Breaking News

बलिया : देश कैसे होगा खुशहाल , जब देश का अन्नदाता फटेहाल, लैब टू दी लैंड की अपनी नीति कब लागू करेंगे हमारे पीएम मोदी जी , 6 हजार की किसानों को आर्थिक सहायता स्वागत योग्य , पर इससे जरूरी है खाद, बीज,पानी और खेतों तक सड़कों की व्यवस्था


 देश कैसे होगा खुशहाल , जब देश का अन्नदाता फटेहाल, लैब टू दी लैंड की अपनी नीति कब लागू करेंगे हमारे पीएम मोदी जी , 6 हजार की किसानों को आर्थिक सहायता स्वागत योग्य , पर इससे जरूरी है खाद, बीज,पानी और खेतों तक सड़कों की व्यवस्था

ग्लोबल समिट 2013(गुजरात) मे सम्मानित किसान अखिलेश सिंह से डॉ सुनील ओझा की बातचीत
बलिया 12 जुलाई 2019 ।।
    
प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा किसानों के सहायतार्थ शुरू की गयी प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना जिसमे किसानों को 2-2 हजार रुपये के रूप में कुल तीन बार मे 6 हजार रुपये मिल रहे है , से क्या किसानों की दयनीय दशा में सुधार आयेगा ? क्या वर्तमान में चल रही सुधारो की कड़ी में खेती और खेतिहर किसानों की माली हालत सुधरेगी ? इस पर बलिया एक्सप्रेस के उप संपादक डॉ सुनील ओझा ने बलिया के प्रगतिशील किसान और 2013 में तत्कालीन मुख्यमंत्री गुजरात नरेंद्र मोदी ( अब प्रधानमंत्री) द्वारा गुजरात मे बुलायी गयी ग्लोबल समिट 2013 , (जिसमे देश विदेश के हजारों चयनित किसान आये थे) के प्रथम पुरस्कार विजेता बलिया के चर्चित किसान अखिलेश सिंह से साक्षत्कार लिये थे , उसके अंश आपको बता रहे है ।
  श्री अखिलेश सिंह के साक्षत्कार को बताने से पहले बलिया के ही सपूत देश के पूर्व प्रधानमंत्री स्व चन्द्रशेखर जी जिन आर्थिक सुधारों के नाम पर रोज रोज प्रयोग सरकार द्वारा किये जा रहे है , उस पर आर्थिक सुधारों के लागू होने के 7 साल बाद चन्द्रशेखर जी ने क्या कहा था और इससे कृषि क्षेत्र को क्या लाभ हुआ , इस पर भी अपने विचार व्यक्त किये थे , उनके अंश देखे ---

हमने आर्थिक सुधारों के सात साल पूरे कर लिये हैं. यह इस बात के लिए काफी लंबी अवधि है कि हम इसका वस्तुपरक मूल्यांकन करें. बैंक फंड एसएपी के अब भी बहुतेरे समर्थक हैं, जो इस प्रक्रिया को बचाने के लिए ‘ज्यादा और तीव्र सुधारों\' की वकालत करते हैं. मानो इस प्रक्रिया की शुरुआत इस बात का लिहाज किये बिना की गयी है कि इसका बहुतायत लोगों पर क्या असर पड़ रहा है या पड़ेगा. सुधारों की मनमानी प्रक्रिया पर बहस की लौ जलाना जरूरी हो गया है.
नीतियों में बदलाव स्थिरता लाने की प्रक्रिया के रूप में हुआ था, जिसके दो मकसद थे. देश के भीतर मूल्य/ स्थिरता लाना और विदेशी मोर्चे पर भुगतान संतुलन कायम करना. आर्थिक सुधार अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों द्वारा निर्धारित की गयी शर्तो के तहत लागू किये गये. विदेशों के पूंजी बाजारों में पहुंच आसान बनायी गयी.
बैंकिग व्यवस्था को व्यापक आजादी दी गयी, ताकि वह निजी क्षेत्र में पैसा लगा सके. जहां तक सार्वजनिक क्षेत्र की बात है, तो विनिवेश सरकार की प्रमुख नीति रह गयी. कृषि क्षेत्र, जो अब तक सार्वजनिक क्षेत्र के मत्थे हुआ करता था और यह न्यायसंगत भी था, को निजी क्षेत्र के लिए खोल दिया गया. खुलेपन की प्रक्रिया में व्यापार, प्रौद्योगिकी और निवेश के क्षेत्र में व्यापक नीतिगत बदलाव किये गये. प्रौद्योगिकी, यहां तक कि दोहरात्मक व साधारण प्रौद्योगिकी तक के आयात की अनुमति दी गयी.
कृषि क्षेत्र, जहां विदेशी पूंजी की जरूरत नहीं समझी जा रही थी, को इसके लिए खोल दिया गया. यह भी काबिलेगौर है कि सुधारों की प्रक्रिया खाद्य सुरक्षा, कृषि में सरकारी निवेश, विशाल कृषि क्षेत्र की सिंचाई वर्षा पर निर्भर होने तथा छोटे और सीमांत किसानों की समस्याओं जैसे सवालों के लिए उपयुक्त नहीं थी. इसलिए प्रौद्योगिकी और ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के सवालों के भी अनुरूप नहीं थी.
पिछले साढ़े सात सालों के दौरान असल में हुआ क्या? यह तो स्वाभाविक है कि सुधारों का अधिकतर अंश यथावत था. लेकिन उनके परिणाम क्या हैं? क्या कीमतों में स्थिरता आयी? सुधारों के शुरुआती तीन वर्षो में इसकी कुछ उम्मीद बंधती दिख रही थी. लेकिन ज्यादा बारीकी से विचार करें और कीमतों की पिछले दिनों की हालत पर नजर डालें, तो उन उम्मीदों पर पानी फिर गया है. इसमें कोई संदेह नहीं कि कुछ वस्तुओं, पर्सनल कंप्यूटरों और अब वाहनों की कीमतों में थोड़ी गिरावट आयी है. लेकिन हमारे ज्यादातर देशवासियों के लिए यह निर्थक है. उनके लिए तो दाल, चावल, गेहूं, सब्जी, चाय तथा ईंधन की कीमतें, और भाड़ा महत्वपूर्ण है.
सबसे चिंताजनक बात तो यह है कि हमारी सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) लगभग चौपट हो गयी है, क्योंकि एक तो खुले बाजार की कीमतों और पीडीएस कीमतों में बेहद अंतर है और दूसरा इसका दायरा लगातार सिमटता गया है. ये दोनों बातें सुधार की प्रक्रिया के प्रत्यक्ष परिणाम हैं ।

अखिलेश सिंह के साक्षत्कार


6 वर्ष पूर्व गुजरात के गांधी नगर मे आयोजित ग्लोबल एग्रीकल्चर समिट 2013 में बलिया के चयनित चार किसान  अखिलेश सिंह (दिउली) ,रंजीत वर्मा(स्वरूपुर),विनोद सिंह (कोटवारी),मुन्ना यादव(गौरा),में प्रथम पुरस्कार विजेता देउली निवासी अखिलेश सिंह ने आज के परिवेश में किसान की परेशानी को अपनी जुबान से बया किया ।उन्होंने बताया कि  हमारे प्रधानमंत्री जी जिस समय गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो एक ग्लोबल एग्रीकल्चर समिट कार्यक्रम का आयोजन किये थे । उस समिट में श्री मोदी जी ने लैब टू लैंड की पद्धति को अपनाने की बात कही थी।मगर मुख्यमंत्री से प्रधान मंत्री बनने के 6 साल बाद भी इसपर कोई काम नही हो पा रहा है। 
श्री सिंह ने कहा कि अगर पीएम मोदी अपनी लैब टू दी लैंड वाली नीति पर काम करना शुरू कर देंगे तो अपने आप किसानों का विकास होने लगेगा । श्री सिंह ने प्रयोग के लिये एक गांव के चयन करने की नीति को भी कटघरे में खड़ा करते हुए कहा कि इससे भला होने वाला नही है । कहा कि एक क्षेत्र विशेष में मिट्टी का स्वभाव लगभग एक सा होता है , ऐसे में एक गांव का चयन करने की अपेक्षा या तो उस ब्लाक की , या उस ब्लाक की एक न्याय पंचायत का चयन फायदेमंद होगा । कहा कि साथ ही इसमें क्षेत्र के खेती से सम्बंधित जानकारों की राय भी ली जानी चाहिये ।बताया कि हम लोग हर समय कुछ नया करने का प्रयास करते है लेकिन रिजल्ट नही आ पाता ।कारण जो किसान को चाहिए वह सुविधा हम लोगो को नही मिल पाती है।प्रधानमंत्री जी जो किसान सम्मान निधि योजना शुरू किए है वह तो स्वागत योग्य है लेकिन जिन लोगो के कंधों पर यह कार्य करने की जिम्मेदारी है ,वो लोग इस कार्य को समय से पूरा नही कर पा रहे है ।किसान जो तहसील से अपना कार्य करा लेते उनको तहसील कर्मी जिला मुख्यालय पर भेज देते है।जिस से गरीब किसान खेत देखे या पैसा खर्च कर जिला का चक्कर काटे ।जब किसान परेशान होगा तो देश क्या विकास करेगा ? सिर्फ मॉडल कह देने से न देश विकास करेगा न किसानों का विकास होगा।
  श्री अखिलेश सिंह ने कहा कि सरकार अगर किसानों का भला करना चाहती है , उत्थान करना चाहती है तो किसानों को खेती में प्रयुक्त होने वाले संसाधनों पर सहायता दे । 6 हजार रुपये देने से अच्छा है किसानों को यही रकम खाद बीज के दाम में सहयोग कर के दे । हमारे देश में अधिकतर खेती बारिश पर आधारित है , इसपर आत्मनिर्भरता कम करने के लिये नहरों के द्वारा समय से पानी और खेती के समय पर्याप्त बिजली सप्लाई करे । कहा हमारे जनपद के गांवों में 1957-58 में विद्युतीकरण तत्कालीन लोड के आधार पर किया गया था , आज गांवो में जर्जर विद्युत तारो की वजह से किसानों को लो वोल्टेज और अघोषित कटौती से जूझना पड़ रहा है । खेती के समय जब पानी की जरूरत होती है बिजली कट जाती है , नहरों में पानी नही रहता है , ऐसे में मजबूरन किसानों को डीजल जनित यंत्रो से महंगी सिंचाई करनी पड़ती है । अगर किसानों की वास्तव में सहायता करने की नीयत है तो सिंचाई में कीजिये । सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह भी है कि अधिसंख्य किसानों के खेतों तक आधुनिक संसाधन ले जाने के रास्ते ही नही है , अगर किसानों का हित सरकार चाहती है तो हर खेत तक संसाधन पहुंचे इसके लिये सड़को का विकास करे । आज देश का अन्न दाता फटेहाल है तो कैसे आप देश को खुशहाल कह सकते है । बागी बलिया के सपूत पूर्व पीएम चन्द्रशेखर जी कहा करते थे कि देश के विकास का रास्ता गांवो की गलियों से होकर निकलता है । लेकिन अफसोस कि आजकल देश के विकास के बाद किसानों और गांवो के विकास की अवधारणा विकसित हो रही है जो न तो देशहित में है , न ही किसान हित मे ।