भोजशाला प्रकरण : कमाल मौला परिसर हटाकर बने ‘सरस्वती लोक’, मुख्य याचिकाकर्ता कुलदीप तिवारी की मांग
धार मध्यप्रदेश ।। भोजशाला प्रकरण के मुख्य याचिकाकर्ता कुलदीप तिवारी ने भोजशाला परिसर से कमाल मौला दरगाह को विस्थापित कर पूरे क्षेत्र को भारतीय ज्ञान, संस्कृति और संस्कृत शिक्षा के वैश्विक केंद्र के रूप में विकसित करने की मांग उठाई है। उन्होंने कहा है कि भोजशाला परिसर एवं उसके आसपास के क्षेत्र में “सरस्वती लोक”, संस्कृत विद्यापीठ, शोध संस्थान, पुस्तकालय और भारतीय ज्ञान परंपरा पर आधारित सांस्कृतिक केंद्र स्थापित किए जाने चाहिए।
तिवारी ने कहा कि भोजशाला केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि राजा भोज द्वारा स्थापित उस महान विद्या परंपरा का प्रतीक है, जिसने धार को शिक्षा और संस्कृति की राजधानी के रूप में प्रतिष्ठित किया था। उन्होंने कहा कि न्यायालय में प्रस्तुत पुरातात्विक साक्ष्य, ऐतिहासिक अभिलेख और हाल के न्यायिक घटनाक्रम यह संकेत देते हैं कि भोजशाला का मूल स्वरूप ज्ञान एवं सरस्वती उपासना से जुड़ा रहा है।
क्या है रहमत मस्जिद का इतिहास?
कुलदीप तिवारी का कहना है कि वर्ष 1935 में भोजशाला परिसर में नमाज को लेकर उत्पन्न विवाद को शांत करने के लिए तत्कालीन धार रियासत के दीवान नदकर (नारकर) द्वारा एक पृथक स्थान नमाज के लिए उपलब्ध कराया गया था। उनके अनुसार यह स्थान राजा की “रहमत” अथवा कृपा के रूप में प्रदान किया गया था, जिसके कारण आगे चलकर यह स्थान “रहमत मस्जिद” के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
तिवारी का दावा है कि जब मुस्लिम समाज को नमाज के लिए पृथक स्थान उपलब्ध कराया जा चुका था, तब भोजशाला परिसर के भीतर कमाल मौला दरगाह अथवा मस्जिद संबंधी दावे का कोई औचित्य नहीं रह जाता। उन्होंने कहा कि ऐतिहासिक न्याय और सांस्कृतिक पुनर्स्थापन की दृष्टि से अब पूरे परिसर को एकीकृत रूप में विकसित किया जाना चाहिए।
1935 का आदेश फिर चर्चा में
भोजशाला विवाद की सुनवाई के दौरान वर्ष 1935 में तत्कालीन धार रियासत द्वारा जारी एक आदेश भी न्यायालय में चर्चा का विषय बना है। मुस्लिम पक्ष इस आदेश को अपने दावे के समर्थन में प्रस्तुत करता रहा है। वहीं हाल ही में मध्यप्रदेश सरकार ने उच्च न्यायालय में यह पक्ष रखा कि 1935 में धार रियासत द्वारा जारी उक्त आदेश को भारतीय संविधान लागू होने के बाद स्वतः वैधानिक मान्यता प्राप्त नहीं है और वर्तमान विवाद का निर्णय उपलब्ध साक्ष्यों तथा विधिक प्रावधानों के आधार पर किया जाना चाहिए।
भोजशाला: ज्ञान और संस्कृति की विरासत
धार स्थित भोजशाला को लेकर लंबे समय से यह मान्यता रही है कि यह परमार नरेश राजा भोज द्वारा स्थापित एक प्रमुख शिक्षण एवं सांस्कृतिक केंद्र था। धार जिला प्रशासन के आधिकारिक विवरण के अनुसार राजा भोज ने यहां एक विद्या-पीठ स्थापित की थी, जो आगे चलकर भोजशाला के नाम से प्रसिद्ध हुई। प्रशासनिक अभिलेखों में यह भी उल्लेख मिलता है कि वर्तमान संरचना में अनेक ऐसे स्थापत्य अवशेष और शिलालेख मौजूद हैं जो प्राचीन विद्या-पीठ एवं सरस्वती उपासना से जुड़े रहे हैं।
‘विवाद नहीं, ज्ञान का केंद्र बने भोजशाला’
कुलदीप तिवारी ने कहा कि देश में नालंदा, तक्षशिला और विक्रमशिला जैसी प्राचीन ज्ञान परंपराओं को पुनर्जीवित करने की चर्चा होती है, ऐसे में भोजशाला को भी भारतीय संस्कृति और शिक्षा के भव्य केंद्र के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। उन्होंने मांग की कि भोजशाला परिसर को पूर्णतः “सरस्वती लोक” के रूप में विकसित कर यहां संस्कृत विद्यापीठ, वैदिक अध्ययन केंद्र, शोध संस्थान और सांस्कृतिक संग्रहालय स्थापित किए जाएं।







