संगिनियों के सहारे , आशा बेचारी : 3150 में लगभग 2800 नही है किसी संगठन में
मधुसूदन सिंह
बलिया ।। राजनीति जिस जनपद का व्यवसाय हो,राजनैतिक चेतना के लिये जो जनपद देशभर में ख्यातिप्राप्त हो, उस जनपद में 3150 आशाओं में से लगभग 2800 आशाओं का कोई न संगठन है,न रहनुमा , यह जनपद के राजनैतिक रूप से जागरूक होने के इतिहास पर एक दाग कहा जा सकता है । इतनी संख्या में आशाओं के किसी भी संगठन में न रहने के बावजूद ये बेचारियां धरना प्रदर्शन में भीड़ जुटाने में भेड़ बकरियों की तरह आ जाती है । हद तो तब और है जब इनकी रहनुमाई का दम्भ भरने वाले दो संगठन है लेकिन दोनों की जिला अध्यक्ष कोई आशा नही ,बल्कि संगिनी है । 3150 की संख्या वाली आशाओं में एक भी नेता नही है जो अपने हक की बात करे,कितना हास्यास्पद है कि जो इनके साथ पक्षपात करती है,वही इनकी लड़ाई लड़ने के लिये अगुवा बनती है ,जबकि पूरे जनपद में संगिनियों की कुल संख्या मात्र 129 है ।
बता दे कि जनपद में आशाओं का दो संगठन कार्यरत है जिसमे एक पूनम पांडेय(संगिनी) जिलाध्यक्ष जनपद स्तरीय मान्यता प्राप्त स्वास्थ्य कार्यकर्ती (आशा )संघ और दूसरा आशा कर्मचारी यूनियन उत्तर प्रदेश जिसकी जिलाध्यक्ष संगीता सिंह(संगिनी) है ।यही नही इसी संगठन में मिथिलेश शर्मा व बबिता भारद्वाज (दोनो संगिनी)संयुक्त मंत्री व ममता व पूनम गुप्ता (दोनो संगिनी)कार्यकारिणी की सदस्य है । सूत्रों की माने तो पूनम पांडेय के नेतृत्व वाले संगठन में लगभग 150 व संगीता सिंह के नेतृत्व वाले दूसरे संगठन में लगभग 250 सदस्य है । यह संख्या तब है जब आशाओं के साथ संगिनियों को भी जोड़ा गया है । यही नही ये लोग जिस भी ब्लॉक/सीएचसी/पीएचसी पर संगठन बनाये है वहां की भी सभी को सदस्य नही बनाये है । जैसे पंदह में कुल 172 आशाएं है जिसमे से राज्यस्तरीय वाले संगठन ने मात्र 49 को ,रतसर में कुल संख्या 151, सदस्य है 60, कोटवा में कुल संख्या 188 ,सदस्य 30 ,बघुडी में कुल संख्या 172,सदस्य बनायी गयी है मात्र 50 आशाएं । नगरा,सियर,नरही,वैना, चिलकहर, रसड़ा, दुबहड़,बेलहरी(सोनवानी),बांसडीह,रेवती,मनियर,सिकंदरपुर और बेरुआरबारी की आशाये किसी भी संगठन की सदस्य नही बतायी जा रही है (अंगुलियों पर गिनने लायक संख्या किसी मे शामिल हो सकती है)।
अब सवाल यह उठता है कि लगभग 2800 आशा जो उपरोक्त किसी भी संगठन की सदस्य नही है तो उनका रहनुमा कौन है ?बिना संगठन और नेता के इनका शोषण कितना होता होगा,यह स्वतः ही जाना जा सकता है । दो दो संगठन लेकिन रहनुमाई करने वाले मात्र 10 प्रतिशत के समर्थन से पूरे जनपद मे अपनी राजनीति चमकाते है और लगभग 90 प्रतिशत आशाएं दिन के उजाले में ही ठगी जाती है ।
यह समाचार दोनो संगठन की नेत्रियों को अच्छा नही लगेगा लेकिन बलिया एक्सप्रेस का मानना है कि आशाएं जिस तरह लोगो को स्वास्थ्य संबंधी जानकारियां , परिवार नियोजन की जानकारियां , टीकाकरण की जानकारियां देकर आम लोगो व महिलाओ को जागरूक करती है, उसी तरह अपने हक के लिये राजनैतिक रूप से जागृत हो और किसी भी वर्तमान संगठन से जुड़कर या दोनो की नीतियां ठीक न लगती हो तो नया संगठन खड़ा करके अपनी लड़ाई लड़े, इस तरह हथियार डालकर संख्या बल के आधार पर अल्पसंख्यक रहनुमाओं को खुली छूट न दे । जागरूक होकर किसी भी संगठन के बैनर तले एकजुट होकर अपनी परेशानियों का हल निकाले ।





