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बलिया - 22अप्रैल - विश्व पृथ्वी दिवस पर विशेष : अब भी नहीं चेते तो विनष्ट हो जायेगी हमारी धरती - डा० गणेश पाठक

22अप्रैल - विश्व पृथ्वी दिवस पर विशेष : अब भी नहीं चेते तो विनष्ट हो जायेगी हमारी धरती - डा० गणेश पाठक






डॉ सुनील कुमार ओझा(उप संपादक बलिया एक्सप्रेस )
        
बलिया 21 अप्रैल 2019 ।।अमरनाथ मिश्र स्नातकोत्तर महाविद्यालय दूबेछपरा, बलिया के पूर्व प्राचार्य एवं पर्यावरणविद् डा० गणेश कुमार पाठक ने 22अप्रैल, विश्व पृथ्वी दिवस के अवसर पर एक भेंट वार्ता में बताया कि पृथ्वी को पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी असंतुलन तथा बढ़ रहे प्रदूषण और विश्व व्यापी पर्यावरणीय समस्याओं से बचाने हेतु  अमेरिकी सीनेटर जेराल्ड नेल्सन ने 22 अप्रैल, 1970 में पर्यावरण को बचाने हेतु पर्यावरण शिक्षा के रूप में एक अभियान के रूप में शुरूआत की थी। चूँकि 22 अप्रैल को ही नेल्सन का जन्मदिन था, इस लिए इस कार्यक्रम के समन्वयक डेनिस हेज ने इस कार्यक्रम को "पृथ्वी दिवस" के रूप में पृथ्वी को बचाने हेतु  मीडिया के सम्मुख प्रस्तुत किया। तब से लेकर अब तक प्रतिवर्ष लगातार पृथ्वी दिवस मनाया जाता आ रहा है और अब इस समय विश्व के 193 से अधिक देश एक साथ प्रतिवर्ष पृथ्वी को बचाने हेतु 22 अप्रैल को पृथ्वी दिवस मनाते हैं , जिसमें लाखों लोग भाग लेते हैं।
         डा० पाठक ने बताया कि प्राचीन काल से लेकर मर्तमान समय तक जैसे- जैसे जनसंख्या वृद्धि होती गयी , खाद्यान्न एवं अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति हम तेजी से विकास की तरफ अग्रसर हुए, जिसके चलते न केवल वनों का तीव्र गति से विनाश हुआ, बल्कि अन्य प्राकृतिक संसाधनों का भी तीव्र गति से अनियोजित तथा अनियंत्रित तरीके से दोहन एवं शोषण हुआ। तीव्रगति से हो रही जनसंख्या वृद्धि , नगरीयकरण, औद्योगीकरण एवं तकनीकी विकास ने एक तरफ जहाँ जल , वायु , ध्वनि,  भूमि, अंतरीक्ष, समुद्र एवं नाभिकीय प्रदूषण को जन्म देकर मानव का जीना दुभर कर दिया है, वहीं दूसरी तरफ प्राकृतिक संसाधनों के अतिशय दोहन एवं शोषण ने पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी असंतुलन को जन्म देकर ध केवल मानव के लिए बल्कि सम्पूर्ण जीव जगत के लिए संकट उत्पन्न कर दिया है। यही नहीं अब तो विश्व व्यापी पर्यावरणीय समस्याएँ जैसे- ग्रीन हाऊस प्रभाव, ओजोन परत का नष्ट होना, तेजाबी वर्षा एवं इन सबके प्रभाव से हो रहा ग्लोबल वार्मिंग अर्थात पृथ्वी के तापमान में निरन्तर हो रही वृद्धि तथा निरन्तर घटित हो रहीं प्राकृतिक आपदाओं ने तो पृथ्वी के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया है और पृथ्वी विनाश के कगार पर खड़ी हो गयी है , कारण कि तापमान में निरन्तर वृद्धि होने से जलवायु में भी परिवर्तन हो रहा है, जिससे सभी प्रकार के जीवधारियों , वनस्पतियों एवं जल स्रोतों के लिए खतरा उत्पन्न हो गया है। जलवायु परिवर्तन के कारण ही प्राकृतिक आपदाओं की प्रवृत्ति एवं गहनता दिन प्रति दिन बढ़ती जा रही है।
      डा० पाठक ने बताया कि पृथ्वी पर मँडरा रहे उपर्युक्त खतरों को देखते हुए ही सम्पूर्ण विश्व में पृथ्वी को बचाने हेतु पर्यावरण संरक्षण संबंधी आन्दोलन चलाए जाने लगे और इसी के तहत 22 अप्रैल को प्रतिवर्ष पृथ्वी दिवस भी मनाये जाने का संकल्प लिया गया। डा० पाठक ने बताया कि यदि हमें पृथ्वी को विनाश से बचाना है तो सबसे आवश्यक है कि वन विनाश को रोककर एवं वृक्षारोपण कर पहले की तरह पृथ्वी को हरा - भरा बनाया जाय। जल स्रोतों एवं ग्लेशियरों को सूखने एवं पिघलने से बचाना होगा अन्यथा यदि सभी ग्लेशियर पिघल गये तो जल प्रलय की स्थिति भी आ सकती है। संसाधनों के अतिशय , अनियंत्रित एवं अनियोजित दैहन एवं शोषण को रोकना होगा तथा अपनी भोगवादी प्रवृत्ति एवं विलासितापूर्ण जीवन पर भी रोक लगानी होगी और माता भूमिः पुत्रोअहम् पृथ्वियाः की संकल्पना को अपनाकर पृथ्वी को बचाना होगा।
      डा० पाठक ने पर्यावरण संरक्षण के प्रति उत्तरदायित्व को स्पष्ट करते हुए बताया कि  हमें सबसे पहले अपने स्तर से संरक्षण की बात सोचनी होगी। उसके बाद परिवार एवं समाज को सचेष्ट करना होगा और फिर तो कारवाँ बनता जायेगा। हमें अपने दैनिक कार्यों से पर्यावरण संरक्षण पर ध्यान देना होगा। पर्यावरण संरक्षण हेतु हमें सर्व प्रथम प्राकृतिक संसाधनों को सुरक्षित एवं संरक्षित करना होगग, जिसके लिए हमें संरक्षण के कुछ मूलभूत सिध्दांतों एवं उपायों को अपनाना होगा. जैसे- लाभकारी उपयोग, बर्बादी को रोकना , विकल्प की खोज, स्वामित्व पर नियन्त्रण, उत्पादन शक्तियों का विकिस एवं नागरिकों का प्रशिक्षण तथा जनजागरूकता आवश्यक है। इस तरह पर्यावरण संरक्षण हेतु हमें संसाधन आधार का ज्ञान, आवश्यकता की पूर्ति हेतु सस्ते संसाधनों पर रोक, संसाधनों की उचित मात्रा का ज्ञान, अल्प मात्रा वाले संसाधनों का वैज्ञानिक उपयोग, संसाधन सम्मिश्र का ज्ञान, आत्मनिर्भरता एवं पारस्परिक सहयोग तथा जनसंख्या संसाधन संरक्षण पर ध्यान केन्द्रित करना होगा। हमें समन्वित विकास, संतुलित विकास एवं संध्दृत विकास की प्रक्रिया अपनानी होगी तथा भौतिक विकास के लिए पर्यावरण का मैत्रीपूर्ण उपयोग करना होगा।
      डा० पाठक ने भारतीय परिप्रेक्ष्य में यह भी बताया कि हम प्रकृति पूजक हैं, हमारी संस्कृति अरण्य संस्कृति रही है, हम माता भूमिः पुत्रोअहम् पृथ्वियाः की अवधारणा के पोषक हैं। हमारी भारतीय संस्कृति ही पर्यावरण संरक्षण की अवधारणाओं से ओत- प्रोत है। हमारे भारतीय वांगमय में पर्यावरण संरक्षण संबंधी इतनी अवधारणाएँ हैं कि उतनी विश्व में कहीं नहीं ।एक तरह से भारत ही पर्यावरण संरक्षण की अवधारणा को प्रस्तुत करने का अगुआ है।  हम प्रकृति के प्रत्येक अवयवों की पूजा उनके संरक्षण को ध्यान में रखकर ही करते हैं। सूर्य देवो भव, वरूण देवो भव, वृक्ष देवो भव, मरूत देवो भव, अग्नि देवो भव, जीव देवो भव अर्थात प्रकृति के सभी कारकों की हम पूजा करते हैं। हिंसक अहिंसक सभी जील - जंतुओं को देवताओं का वाहन बनाकर सम उनकी पूजा कयते हैं ताकि उनको कोई हानि न पहुँचा सके। वृक्षों पर देवी - देवताओं का वास मानकर हम वृक्ष की रक्षा करते हैं। हम भगवान की पूजा करते हैं और भगवान का अर्थ होता है  - भ से भूमि, ग से गगन, व से वायु, अ से अग्नि और न से नीर । अर्थात प्रकृति के पाँच मूल तत्वों - क्षिति, जल , पावक, गगन , समीर की पूजा ही हम भगवान के रूप में करते हैं .कहने का तात्पर्य यह है कि हम भगवान की पूजा भी प्रकृति अर्थात पर्यावरण की रक्षा के लिए ही करते हैं। आज आवश्यकता है इन तथ्यों को जन- जन तक पहुँचाने एवं उन्हें समझाने की ताकि पृथ्वी की रक्षा करने में जन- जन की सहभागिता सुनिश्चित हो सके।