मेडिकल की पढ़ाई मे EWS बना मजाक, प्राइवेट मेडिकल कॉलेज की फीस 25 लाख वार्षिक, कैसे भरे कोई छात्र, कोर्ट ने भी खड़े किये हाथ
प्राइवेट मेडिकल कॉलेज की हाई फीस से परेशान छात्र की याचिका पर SC का सुनवाई से इनकार, कहा- हमें डॉक्टर्स की जरूरत
मधुसूदन सिंह
नईदिल्ली।। EWS का आरक्षण अब धीरे धीरे उच्च तकनीकी शिक्षा या विश्वविद्यालय स्तर मे नौकरी के मामलों मे झुनझुना साबित होने लगा है। देश भर के विश्वविद्यालयों मे EWS कोटे की कई सौ प्रोफेसर की पोस्ट सरकार द्वारा बनाये गये अतार्किक नियमों के चलते खाली है, जो हर साल कम होने की जगह बढ़ती जा रही है। वैसे ही अब मेडिकल की पढ़ाई करने के इच्छुक EWS के छात्रों के साथ भी होने लगा है। नीट यूजी की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद EWS वर्ग के वही छात्र अब डॉक्टर बन सकते है जिनको सरकारी कॉलेज मिले। अगर उनको प्राइवेट मेडिकल कॉलेज मिला तो पढ़ना मुश्किल है। क्योंकि इनकी फीस ही 20 लाख से 25 लाख के बीच है। खुद सोचिये जिसके घर की सकल वार्षिक आय ही 8 लाख से कम है, वह छात्र 25 लाख की फीस कहां से भर पायेगा?
इसी परेशानी को राजस्थान के एक छात्र याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने राजस्थान में फीस स्ट्रक्चर का जिक्र करते हुए कहा कि यह 25 लाख रुपये तक है. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि छात्रों के पास छात्रवृत्ति का लाभ लेने का विकल्प उपलब्ध है। सूच्य हो कि छात्र वृत्ति भी सरकारी फीस के अनुसार ही मिलेगी।
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (24 जून, 2026) को राजस्थान के निजी चिकित्सा महाविद्यालयों में शुल्क बहुत ज्यादा होने का आरोप लगाने वाली एक याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए कहा कि हमें इस देश में चिकित्सकों की जरूरत है।
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच राजस्थान हाईकोर्ट के एक आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी। हाईकोर्ट ने एक मेडिकल अभ्यर्थी की ओर से दायर याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें दावा किया गया था कि राजस्थान के निजी चिकित्सा महाविद्यालयों में वार्षिक शुल्क 18.90 लाख रुपये से 25 लाख रुपये तक है, जो आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) की पात्रता के लिए निर्धारित आठ लाख रुपये की आय सीमा के बिल्कुल विपरीत और असंगत है।
सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह नहीं कहा जा सकता कि स्व-वित्तपोषित संस्थानों को सरकारी संस्थानों के बराबर ही शुल्क लेना चाहिए। बेंच ने कहा, 'कोई यह नहीं कह सकता कि निजी संस्थानों में शुल्क बहुत ज्यादा है और उसे सरकारी संस्थानों के बराबर कर दिया जाए।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने राजस्थान में शुल्क ढांचे का जिक्र करते हुए कहा कि यह 25 लाख रुपये तक है। बेंच ने कहा कि छात्रों के पास छात्रवृत्ति का लाभ लेने का विकल्प उपलब्ध है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने टिप्पणी की कि हमें इस देश में चिकित्सकों की जरूरत है।
बेंच ने कहा, 'हमें हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं दिखता,विशेष अनुमति याचिका खारिज की जाती है। अगर कानून से जुड़ा कोई सवाल है, तो उसपर आगे विचार किया जा सकता है.' याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में दलील दी थी कि शुल्क नियामक समिति का दायित्व है कि वह ऐसा शुल्क ढांचा तय करे जो तर्कसंगत, न्यायसंगत और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के अभ्यर्थियों की वित्तीय सीमाओं के अनुरूप हो।याचिका में कहा गया कि याचिकाकर्ता ने ईडब्ल्यूएस श्रेणी के तहत राष्ट्रीय पात्रता-सह-प्रवेश परीक्षा-स्नातक (नीट-यूजी) 2025 में हिस्सा लिया था।
EWS का प्रोफेसर बनना मुश्किल
इसी तरफ सरकार द्वारा बनाये गये अतार्किक नियमों के चलते EWS कोटे से प्रोफेसर बनने का रास्ता पूरी तरफ अवरुद्ध है। प्रोफेसर बनने के लिये किसी भी विश्वविद्यालय या महाविद्यालय मे कम से कम 10 साल सहायक आचार्य के रूप मे कार्य करने का अनुभव होना चाहिये। लेकिन जो अभ्यर्थी 10 वर्षो तक सहायक आचार्य की नौकरी कर लेता है, उसका वेतन 8 लाख प्रतिवर्ष से ज्यादे हो जाता है। जबकि EWS की सालाना आमदनी 8 लाख से कम होनी चाहिये। ऐसे मे कोई अभ्यर्थी किस तरह से आवेदन कर सके क्योंकि EWS की शर्त से उसकी आमदनी अधिक हो जाती है।






