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दतिया का गुप्त साधक :जाने क्या है मां धूमवती का सत्य,सत्य ही सबसे बड़ा खजाना

 




दतिया मध्यप्रदेश।। ​दतिया की सर्द रात थी। पीताम्बरा पीठ के मंदिर की घंटियां शांत हो चुकी थीं, लेकिन वातावरण में एक अजीब सी ऊर्जा व्याप्त थी। शहर के एक पुराने मोहल्ले में रहने वाले नरेन्द्र, जो पेशे से एक पत्रकार थे, एक ऐसे रहस्य को सुलझाने की कोशिश कर रहे थे जिसके बारे में उन्होंने केवल सुना था।

​नरेन्द्र ने सुना था कि राजसत्ता और न्याय की देवी माँ बगलामुखी के दरबार में हर रात एक 'अदृश्य साधक' आता है, जो मंदिर के कपाट बंद होने के बाद भी माँ के दर्शन करता है।

​                     आधी रात का रहस्य

​एक शनिवार की रात, नरेन्द्र छिपकर मंदिर के पिछले हिस्से में बैठ गए। रात के ठीक 2 बजे, जब पूरा दतिया गहरी नींद में था, उन्होंने देखा कि एक बूढ़ा व्यक्ति, जिसके कंधे पर एक पुराना झोला था और माथे पर पीला तिलक, मंदिर के बंद द्वार की ओर बढ़ रहा था।

​नरेन्द्र ने उसका पीछा किया। वह व्यक्ति मंदिर की सीढ़ियों पर बैठा और एक पुरानी पोथी निकालने लगा। जैसे ही उस व्यक्ति ने मंत्रों का जाप शुरू किया, पूरे परिसर में एक सुनहरी चमक फैल गई।

​               धूमवती माता और धुएं का रहस्य

​नरेन्द्र अपनी जिज्ञासा रोक नहीं पाए और उस व्यक्ति के पास जाकर बोले, "बाबा, कपाट तो बंद हैं, आप यहाँ किससे बात कर रहे हैं?"

​वृद्ध ने मुस्कुराते हुए नरेन्द्र की ओर देखा और उन्हें अपने साथ ऊपर माँ धूमवती के मंदिर की ओर ले गए। अचानक हवा में धुएं की एक परत छा गई। वृद्ध ने गंभीर स्वर में कहा, "नरेन्द्र, दुनिया केवल बगलामुखी की सत्ता और विजय देखना चाहती है, लेकिन माँ धूमवती वह सत्य हैं जो हमें बताती हैं कि अंत में सब कुछ धुएं की तरह उड़ जाना है। अहंकार का त्याग ही असली जीत है।"

​नरेन्द्र ने देखा कि उस धुएं के बीच दूर दतिया का सातखंडा महल (किला) चमक रहा था। वृद्ध ने किले की ओर इशारा करते हुए कहा, "इस किले की दीवारों में कितने ही राजाओं के अहंकार दफन हैं। नरेन्द्र, तुम अपनी लेखनी से क्या मांगना चाहते हो? प्रसिद्धि या सत्य?"

​                         अंतिम साक्षात्कार

​अचानक धुएं का एक तेज झोंका आया। जब नरेन्द्र ने आँखें मलीं, तो सामने कोई नहीं था। मंदिर का द्वार बंद था और चारों ओर शांति थी।

​अगली सुबह, जब नरेन्द्र सोकर उठे, तो उन्हें अपनी मेज पर एक पीला कनेर का फूल और एक पर्चा मिला। उस पर लिखा था:

"नरेन्द्र, कलम की ताकत सत्ता की गुलामी के लिए नहीं, सत्य की रक्षा के लिए है।"

​नरेन्द्र समझ गए कि वह वृद्ध कोई साधारण मनुष्य नहीं, बल्कि स्वयं काल और शक्ति का कोई संदेशवाहक था। उस दिन के बाद नरेन्द्र की लेखनी बदल गई। वे अब केवल समाचार नहीं, बल्कि समाज का 'सत्य' लिखने लगे

​अगले दिन, नरेन्द्र अपनी नई डायरी लेकर दतिया के विशाल सातखंडा महल की ओर निकल पड़े। इस महल के बारे में मशहूर है कि राजा वीर सिंह देव ने इसे मुगल सम्राट जहांगीर के स्वागत के लिए बनाया था, लेकिन यहाँ के सात तलों में से कुछ तल जमीन के नीचे दफन हैं, जहाँ आज भी कोई नहीं जाता।

​महल के मुख्य द्वार पर नरेन्द्र की मुलाकात एक अजनबी से हुई। कोट-पेंट पहने, आंखों पर चश्मा लगाए वह व्यक्ति काफी परेशान दिख रहा था। नरेन्द्र ने उससे बातचीत शुरू की तो पता चला कि उसका नाम विक्रम है और वह एक पुरातत्वविद् (Archaeologist) है।

​विक्रम ने धीरे से कहा, "नरेन्द्र जी, मैं यहाँ पत्थरों को नहीं, बल्कि उस 'गुप्त मंत्र' को ढूंढने आया हूँ जिसके बारे में कहा जाता है कि उसे सिद्ध करने के बाद इस महल की दीवारों के पीछे छिपा खजाना मिल सकता है।"

​                     रहस्यमयी तलघर

​नरेन्द्र को रात वाले वृद्ध की बात याद आई, लेकिन उन्होंने विक्रम के साथ महल के नीचे वाले हिस्सों में जाने का फैसला किया। जैसे-जैसे वे नीचे उतरे, हवा भारी होने लगी। दीवारों पर अजीब सी आकृतियां बनी थीं।

​अचानक, एक गुप्त गलियारे के अंत में उन्हें वही वृद्ध व्यक्ति बैठा दिखाई दिया! वही पीला तिलक और वही दिव्य चमक। विक्रम चिल्लाया, "यही वह आदमी है जिसके पास उस गुप्त नक्शे का आधा हिस्सा है!"

​वृद्ध ने नरेन्द्र की ओर देखा और मुस्कुराते हुए कहा, "नरेन्द्र, मैंने कहा था न कि लोग यहाँ 'सत्ता' और 'खजाना' ढूंढने आते हैं। विक्रम को सोना चाहिए, लेकिन क्या इसे पता है कि इस सोने की कीमत क्या है?"

​                       असली खजाना

​वृद्ध ने हवा में अपना हाथ घुमाया और अचानक एक पत्थर की दीवार पारदर्शी हो गई। वहां कोई सोने की ईंटें नहीं थीं, बल्कि हजारों प्राचीन पांडुलिपियां (Manuscripts) और धर्म ग्रंथ रखे थे।

​वृद्ध बोला, "यही है दतिया का असली खजाना—ज्ञान। जिस राजा ने इन ग्रंथों को समझा, उसका राज अमर हो गया, और जिसने केवल सोने को चाहा, वह इसी महल की धूल में मिल गया।"

​विक्रम लालच में आगे बढ़ा, लेकिन जैसे ही उसने एक ग्रंथ को छूना चाहा, वह ग्रंथ धुएं में बदल गया। वृद्ध ने नरेन्द्र से कहा, "नरेन्द्र, तुम पत्रकार हो। दुनिया को बताओ कि खजाना तिजोरियों में नहीं, हमारी संस्कृति और ज्ञान में छिपा है। अगर कलम डगमगाई, तो यह ज्ञान हमेशा के लिए विलुप्त हो जाएगा।"

​                  अंत और नई शुरुआत

​एक पल के लिए वहां तेज रोशनी हुई और जब नरेन्द्र की आंखें खुलीं, तो वे महल की छत पर अकेले खड़े थे। विक्रम नीचे पागलों की तरह पत्थरों को टटोल रहा था, लेकिन नरेन्द्र के हाथ में एक पुरानी कलम थी जो सोने की तरह चमक रही थी।

​नरेन्द्र समझ गए कि पीताम्बरा माई की इस नगरी में हर व्यक्ति को वही मिलता है जिसकी वह पात्रता रखता है। उन्होंने महल की दीवार पर अपनी नई कलम से पहला वाक्य लिखा:

               "सत्य ही सबसे बड़ा खजाना है।"

​दतिया के इस सफर ने नरेन्द्र को एक साधारण पत्रकार से एक 'सत्य का खोजी' बना दिया था।

महल से निकलने के बाद नरेन्द्र के मन में एक ही सवाल कौंध रहा था— "वह वृद्ध बार-बार गायब क्यों हो जाता है? और उसका माई से क्या संबंध है?"

​उस रात नरेन्द्र को नींद नहीं आई। वे फिर से पीताम्बरा पीठ पहुँचे। रात के सन्नाटे में मंदिर का वातावरण और भी गहरा हो गया था। तभी उन्होंने देखा कि विक्रम (पुरातत्वविद्), जो महल में खजाना ढूंढ रहा था, बदहवास हालत में मंदिर के मुख्य द्वार पर गिरा हुआ है।

​विक्रम का चेहरा पीला पड़ चुका था। वह चिल्ला रहा था, "वह औरत... वह पीली साड़ी वाली औरत... वह हर जगह है!"

​                       गर्भगृह का दृश्य

​नरेन्द्र ने विक्रम को संभाला और जैसे ही मंदिर के गर्भगृह की ओर देखा, उनके रोंगटे खड़े हो गए। मंदिर के कपाट बंद थे, लेकिन भीतर से एक ऐसी दिव्य रोशनी छनकर बाहर आ रही थी जैसे सौ सूरज एक साथ उग आए हों।

​अचानक, वही वृद्ध व्यक्ति जिसे नरेन्द्र ने महल में देखा था, मंदिर के भीतर से बाहर निकला। लेकिन इस बार उसके हाथ में वह पुरानी पोथी नहीं, बल्कि एक 'मुद्गर' (गदा) जैसा छोटा शस्त्र था।

​वृद्ध ने नरेन्द्र की ओर देखकर कहा, "नरेन्द्र, तुमने पूछा था न कि मैं कौन हूँ? मैं इस नगरी का रक्षक हूँ। माँ बगलामुखी का यह दरबार केवल प्रार्थना के लिए नहीं, न्याय के लिए है। जो यहाँ कपट लेकर आता है, माँ उसका 'स्तम्भन' (जड़ कर देना) कर देती हैं।"

                        ​स्तम्भन का चमत्कार

​तभी एक अद्भुत घटना घटी। विक्रम, जो भागने की कोशिश कर रहा था, अचानक एक पत्थर की मूर्ति की तरह वहीं जम गया। वह न हिल पा रहा था, न बोल पा रहा था।

​वृद्ध ने नरेन्द्र को एक विशेष स्थान पर खड़े होने को कहा जहाँ से माँ की प्रतिमा का एक कोना दिखाई दे रहा था। वृद्ध बोला, "नरेन्द्र, ध्यान से देखो। माँ बगलामुखी के एक हाथ में शत्रु की जीभ है और दूसरे में गदा। वह केवल शत्रुओं का नाश नहीं करतीं, वह इंसान के भीतर के लालच और झूठ की जीभ भी खींच लेती हैं।"

​नरेन्द्र ने देखा कि माँ की प्रतिमा से एक हल्की सी मुस्कान उभरी और पूरी नगरी में एक गूँज सुनाई दी— "ॐ ह्लीं बगलामुख्यै नमः"।

​              सत्य का उदय

​अचानक एक तेज हवा चली और नरेन्द्र की आँख लग गई। जब सुबह मंगला आरती की घंटी बजी, तो नरेन्द्र ने खुद को मंदिर के चबूतरे पर सोया हुआ पाया। उनके पास विक्रम नाम का कोई व्यक्ति नहीं था, लेकिन मंदिर की उस दीवार पर, जहाँ विक्रम खड़ा था, पीले रंग का एक निशान बना हुआ था।

​नरेन्द्र ने पुजारी जी से पूछा, "महाराज, क्या रात में यहाँ कोई आया था?"

​पुजारी जी ने रहस्यमयी ढंग से मुस्कुराते हुए कहा, "नरेन्द्र जी, यहाँ रोज़ हज़ारों आते हैं, पर माई जिसे चाहती हैं, उसे ही अपना 'न्याय स्वरूप' दिखाती हैं। सुना है कल रात किसी ने महल में खजाना चोरी करने की कोशिश की थी, वह आज सुबह शहर की सीमा पर बेहोश मिला है और अपनी ज़ुबान से एक शब्द नहीं बोल पा रहा।"

​नरेन्द्र कांप गए। उन्हें समझ आ गया कि वह वृद्ध कोई और नहीं, बल्कि माँ का ही कोई 'गण' था जो उनकी परीक्षा ले रहा था।

निष्कर्ष

​नरेन्द्र ने अपनी डायरी निकाली और आखिरी पन्ना लिखा:

​"दतिया वह स्थान है जहाँ कानून इंसान का नहीं, साक्षात् माँ पीताम्बरा का चलता है। यहाँ खजाना खोजने वाले खाली हाथ जाते हैं, और सत्य खोजने वाले 'सिद्ध' होकर लौटते हैं।"

बोलो पीतांबरा माई की जय

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