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वैदिक एवं उपनिषदिक परंपरा में गुरु की असीम महिमा: एक तात्त्विक विवेचन

 



वैदिक एवं उपनिषदिक परंपरा में गुरु की असीम महिमा: एक तात्त्विक विवेचन

भारतीय सनातन संस्कृति में गुरु केवल एक व्यक्ति या शिक्षक नहीं, बल्कि वह सर्वव्यापी चेतन तत्त्व हैं जो साधक को अज्ञान के अंधकार से निकालकर परम सत्य का साक्षात्कार कराते हैं। यदि हम वेदों, उपनिषदों और प्राचीन ऋषियों की दृष्टियों का अवलोकन करें, तो गुरु महिमा के ऐसे गूढ़ और अनुपम उदाहरण मिलते हैं जो इस पर्व की पवित्रता को और अधिक प्रगाढ़ कर देते हैं।




 १. वेदों में गुरु और शिष्य का पावन संबंध


वेदों में गुरु को ज्ञान रूपी सूर्य और शिष्य को उस प्रकाश को ग्रहण करने वाले पात्र के रूप में देखा गया है।


ऋग्वेद के अनुसार, ज्ञान की प्राप्ति केवल पुस्तकें पढ़ने से नहीं, बल्कि गुरु के मुख से निसृत वाणी को आत्मसात करने से होती है:


यज्ञेन वाचः पदवीयमायन् तामन्वविन्दन्नृषिषु प्रविष्टाम्।

(ऋग्वेद १०.७१.३)

अर्थ:ज्ञानी जनों ने यज्ञ (साधना) के माध्यम से वाणी और परम ज्ञान के मार्ग को प्राप्त किया और उस परम ज्ञान को ऋषियों (गुरुओं) के हृदय में स्थित पाया।


अथर्ववेद में 'ब्रह्मचर्य सूक्त'के अंतर्गत गुरु द्वारा शिष्य को अंगीकार करने की प्रक्रिया का बड़ा ही भावुक वर्णन आता है:


आचार्य उपनयमानो ब्रह्मचारिणं कृणुते गर्भमन्तः।

(अथर्ववेद ११.५.३)

 अर्थ: जब गुरु शिष्य को दीक्षा देता है (उसका उपनयन संस्कार करता है), तो वह शिष्य को अपने भीतर एक गर्भ की भांति धारण करता है। गुरु तीन रात्रियों तक उसे अपने तत्त्वज्ञान में संजोकर रखता है और जब शिष्य निष्णात होकर निकलता है, तब देवगण भी उसकी वंदना करते हैं। यह शिष्य का 'द्विज' (दूसरा जन्म) कहलाता है।


२. उपनिषदों में गुरु महिमा और गुरु-भक्ति


उपनिषदों का तो नाम ही गुरु-शिष्य परंपरा का परिचायक है। 'उपनिषद्' शब्द का शाब्दिक अर्थ ही है — 'उप' (समीप) + 'नि' (निष्ठापूर्वक) + 'षद्' (बैठना)। अर्थात गुरु के चरणों के समीप निष्ठापूर्वक बैठकर सत्य विद्या को ग्रहण करना।


 (क) श्वेताश्वतरोपनिषद् — गुरु भक्ति की पराकाष्ठा


उपनिषदों में स्पष्ट कहा गया है कि जब तक ईश्वर और गुरु दोनों में समान पराभक्ति न हो, तब तक शास्त्र ज्ञान का वास्तविक मर्म प्रकाशित नहीं होता।


यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ।

तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः॥

(श्वेताश्वतरोपनिषद् ६.२३)*

अर्थ: जिसकी परमेश्वर में जैसी अनन्य और उच्च भक्ति है, वैसी ही भक्ति यदि गुरुदेव में भी हो, तो ऐसे महात्मा के हृदय में ही उपनिषदों के कहे हुए गूढ़ अर्थ स्वतः प्रकाशित (साक्षात्कृत) हो जाते हैं।


(ख) मुण्डकोपनिषद् — गुरु की शरण में जाने का विधान


उपनिषद कहते हैं कि चाहे व्यक्ति कितना ही विद्वान क्यों न हो जाए, ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति के लिए उसे नम्र भाव से गुरु की शरण में जाना ही पड़ता है:


तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्॥ (मुण्डकोपनिषद् १.२.१२)*

अर्थ: उस परम सत्य (ब्रह्म) को जानने के लिए साधक को हाथ में समिधा (श्रद्धा व समर्पण का प्रतीक) लेकर ऐसे गुरु के चरणों में जाना चाहिए जो शास्त्रों का मर्मज्ञ ('श्रोत्रिय') और स्वयं ब्रह्म में स्थित ('ब्रह्मनिष्ठ')हो।                       

  (ग) कठोपनिषद् — नचिकेता और यम का संवाद


कठोपनिषद् में बालक नचिकेता और मृत्यु के देवता यमराज का प्रसंग गुरु-शिष्य परंपरा का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है। यमराज कहते हैं कि आत्मज्ञान इतना सूक्ष्म है कि यह बिना किसी समर्थ गुरु के उपदेश के समझा ही नहीं जा सकता।


उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत

क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति॥(कठोपनिषद् १.३.१४)

 अर्थ: उठो! जागो! और श्रेष्ठ गुरुओं के सानिध्य में जाकर उस परम ज्ञान को समझो। ज्ञानी जन कहते हैं कि उस सत्य का मार्ग छुरी की तेज धार पर चलने के समान अत्यंत कठिन और दुर्गम है, जिसे केवल एक समर्थ गुरु ही पार करा सकता है।

 ३. अज्ञान रूपी अंधकार का निवारण (अद्वैतारक उपनिषद्)

अद्वैतारक उपनिषद्* में गुरु शब्द का अत्यंत विशद और सुंदर विश्लेषण मिलता है:


गुकारस्त्वन्धकारः स्यात् रुकारस्तन्निरोधकः।

अन्धकारविनाशित्वात् गुरुरित्यभिधीयते॥

अर्थ:* 'गु' का अर्थ अंधकार (अज्ञान) है और 'रु' का अर्थ उसका निरोध (विनाश) करने वाला। जो अज्ञान के घने अंधकार को पूरी तरह नष्ट कर दे, वही वास्तविक अर्थों में 'गुरु' कहलाता है।

- ४. उपनिषदों की अमर गुरु-शिष्य परंपराएं

उपनिषदों का पन्ना-पन्ना गुरु और शिष्य के बीच के आत्मीय और ज्ञानवर्धक संवादों से भरा पड़ा है।


छांदोग्य उपनिषद् मे गुरु आरुणि और शिष्य श्वेतकेतु का संवाद, जहाँ गुरु ने अपने उपदेश द्वारा "तत्त्वमसि" (वह ब्रह्म तुम ही हो) का महावाक्य प्रदान किया।

बृहदारण्यक उपनिषद्: महर्षि याज्ञवल्क्य का अपनी विदुषी पत्नी व शिष्या मैत्रेयी को दिया गया अमर आत्मज्ञान।

प्रश्नोपनिषद्: महर्षि पिप्पलाद के आश्रम में छह ऋषियों का एक वर्ष तक तपस्या करके जीवन के सबसे गूढ़ प्रश्न पूछना। निष्कर्ष


वेदों से लेकर उपनिषदों तक, सम्पूर्ण सनातन साहित्य इस बात की गवाही देता है कि "न गुरोरधिकं तत्त्वं न गुरोरधिकं तपः" — अर्थात गुरु से बढ़कर न कोई तत्त्व है और न ही गुरु-सेवा से बढ़कर कोई तपस्या।


गुरु पूर्णिमा वास्तव में उसी वैदिक ऋषि-ऋण से उऋण होने का संकल्प दिवस है, जहाँ हम अपने गुरुजनों के चरणों में शीश नवाकर उनके द्वारा दिए गए ज्ञान, चरित्र और विवेक के प्रकाश में चलने का प्रण लेते हैं।

(लेखक राजू बाबू सिंह रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी है, जो लखनऊ मे रहते है )