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नाग पंचमी का महत्त्व

                    



लखनऊ।। नाग पंचमी सनातन परंपरा का एक प्रमुख त्यौहार है, जो सावन (श्रावण) माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन नाग देव (सर्पों) की पूजा का विशेष विधान है।

 नाग पंचमी का धार्मिक एवं सामाजिक महत्व

प्रकृति और जीव संरक्षण: भारतीय संस्कृति में केवल मनुष्यों ही नहीं, बल्कि पशु-पक्षियों और सरीसृपों को भी ईश्वर का स्वरूप मानकर सम्मानित किया गया है। नाग पंचमी पर्यावरण संतुलन और जीव-जंतुओं के प्रति दयाभाव प्रकट करने का प्रतीक है।

भय और सर्पदंश से मुक्ति: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, नागों की पूजा करने से सर्पदंश का भय समाप्त होता है और घर-परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है।

कालसर्प दोष निवारण: ज्योतिष शास्त्र में नाग पंचमी का दिन कालसर्प दोष और राहू-केतु से जुड़े दोषों के निवारण के लिए अत्यंत फलदायी माना गया है।


 शास्त्रों और पुराणों में उल्लेख


सनातन ग्रंथों, वेदों और पुराणों में नागों को दिव्य शक्तियों के रूप में स्वीकार किया गया है ----


महाभारत (आस्तिक पर्व): महाभारत के अनुसार, राजा जनमेजय ने अपने पिता परीक्षित की तक्षक नाग के काटने से हुई मृत्यु का बदला लेने के लिए 'सर्प सत्र' (सर्प मेध यज्ञ) शुरू किया था। ऋषि आस्तिक मुनि ने अपनी विद्वत्ता से राजा जनमेजय को प्रसन्न करके इस यज्ञ को रुकवाया और नागों की रक्षा की। जिस दिन यह यज्ञ रुका, वह सावन शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि थी। नागों को जलने की तपन से बचाने के लिए उन पर कच्चा दूध चढ़ाया गया था। तभी से नाग पंचमी का त्यौहार मनाया जाने लगा।

भविष्य पुराण:भविष्य पुराण में नाग पूजा का विस्तृत वर्णन मिलता है। इसमें कहा गया है कि पंचमी तिथि को नागों की पूजा करने से और उन्हें दूध से स्नान कराने या अर्पित करने से कुल में सर्प भय नहीं रहता।

अग्नि पुराण और नारद पुराण: इन पुराणों में वासुकि, तक्षक, शेषनाग, अनन्त, पद्म, महापद्म, शंख और कुलिक जैसे प्रमुख 'अष्टनागों' की पूजा का विधान बताया गया है।

श्रीमद्भगवद्गीता: भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के 10वें अध्याय (विभूति योग) में स्वयं को नागों का राजा 'अनन्त' और सर्पों का राजा 'वासुकि' कहा है (*"अनन्तश्चास्मि नागानां वासुकिश्चास्मि सर्पाणाम्"*), जो नागों की दिव्यता को सिद्ध करता है।


               नाग पंचमी क्यों मनाई जाती है?


1. पौराणिक मान्यता: जनमेजय के सर्प यज्ञ को रोककर नाग वंश की रक्षा करने की स्मृति में यह पर्व मनाया जाता है।

2. भगवान शिव और विष्णु से संबंध: नाग देव भगवान शिव के गले का हार (वासुकि) हैं और भगवान विष्णु की शैय्या (शेषनाग) हैं। इसलिए नागों की आराधना से शिव-विष्णु दोनों की कृपा प्राप्त होती है।

3. कृषि एवं व्यावहारिक कारण:वर्षा ऋतु (सावन) में बिलों में पानी भर जाने के कारण सांप बाहर निकल आते हैं। किसान और ग्रामीण लोग खेतों में कार्य करते समय सर्पों से सुरक्षा और समन्वय बनाए रखने के लिए इस दिन नाग देव की पूजा कर उनसे आशीर्वाद मांगते हैं।


                      पूजन विधि संक्षेप में

 इस दिन द्वार के दोनों ओर गोबर से या हल्दी-चंदन से नाग की आकृति बनाई जाती है।

 नाग देव को दूध, धान का लावा (खील), पुष्प, दूर्वा और मिष्ठान अर्पित किया जाता है।

 इस दिन भूमि की खुदाई करना या हल चलाना वर्जित माना जाता है।

( लेखक राजू बाबू सिंह रिटायर्ड आईपीएस लखनऊ)