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......तो क्या बिहार मे बीजेपी बनेगी विपक्षी पार्टी ?क्या चल गया युवाओं पर तेजस्वी का जादू?

 



......तो क्या बिहार मे बीजेपी बनेगी विपक्षी पार्टी ?क्या चल गया युवाओं पर तेजस्वी का जादू?

मधुसूदन सिंह 

लखनऊ /पटना।। बिहार मे विधानसभा का चुनाव सम्पन्न हो गया है और अब 14 नवंबर के दिन का इंतजार हो रहा है जब इस चुनाव का परिणाम घोषित होगा। वैसे मतदान के बाद जो बड़े चैनलों के चुनावी एग्जिट पोल आये है उनके द्वारा तो पहले ही एनडीए की सरकार बनवा दी गयी है। लेकिन क्या ये सही होते है? क्या ये शेयर मार्किट से जुड़े होते है? इस पर भी चर्चा जरुरी है। साथ ही इनकी भविष्यवाणियों से कितने लाख करोड़ रूपये शेयर मार्किट मे डूब जाते है, यह अंदाजा है आप सबको? इन सवालों का भी जबाब जब तक नही ढूंढा जायेगा, तब तक इनकी भविष्यवाणियों की हकीकत से पर्दा नही उठ सकता है।

सबसे पहले यह जानने का प्रयास करते है कि बीजेपी क्यों विपक्ष मे बैठ सकती है? इसका जबाब ढूंढने के लिये आपको पहले चरण व दूसरे चरण के मतदान के पूर्व की जनसभाओं मे जेडीयू से गठबंधन होने के वावजूद बीजेपी के बड़े नेताओं का बिना जेडीयू के शीर्ष नेताओं को साथ लिये चुनाव प्रचार से देखा जा सकता है। बीजेपी के लिये बिहार एक ऐसा राज्य आज भी है जहां बीजेपी अपने दम पर सरकार बनाने की हैसियत मे आज तक नही आ पायी है। पिछले 11 सालों से केंद्र मे बीजेपी की सरकार व मोदी जी का करिश्माई नेतृत्व होने के वावजूद बिहार इनकी पहुंच से कोसों दूर है। आज भी यहां जो जनाधार जेडीयू व राजद के पास है, वह बीजेपी के पास नही है।

बिहार एक कार्मिक प्रदेश है। यहां के लोग कार्मिक होते है। ये लोग काम करने मे विश्वास रखते है। ये लोग अब सब्ज बाग देखते देखते उब गये। यहां का युवा वर्ग दूसरे प्रदेशों मे हो रहे औद्योगिक करण को भी देख रहा है और बिहार के पिछड़ेपन को भी देख कर तुलना कर रहा है। साथ ही मोदी जी के उस वादे को भी याद कर रहा है जब कहे थे कि बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देकर इसका विकास करेंगे। विकास के लिये विशेष राज्य का दर्जा तो पिछले 11 सालों मे नही मिला, लेकिन पीएम मोदी व गृहमंत्री अमित शाह के ही शब्दों मे घुसपैठियों का दंश जरूर लग गया। अब इन से बिहार की जनता सवाल कर रही है कि जब केंद्र व राज्य दोनों मे बीजेपी व बीजेपी के सहयोगी सरकार थी तो घुसपैठियें आ कैसे गये? पहले चरण के चुनाव मे जब घुसपैठियों के सहारे समर्थन मिलता नही दिखा तो पीएम मोदी ने जंगलराज व कट्टा जैसे शब्दों का प्रयोग करके नौजवानों को डरा कर राजद से दूर करने का पूरा प्रयास किया है। वही यूपी के सीएम योगी जी ने पूरी ताकत के साथ हिन्दू मुस्लिम का ध्रुवीकरण करने का पूरा प्रयास किया है।

तेजस्वी यादव के द्वारा हर घर मे एक सरकारी नौकरी देने के वादे ने नौजवानों को अपनी तरफ निश्चित रूप  वोट देने के लिये आकर्षित किया है। इसके साथ महिला मतदाताओं मे से शिक्षित व बेरोजगार युवतियों का मतदान भी इस बार नौकरी के नाम पर तेजस्वी को मिलता हुआ दिखा है।पिछले चुनाव मे तेजस्वी यादव इस लिये हार गये थे कि वो बीजेपी के नेताओं के आरोपों का जबाब देते रह गये और अपनी बात सही ढंग से प्रस्तुत ही नही कर पाये। लेकिन इस बार तेजस्वी ने अपनी पिछली गलतियों से सबक लेकर सिर्फ नौकरी, स्वास्थ्य, शिक्षा देने जैसे अपने वादे को ही बताते रहे। चाहे पीएम मोदी जी कट्टा, जंगलराज जैसे शब्दों का प्रयोग किये है या अमित शाह घुसपैठियों का मुद्दा उठाये हो।

पीएम मोदी ने जबरदस्त तरीके से जंगलराज और कट्टा जैसे शब्दों का प्रयोग करके युवा मतदाताओं को लुभाने का प्रयास किये। लेकिन यह भी ध्यान देना जरुरी है कि जंगलराज को जो लोग वापस नही आने देना चाहते है, वो सबसे ज्यादे सामान्य वर्ग के मतदाता तो पहले से ही बीजेपी के साथ है। ऐसे मे मोदी जी का जंगलराज का दांव फेल होता हुआ दिखायी दे रहा है। कट्टा शब्द का प्रयोग युवा मतदाताओं को आकर्षित करने के लिये किया गया, जो तेजस्वी के नौकरी देने के वादे के आगे फुस्स होता दिख रहा है। क्योंकि मोदी जी पिछले 11 सालों से 1 करोड़ प्रति वर्ष नौकरी देने के वादे को पूरा ही नही किये है। जबकि तेजस्वी ने अपने डेढ़ साल के कार्यकाल मे जो लाखों नौजवानों को नौकरी दिये है, वह मोदी की गारंटी पर भारी पड़ गया है।

एनडीए को अगर विकास पर भरोसा होता तो नीतीश कुमार लगभग 1 करोड़ महिलाओं के खातों मे 10 हजार की रकम न भेजते। लेकिन यह दांव भी इस लिये फेल होता दिख रहा है क्योंकि लगभग 2 करोड़ महिलाओं को यह नही मिला है, जो निश्चित रूप से नीतीश सरकार के खिलाफ मतदान की है। इसके साथ ही दलित मतदाताओं मे तेजस्वी की मुख्यमंत्री के रूप मे छवि सबसे ज्यादे है जबकि दूसरे नंबर पर नीतीश कुमार नही चिराग पासवान की है। ऐसे मे जो बीजेपी दलित मतदाताओं मे अपनी पैठ बताती है, वह गलत साबित होती दिख रही है। SIR ने महागठबंधन को नही बल्कि एनडीए को ही नुकसान पहुँचाया है। जो महिलाये नीतीश कुमार को वोट देती थी, SIR ने जितने मतदाताओं के नाम कांटे है उनमे से 60 प्रतिशत महिलाओं का नाम शामिल है।

                    ओवैसी फैक्टर हुआ फेल 

पिछले विधानसभा 2020 चुनाव मे ओवैसी की एंट्री ने मुस्लिम मतदाताओं मे उहापौह की स्थिति पैदा हो गयी थी, जिसके कारण पूरे बिहार मे राजद को नुकसान हो गया। लेकिन इस बार सीमांचल से मुस्लिम मतदाताओं ने जो समर्थन राजद को देकर ओवैसी को ख़ारिज किया है, वह पूरे बिहार मे महागठबंधन को मजबूत किया है। इस बार ओवैसी के दल को एक भी सीट नही मिल रही है जबकि पिछली बार 5 सीट मिली थी। सीमांचल की कुल 24 सीटों मे NDA को 12 सीट मिली थी, इस बार मात्र 8 सीट ही मिलने का अंदेशा है।जबकि इस बार महागठबंधन 7 सीट से 15 सीट हासिल करता हुआ दिख रहा है।

            हिन्दू मुस्लिम कार्ड से NDA को ही नुकसान 

 पीएम मोदी क़ानून व्यवस्था के नाम पर जंगलराज की कहानी बार बार अपने भाषणों मे बता कर यह अघोषित रूप से यह दर्शा रहे थे कि अबकी बार तेजस्वी सरकार की सम्भावना बन रही है। यही कारण था कि वो लोगों से इस बार जंगलराज को रोकने की अपील हर जनसभाओ मे करते हुए दिखे थे। कट्टे का जिक्र करके यह दर्शा रहे थे कि तेजस्वी की सरकार बनी तो नौजवान खतरें मे पड़ जायेंगे। लेकिन मोदी जी यह भूल गये कि जंगलराज मे जो तबका (सामान्य वर्ग ) सबसे ज्यादे प्रभावित था, वह पहले से ही बीजेपी के साथ है और जो तबका तेजस्वी को समर्थन दे रहा है, वह लालू समर्थक है, न कि बीजेपी।

उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी को हिन्दू मुस्लिम ध्रुवी करण के मोर्चे पर लगाया गया था। योगी जी हिन्दुओं को एकजुट करने के चक्कर मे जेडीयू के मुस्लिम समर्थकों को राजद की तरफ करते हुए दिख रहे है। जो मुसलमान नीतीश कुमार को समर्थन देते है, वह भी इस ध्रुवी करण के खेल मे मन न होते हुए भी महागठबंधन को मतदान करते हुए दिखे है। 

बीजेपी को हो रहा है बड़ा नुकसान 

बिहार के इस चुनाव मे अगर NDA की सरकार बनती भी है तो वह नीतीश कुमार के कारण बनेगी, बीजेपी को इस चुनाव मे पीएम मोदी जैसे करिश्माई नेता, राजनीति का चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह की चालों के बाद भी पिछले चुनाव से कम सीटे जीतने जा रही है।

बीजेपी की यह दुर्गति नीतीश कुमार को अलग छोड़कर अति आत्मविश्वास मे चुनावी जन सभाओ को करने से हो रही है। महागठबंधन ने इसको भी मुद्दा बनाकर जो प्रचार किया था, उससे नीतीश समर्थको को लगा कि बीजेपी इस बार इनको सीएम नही बनाएगी और वो खुलकर बीजेपी को मतदान नही किये। पूरे चुनावी अभियान मे बीजेपी ने एक बार भी नही कहा कि नीतीश कुमार हमारे अगले मुख्यमंत्री होंगे।

राजद सबसे बड़ी पार्टी, बीजेपी तीसरे नंबर पर 

विभिन्न एजेंसीज के द्वारा कराये गये सर्वेक्षणों पर अगर नजर डाले तो राजद सबसे बड़े दल के रूप मे उभरा है जबकि नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू दूसरे और बीजेपी तीसरे नंबर की पार्टी बन रही है। अपने निर्माण के बाद से आजतक बीजेपी के पास ऐसा कोई भी चेहरा ऐसा नही पैदा हुआ जिसके दम पर बीजेपी अकेले चुनाव मे उतर सके। जो नेता है वो बढ़ बोले है और उनका जनाधार इतना है कि अगर मोदी जी का नाम हटा दिया जाय तो विधानसभा छोड़ियों पंचायत का भी चुनाव न जीत सकते है। वही नवी पास तेजस्वी यादव ने अपनी छवि को जनता के बीच मे ऐसी बना ली है कि उसको हराने के लिये पीएम मोदी व अमित शाह को छोड़िये पूरे देश के कई प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों को चुनाव मे प्रचार के लिये उतरना पड़ा है।

आखिर नीतीश कुमार महिलाओं को 10 हजार देने को क्यों हुए मजबूर 

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हमेशा मुफ्तखोरी के खिलाफ रहे है। नीतीश जी मुफ्त मे बिजली देने को छोड़िये, कोरोना काल मे गुजरात, महाराष्ट्र आदि जगहों पर फंसे मजदूरों मुफ्त मे ट्रेन व बस से वापस लाने के भी खिलाफ थे और सार्वजनिक रूप से कह भी चुके थे। लेकिन इस बार क्या मजबूरी थी कि चुनावी समर की घोषणा से ऐन पहले 1 करोड़ महिलाओं के खातों मे दस दस हजार रूपये डाल दिये। यह दर्शाता है कि चाहे नीतीश जी हो या बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व यह पहले ही भांप चुका था कि इस बार तेजस्वी लहर है और इस लहर से सिर्फ भाषणों से नही पार पाया जा सकता है। NDA के नेताओं के भाषणों मे अपने सुना क्या कि हमने बिहार के विकास के लिये इतने उद्योग लगाये, स्वास्थ्य सुविधाएं दी, शैक्षणिक माहौल बनाकर यहां के युवाओं के पलायन को रोका, इतनी नौकरिया दी। अगर उपरोक्त सवालों पर आप चुप्पी साधे है और विपक्ष इसी को हथियार बनाये हुए है तो युवाओ का वोट आपको कैसे मिलेगा।