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योगी सरकार के मंत्री का अपने ही प्रशासन के खिलाफ धरना,उठा रहा है कई सवाल




लखनऊ।। उत्तर प्रदेश की राजनीति में हाल ही में घटी घटना—विशेषकर केजीएमयू के बाहर कैबिनेट मंत्री संजय निषाद का अपनी ही सरकार के खिलाफ धरना देना—केवल एक स्थानीय प्रशासनिक चूक या तात्कालिक विरोध तक सीमित नहीं है। यह घटना उत्तर प्रदेश की वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था, उसके वैचारिक चरित्र और आगामी **2027 के विधानसभा चुनाव** की पृष्ठभूमि में एक गहरा वैचारिक और संरचनात्मक संकट उजागर करती है।

इस पूरे घटनाक्रम का एक समन्वित और आलोचनात्मक विश्लेषण निम्नलिखित प्रमुख बिंदुओं के अंतर्गत समझा जा सकता है:

1. प्रशासनिक विफलता और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की छवि पर सवाल

उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की राजनीतिक साख का सबसे बड़ा स्तंभ उनकी 'कड़क कानून-व्यवस्था' (Law and Order) और अपराधियों के प्रति शून्य सहिष्णुता की नीति रही है। ऐसे में, यदि राज्य का ही एक कैबिनेट मंत्री (संजय निषाद) न्याय के लिए सड़क पर उतरने को विवश हो जाए, तो यह सीधे तौर पर प्रशासनिक नियंत्रण और पुलिस व्यवस्था की पोल खोलता है। यह स्थिति मुख्यमंत्री की उस स्थापित छवि को भी चुनौती देती है जिसके तहत यह दावा किया जाता रहा है कि सरकार पीड़ित को त्वरित न्याय घर-घर पहुँचाती है।

2. सत्ता का वर्गीय चरित्र और 'आरएसएस' की वैचारिक पृष्ठभूमि

इस शासन प्रणाली की वैचारिक रीढ़ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की उन नीतियों पर टिकी है जो एक विशिष्ट सामाजिक-सांस्कृतिक और उच्च वर्गीय ढांचे को प्राथमिकता देती हैं। यह एक खुला सच है कि नीति-निर्माण और प्रशासन के शीर्ष स्तर पर एक खास वर्ग का प्रभाव सर्वोपरि रहता है। चुनावी मजबूरी के तहत पिछड़ी, अति पिछड़ी और दलित जातियों के वोट हासिल करने के लिए कई छोटे दलों और नेताओं को मंत्रिमंडल में शामिल तो कर लिया जाता है, किंतु जब जमीन पर अधिकारों और न्याय की बात आती है, तो यह मशीनरी अपनी मूल प्रकृति के अनुसार ही काम करती नजर आती है। संजय निषाद का धरना इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि दिखावे की नुमाइंदगी और वास्तविक सत्ता-साझेदारी में जमीन-आसमान का अंतर है।

3. सहयोगी दलों के नेताओं की लाचारी और 'प्रतीकात्मक' हिस्सेदारी

गठबंधन की राजनीति में शामिल पिछड़ी और अति पिछड़ी जातियों के नेताओं के सामने आज एक गंभीर नैतिक और राजनीतिक संकट खड़ा हो गया है। जब कैबिनेट मंत्री होने के बावजूद उन्हें अपने ही समाज के एक साधारण कार्यकर्ता की हत्या या उत्पीड़न पर न्याय पाने के लिए धरने का रास्ता अपनाना पड़े, तो यह उनके राजनीतिक वजूद और आत्म-सम्मान पर सीधा आघात है। यह स्थिति जनता के बीच यह संदेश देती है कि ये नेता केवल सत्ता के मोह या पद के लालच में अपने समाज की उपेक्षा सहने को मजबूर हैं, क्योंकि सरकार के भीतर उनकी आवाज को दबा दिया जाता है।

4. 2027 का चुनाव और वंचित वर्गों के लिए आत्ममंथन का क्षण

उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में 'गैर-यादव ओबीसी' और 'अति पिछड़ी जातियों' (जैसे निषाद, मल्लाह, केवट, बिंद, राजभर आदि) की भूमिका सबसे निर्णायक रही है। आगामी 2027 के विधानसभा चुनावों के मद्देनजर यह घटना एक बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हो सकती है।

                     विपक्ष के लिए अवसर
विपक्ष इस बात को आक्रामक रूप से उठा रहा है कि जब सरकार अपने ही सहयोगी मंत्री के कार्यकर्ताओं को सुरक्षा नहीं दे पा रही, तो आम जनता की क्या स्थिति होगी।


             समाज के लिए सीख

यह पूरी घटना उत्तर प्रदेश के शोषित, वंचित और पिछड़े वर्गों के लिए एक गंभीर आत्ममंथन का क्षण है। आज यह सवाल हर जागरूक नागरिक के सामने है कि क्या ऐसी व्यवस्था में बने रहना उचित है जहाँ शासन का चरित्र मूलतः बहुजन-विरोधी और उच्च वर्गीय वर्चस्व वाला हो? क्या वोट की ताकत का उपयोग केवल ऐसी ताकतों को मजबूत करने के लिए किया जाना चाहिए जो संकट के समय उनके अपने नुमाइंदों को भी दरकिनार कर देती हैं?

5. संकट प्रबंधन और सरकार का 'डैमेज कंट्रोल'

घटना के तूल पकड़ने के बाद पुलिस महकमे द्वारा तीन नामजद आरोपियों की गिरफ्तारी और कुछ पुलिसकर्मियों का निलंबन यह दर्शाता है कि शासन इस बात से भली-भांति परिचित है कि यदि इस असंतोष को समय रहते शांत नहीं किया गया, तो यह तूल पकड़कर बड़ा राजनीतिक आंदोलन बन सकता है। इसके बावजूद, यह तात्कालिक कार्रवाई केवल एक 'डैमेज कंट्रोल' (Damage Control) बनकर रह जाती है जब तक कि संरचनात्मक स्तर पर पिछड़ों और अति पिछड़ों के सम्मान की गारंटी न दी जाए।

                          निष्कर्ष
यह घटना इस बात की चेतावनी है कि केवल बड़े विकास के दावों या प्रतीकात्मक गठबंधनों से जमीनी असंतोष को लंबे समय तक दबाया नहीं जा सकता। यदि सत्ता के ढांचे में बहुसंख्यक समाज की वास्तविक भागीदारी और निर्णय लेने का अधिकार नहीं मिलता, तो इस तरह के अंतर्विरोध आने वाले चुनावों में सत्तारूढ़ दल के लिए एक बड़ी राजनीतिक चुनौती बनकर उभरेंगे।