नारायण सिंह स्मृति सम्मान" से डुमरांव में सम्मानित होंगे डॉ. शैलेश
संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किए बगैर भोजपुरी में उत्कृष्ट साहित्य और शोध की कल्पना असंभव : डॉ शैलेश
पूर, बलिया।। क्षेत्र के गढ़मलपुर सहुलाई निवासी रामनरेश सिंह एजुकेशनल फाउंडेशन के महासचिव, डी.बी. कॉलेज जयनगर के वाणिज्य विभागाध्यक्ष डॉ. शैलेश कुमार सिंह शौर्य को डुमरांव साहित्य महोत्सव सह राष्ट्रीय साहित्य सम्मेलन में प्रख्यात साहित्यकार नारायण सिंह की स्मृति में "नारायण सिंह स्मृति सम्मान" से सम्मानित किया जाएगा। यह संगोष्ठी 30 दिसंबर, 2025 को भोजपुरी सरधा मंच (राष्ट्रीय), बिहार इकाई, साहित्योदय धनबाद और समाजसेवी संगठन डुमरांव के द्वारा "नारी चेतना में लोक साहित्य की भूमिका" विषय पर आयोजित की जा रही है।
विद्वत है कि डॉ. शैलेश सिंह सम्मेलन के भोजपुरी परिसंवाद सत्र में "समग्र विकास की ओर भोजपुरी" पर अपने विचार भी प्रस्तुत करेंगे, इस अवसर पर उन्होंने कहा कि पूरे विश्व में 22 करोड़ से अधिक भोजपुरी बोलने वाले लोग हैं। लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत में भोजपुरी को अभी तक संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं किया गया है। उन्होंने केंद्र और राज्य सरकारों से आग्रह किया कि भोजपुरी को इसका संवैधानिक अधिकार दिया जाए, ताकि भोजपुरी साहित्य और शोध को प्रोत्साहन मिल सके और क्षेत्रीय भाषा की पहचान को मजबूत किया जा सके।
इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि आई पी एस आनंद मिश्रा (विधायक, बक्सर सदर), वरिष्ठ साहित्यकार रामबहादुर राय, प्रखर वक्ता नंद कुमार तिवारी होंगे, जबकि कार्यक्रम की अध्यक्षता भोजपुरी साहित्य के प्रमुख हस्ताक्षर शशिकांत ओझा जी करेंगे।
संगोष्ठी में भारत के विभिन्न राज्यों उत्तर प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़ के प्रमुख साहित्यकार, शिक्षाविद और शोधकर्ता भाग लेंगे। जिनमें पूर्व कुलपति प्रो. एच. के. सिंह (वाराणसी), डॉ. जमील हसन अंसारी (दरभंगा), उत्तर प्रदेश से रामबहादुर राय, लोक गायिका ममता चौबे, डिम्पल राय, युवा गायिका राय वैष्णवी, (बलिया), सिवान से सुरभि शिवानी, झारखंड से संजय सिंह चंदन शामिल होंगे।
मंच के राष्ट्रीय महासचिव संतोष ओझा प्रभाकर व प्रदेश अध्यक्ष गुड्डू गुलशन यदुवंशी ने बताया कि, कार्यक्रम में साहित्य के उत्थान, भोजपुरी भाषा को संवैधानिक अधिकार, नारी विमर्श और उच्च शिक्षा में शोध पर चर्चा की जाएगी। यह सम्मेलन भोजपुरी भाषा के उत्थान और उसे संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने के लिए एक महत्वपूर्ण मंच साबित होगी, और साथ ही भारतीय लोक साहित्य में नारी चेतना के स्वर को भी उद्घाटित करेगी।



