलर फाइनल (मिडिल) की परीक्षा बसरिकापुर से हुई थी । उच्च शिक्षा ग्रहण करने हेतु पंडित जी सन्  1921 में काशी जाकर मालवीय जी द्वारा स्थापित
"हिन्दू विश्व विद्यालय" में  ज्योतिष में प्रवेश लिया । इस प्रकार मालवीय जी के सान्निध्य में अत्यंत उच्च श्रेणी  के परिक्षार्थी के रूप में सन् 1929 में श्री द्विवेदी जी परीक्षा में सर्व प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए । परीक्षा उत्तीर्ण कर जब मालवीय जी से आशीर्वाद लेने गये तो इनकी अलौकिक प्रतिभा का मूल्यांकन करके वे बोले- 'तुम हिन्दी के बहुत अच्छे विद्वान हो । रविन्द्रनाथ ठाकुर ने एक हिंदी अध्यापक मांगा है,उन्हें पत्र लिख देता  हूँ, चले जाओ' । इस प्रकार मालवीय जी की कृपा से हजारी प्रसाद जी प्रारंभ में ही उस धरातल पर पहुँचे जहाँ से उनकी कीर्ति - पताका गगन में फहराने लगी और दिग्- दिगन्त में शुभ - संदेश देने लगी । विद्या की अधिष्ठात्री देवी माँ सरस्वती के वरद-पुत्र आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी हिन्दी के शीर्षस्थ साहित्यकारों में से है । वे उच्चकोटि के निबन्धकार,उपन्यासकार,आलोचक,
चिन्तक तथा शोधकर्ता है । साहित्य के इन सभी क्षेत्रों में द्विवेदी जी अपनी प्रतिभा एवं विशिष्ट कर्तव्य के कारण विशेष यश के भागीदार हुए है । आचार्य जी का व्यक्तित्व गरिमामय,चित्तवृत्ति उदार और दृष्टिकोण व्यापक है । द्विवेदी जी के प्रत्येक रचना पर उनके इस व्यक्तित्व की छाप देखी जा सकती है । उन्होंने सुर, तुलसी आदि पर जो विद्वत्तापूर्ण आलोचनाए लिखी है वे हिन्दी में पहले नहीं लिखी गयी । उनका निबंध साहित्य हिन्दी की स्थायी निधि है । उनकी समस्त कृतियों पर उनके गहन विचारों और मौलिक चिंतन की छाप है । विद्वान विश्वभारती आदि के द्वारा द्विवेदी जी ने संपादन के क्षेत्र में पर्याप्त सफलता प्राप्त की ।


  उनके निबंधों में दार्शनिक तत्वों की प्रधानता रहती है । हिन्दी साहित्य का इतिहास,भारतीय धर्मसाधना,सूरदास,कबीर आदि ग्रन्थ उनके साहित्य की परख और इतिहास बोध की प्रखरता को रेखांकित करते है । 'वाणभट्ट की आत्मकथा' के साथ ही पुनर्नवा, 'चारूचन्द्रलेख', अनामदास का पोथा, जैसे ऐतिहासिक उपन्यास ऐतिहासिकता और पौराणिकता की रक्षा करते हुए अपने युग और समाज के सच को उजागर किया । आचार्य जी कई वर्षों तक काशी 'नागरी प्रचारिणी सभा' के उपसभापति, 'खोज विभाग के निदेशक तथा 'नागरी प्रचारिणी सभा' के संपादक रहे है । सन् 1950 ई. में  'बीएचयू' में 'हिन्दी विभाग' के अध्यक्ष एवं प्रोफेसर रहे । इसके एक वर्ष पूर्व सन् 1949 ई. में 'लखनऊ विश्वविद्यालय' ने  उनकी हिन्दी की महत्वपूर्ण सेवा के कारण उन्हें 'डी.लिट.' की सम्मानित उपाधि प्रदान की थी । सन् 1955 ई.में वे प्रथम 'आफिशियल लैंग्वेज कमीशन' के सदस्य चुने गये । उनको साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में महमहिम राष्ट्रपति द्वारा सन् 1957 में 'पद्मभूषण' से सम्मानित किया गया । सन् 1958 ई. में वे  'नेशनल बुक ट्रस्ट' के सदस्य रहे । सन् 1960 ई. में 'पंजाब विश्वविद्यालय' के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष और प्रोफेसर होकर चण्डीगढ चले गये । सन् 1968 ई. में ये फिर 'बीएचयू' में 'डायरेक्टर' नियुक्त हुए तत्पश्चात उत्तर प्रदेश 'हिन्दी ग्रन्थ अकादमी' के अध्यक्ष हुए और फिर 19 मई सन् 1979 ई. में 'महानिर्वाण' को प्राप्त हो गये । उनका पुरूषोत्तम व्यक्तित्व हम सबके लिए प्रेरणादायक है । उनमें प्रखर पाण्डित्य,शील, विनय, ऋजुता आदि सभी गुणों का समावेश था । उन्होंने अनेक गवेषणात्मक श्रेष्ठतम ग्रन्थों का सृजन कर हिन्दी जगत् की श्रीवृद्धि की है उनका कृतित्व व व्यक्तित्व अपने आप में एक संस्थान है यदि हमारे युवा पीढ़ी उनके पद - चिन्हों पर चलें और उनका अनुकरणीय करे तो अवश्य ही वे भी प्रतिभावान् और कोविद बनेंगे,जिससे हिन्दी साहित्य व ज्योतिष का ज्ञान समृद्ध होगा ।
आज हिन्दी जगत् के देदीप्यमान नक्षत्र एवं कालजयी रचनाकार आचार्य श्री द्विवेदी के रचना से भारत ही नहीं बल्कि पूरा विश्व आलोकित हो रहा है, लेकिन उनका पैतृक गांव ओझवलिया ही आज अपनी पहचान को मोहताज नजर आ रहा है, जहाँ आज तक इतने बड़े महान विभूति की एक प्रतिमा तक इस गाँव में नहीं है । इसके लिए ग्रामीणों ने जिला प्रशासन सहित जनप्रतिनिधियों को जिम्मेदार ठहराया है । गाँव के प्रबुद्ध लोगों ने स्वनामधन्य आचार्य जी की 'आदमकद प्रतिमा' एवं 'आधुनिक डिजिटल पुस्तकालय' की मांग तेज कर दी है ।
सन् 1948 में अपने प्रसिद्ध निबन्धकार संग्रह 'अशोक के फूल' से हिन्दी साहित्य के आकाश पर अपना परचमस लहराने वाले बागी- बलिया के अद्वितीय लाल डॉ हजारी प्रसाद द्विवेदी आज अपने ही जनपद में विस्मृत होते जा रहे है । इनसे जुड़ी स्मृति चिन्हों को मिटते देखते रहे जनता के रहनुमा । खाली पड़ी जगहों पर नेताओं की मुर्ति  लगने में थोड़ी भी देर नहीं होती है परन्तु हिन्दी के इस देदीप्यमान नक्षत्र के लिए 22 वर्ष  पूर्व तत्कालीन जिलाधिकारी नरेश कुमार के आदेश पर हुए शिलान्यास के बाद भी विद्वत्तप्रवर आचार्य श्री की मुर्ति नहीं लग पायी ।

सरकारी तंत्र की उपेक्षा से 'अशोक के फूल' के माली की बगिया (ओझवलिया) में 'अशोक के फूल' (पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी से जुड़ी यादों को दर्शाने वाली वस्तुए) अब मुर्झाने को विवश है । आचार्य जी का पैतृक गाँव गंगा तट पर बसा है जिसको गंगा में समाहित होने से बचाने के लिए 90 के दशक में दुबहड़ से हल्दी तक एक रिंग बाँध बनाया गया था जो बीच - बीच में छुट गया था जिस कारण भड़सर,भीमपट्टी, विशुनपुरा,ओझवलिया,रेपुरा,सुजानीपुर,हल्दी में बाढ़ के कारण इन गाँवों के अस्तित्व के लिए खतरा बनता जा रहा है । इस अर्द्ध निर्मित रिंगबंधे की मरम्मत कराये बगैर ओझवलिया सहित दर्जनों गाँव बाढ़ के दिनों में बंधा होते हुए भी डूब जाता है । आज ओझवलिया की ये स्थिति है कि बिजली के जर्जर तार रोज आये दिन टूट कर अपने आप गिर जाते है जो आने वाले खतरे को आगाह करने के लिए काफी । पूर्व सांसद भरत सिंह के बिजली विभाग के एक्सईन को बार-बार कहने के बावजूद आज तक जर्जर तारों को बदलकर केबिल नहीं लगाया गया । सांसद द्वारा प्रा0 विद्यालय के बगल में स्थित तालाब, जो ' हजारी सरोवर' के नाम से अलंकृत किया गया एवं इसका सुन्दरीकरण व पक्का सीढ़ी निर्माण,बैंक व अस्पताल की स्थापना, वाई-फाई, युवाओं के रोजगार के लिए 'कौशल विकास केंद्र' की स्थापना आदि की  घोषणा व इसका प्रचार-प्रसार तो खूब जोर' शोर से किया गया परन्तु हद तो तब हो गयी जब 20 मई 2017 को सांसद भरत सिंह ने 70 लाख रूपये की लागत से  पद्मभूषण द्विवेदी जी की गरिमा एवं सम्मान के अनुरूप 'आधुनिक भव्य सामुदायिक भवन) बनवाने के लिए विधायक द्वय आनन्द स्वरूप शुक्ल व बैरिया विधायक सुरेन्द्र सिंह व सीडीओ संतोष कुमार के साथ पूरे लाव-लस्कर के साथ भूमि पूजन किया परंतु आज तक कोई  कार्य शुरू ही नहीं हुआ ।



आज भी  पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी के गांव ओझवलिया के ग्रामीण उक्त घोषणा पर अमल न होने से अपने आप को ठगा और उपेक्षित महसूस करते हुए विकास की बाट जोह रहे है ।
आचार्य जी की जयंती पर जुटे प्रबुद्धजन (फ़ाइल फोटो)