भोजशाला प्रकरण में सुनवाई पूर्ण, निर्णय सुरक्षित - याचिकाकर्ता कुलदीप तिवारी ने न्यायालय पर जताया भरोसा
सत्य परेशान हो सकता है लेकिन पराजित नहीं - कुलदीप तिवारी
लखनऊ / इंदौर, 12 मई 2026।।धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला–कमाल मौला मस्जिद प्रकरण में माननीय इंदौर उच्च न्यायालय में चल रही विस्तृत सुनवाई आज पूर्ण हो गई। माननीय न्यायालय ने 6 अप्रैल से 12 मई तक निरंतर एवं धैर्यपूर्वक सभी पक्षों — याचिकाकर्ताओं, प्रतिवादियों, केंद्र एवं राज्य सरकार, तथा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) — की दलीलें, दस्तावेज़ एवं साक्ष्य सुने। आज सुनवाई पूर्ण होने के बाद न्यायालय ने अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया है।
इस ऐतिहासिक प्रकरण में प्रमुख याचिकाकर्ता एवं समाजसेवी कुलदीप तिवारी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। भोजशाला प्रकरण को न्यायालय तक ले जाने, ऐतिहासिक साक्ष्यों एवं अभिलेखों का संग्रह करने, विभिन्न पक्षों एवं याचिकाकर्ताओं को एक मंच पर संगठित करने तथा सम्पूर्ण कानूनी एवं वैचारिक रणनीति तैयार करने में उनका मुख्य योगदान रहा है।
लखनऊ निवासी कुलदीप तिवारी जन उद्घोष सेवा संस्थान के संस्थापक अध्यक्ष हैं। पेशे से लंबे समय तक शिक्षक रहे कुलदीप तिवारी वर्तमान में विधि व्यवसाय से जुड़े हुए हैं और धर्म एवं राष्ट्रहित से जुड़े विषयों पर सक्रिय रूप से कार्य कर रहे हैं। भोजशाला प्रकरण के अतिरिक्त वे वाराणसी स्थित ज्ञानवापी परिसर तथा मथुरा स्थित श्रीकृष्ण जन्मभूमि मामलों में भी प्रमुख याचिकाकर्ताओं में सम्मिलित हैं।
प्रेस को जारी वक्तव्य में कुलदीप तिवारी ने कहा कि भोजशाला केवल एक भवन का विवाद नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और ऐतिहासिक चेतना से जुड़ा विषय है। उन्होंने कहा कि न्यायालय में प्रस्तुत किए गए साक्ष्य यह स्पष्ट करते हैं कि भोजशाला मूलतः माँ वाग्देवी सरस्वती का प्राचीन मंदिर एवं शिक्षा केंद्र रहा है, जहाँ भारतीय परंपरा के अनुसार विद्या साधना होती थी।
न्यायालय में याचिकाकर्ता पक्ष द्वारा रखे गए प्रमुख तर्क
याचिकाकर्ता पक्ष की ओर से न्यायालय में अनेक ऐतिहासिक, पुरातात्विक एवं दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत किए गए, जिनमें प्रमुख रूप से निम्न बिंदु सम्मिलित रहे—
ASI सर्वेक्षणों एवं ऐतिहासिक अभिलेखों में भोजशाला परिसर में मंदिर स्थापत्य के अवशेष, स्तंभ, शिलालेख एवं देवी सरस्वती से संबंधित प्रतीकों का उल्लेख।
ब्रिटिशकालीन गजेटियर एवं इतिहासकारों के दस्तावेजों में भोजशाला को माँ सरस्वती के मंदिर एवं विद्या केंद्र के रूप में वर्णित किया जाना।
परिसर में पाई गई संस्कृत एवं प्राचीन नागरी लिपि की शिलालेखीय सामग्री।यह तर्क कि हिंदू समाज द्वारा लंबे समय से वहाँ वसंत पंचमी सहित विभिन्न अवसरों पर पूजा-अर्चना की परंपरा रही है।
याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि विवादित परिसर में अनेक संरचनात्मक तत्व इस्लामी स्थापत्य से पूर्व के हैं, जो मंदिर स्वरूप की ओर संकेत करते हैं।
समरांगण सूत्रधार ग्रंथ से मेल खाते प्रमाण
याचिकाकर्ता पक्ष की ओर से अधिवक्ता मनीष गुप्ता ने न्यायालय में महत्वपूर्ण तकनीकी एवं स्थापत्य संबंधी प्रमाण प्रस्तुत किए। उन्होंने बताया कि परमार राजा भोज द्वारा रचित प्रसिद्ध ग्रंथ समरांगण सूत्रधार में मंदिर निर्माण एवं स्थापत्य के जो मानक वर्णित हैं, भोजशाला की संरचना उनसे उल्लेखनीय रूप से मेल खाती है।
अधिवक्ता मनीष गुप्ता ने न्यायालय को अवगत कराया कि उक्त ग्रंथ में भोजशाला जैसे स्थापत्य की चौड़ाई और लंबाई का अनुपात 4:6 बताया गया है। ASI सर्वे रिपोर्ट के अनुसार भोजशाला की चौड़ाई 38.41 मीटर तथा लंबाई 57.45 मीटर दर्ज की गई है, जो लगभग उसी अनुपात के अनुरूप है।
याचिकाकर्ता पक्ष ने यह भी कहा कि परिसर में पाए गए हवन कुंड की माप एवं संरचना भी समरांगण सूत्रधार में वर्णित स्थापत्य नियमों के अनुरूप है, जो इस स्थल के वैदिक एवं मंदिर स्वरूप होने की पुष्टि करता है।
सर्पबंदी शिलालेखों का उल्लेख
अधिवक्ता मनीष गुप्ता ने न्यायालय में यह तर्क भी रखा कि भोजशाला परिसर के भीतर प्राप्त “सर्पबंदी” शैली के शिलालेख एवं अलंकरण परमारकालीन अन्य मंदिरों में प्राप्त संरचनात्मक एवं कलात्मक तत्वों से मेल खाते हैं। याचिकाकर्ता पक्ष के अनुसार यह समानता इस बात का महत्वपूर्ण संकेत है कि भोजशाला का मूल स्वरूप हिंदू मंदिर स्थापत्य पर आधारित था।
विपक्ष (मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी) एवं अन्य पक्षों की प्रमुख दलीलें
विपक्ष की ओर से यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि परिसर लंबे समय से मुस्लिम समुदाय द्वारा कमाल मौला मस्जिद के रूप में उपयोग में रहा है तथा वर्तमान व्यवस्था सामाजिक संतुलन बनाए रखने हेतु स्थापित की गई थी। कुछ पक्षों ने यह भी कहा कि ऐतिहासिक दस्तावेजों की व्याख्या को लेकर मतभेद संभव हैं तथा वर्तमान धार्मिक व्यवस्था में परिवर्तन से सामाजिक तनाव उत्पन्न हो सकता है।
केंद्र एवं राज्य सरकार तथा ASI की ओर से न्यायालय में विभिन्न सर्वेक्षण रिपोर्ट, प्रशासनिक अभिलेख एवं स्थिति संबंधी तथ्य प्रस्तुत किए गए। ASI ने अपने संरक्षण संबंधी दायित्वों एवं उपलब्ध पुरातात्विक तथ्यों के आधार पर न्यायालय को अवगत कराया।
धर्म और मंदिरों को लेकर कुलदीप तिवारी के संघर्ष
धर्म एवं राष्ट्रहित से जुड़े मुद्दों पर सक्रियता के कारण कुलदीप तिवारी को अपने अध्यापक पद से भी हटना पड़ा था। उस समय इस विषय को लेकर व्यापक विवाद हुआ था तथा विभिन्न सामाजिक संगठनों एवं नागरिकों ने उनके समर्थन में आंदोलन भी किए थे। इसके बावजूद उन्होंने अपने वैचारिक एवं सांस्कृतिक संघर्ष को जारी रखा।
कुलदीप तिवारी से वार्ता पर उन्होंने कहा कि उन्हें भारतीय न्यायपालिका पर पूर्ण विश्वास है और सकल हिन्दू समाज यह विश्वास करता है कि न्यायालय ऐतिहासिक तथ्यों एवं न्यायसंगत आधारों पर निर्णय देगा। और जीत हमारी ही होगी। उन्होंने भोजशाला आंदोलन से जुड़े सभी संत-महात्माओं, अधिवक्ताओं, इतिहासकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं समर्थकों का आभार व्यक्त किया।











