अपनी ही सरकार को कटघरे मे खड़ा कर दिये मंत्री संजय निषाद :मंत्री के आंसुओं में बहा सियासत का दर्द, मंच से उठी एक समाज की पुकार
गोरखपुर।। गोरखपुर की भीड़ से भरी सभा में माहौल अचानक बदल गया, जब निषाद पार्टी के नेता और उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री संजय निषाद बोलते-बोलते रुक गए। उनकी आवाज कांपने लगी, शब्द भारी हो गए और कुछ ही पलों में आंखों से आंसू बहने लगे। मंच पर मौजूद लोग स्तब्ध थे, जबकि नीचे खड़ी भीड़ इस भावुक क्षण को चुपचाप देख रही थी। यह सिर्फ एक नेता का रोना नहीं था, बल्कि एक पूरे समाज के दर्द को शब्द देने की कोशिश नजर आ रही थी।
अपने संबोधन में उन्होंने उस पीड़ा को सामने रखा, जिसे वे लंबे समय से महसूस कर रहे थे। उन्होंने कहा कि उनके समाज की बहन-बेटियों की सुरक्षा खतरे में है और सम्मान पर लगातार चोट हो रही है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उनके समुदाय के लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों के साथ खिलवाड़ हो रहा है, यहां तक कि वोट देने के अधिकार तक को छीना जा रहा है। इन बातों को कहते-कहते उनका गला भर आया और वे खुद को संभाल नहीं पाए।
उनकी बातों में सिर्फ शिकायत नहीं थी, बल्कि एक गहरा आक्रोश और बेबसी भी झलक रही थी। उन्होंने इशारों-इशारों में यह जताने की कोशिश की कि वर्षों से उनका समाज उपेक्षा और अन्याय का सामना करता रहा है। उनके अनुसार, सत्ता बदलती रही लेकिन हालात में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ। इस दौरान उन्होंने अपने समर्थकों से एकजुट रहने और अपने अधिकारों के लिए खड़े होने की अपील भी की।डॉ संजय निषाद के इन आँसुओ ने योगी सरकार और मोदी सरकार दोनों को कटघरे मे खड़ा कर दिया है।
मंच से निकले ये आंसू राजनीतिक गलियारों में भी गूंजते नजर आए। इस घटना को अलग-अलग नजरिए से देखा जा रहा है। कुछ लोग इसे एक सच्चे दर्द की अभिव्यक्ति मान रहे हैं, तो कुछ इसे राजनीतिक संदेश के रूप में देख रहे हैं। चुनावी माहौल के बीच इस तरह का भावुक प्रदर्शन अपने आप में कई सवाल खड़े करता है—क्या यह एक नेता की व्यक्तिगत पीड़ा है या एक रणनीतिक अपील?
सभा खत्म हो गई, लेकिन उस दिन का दृश्य लोगों के मन में रह गया। एक तरफ सत्ता का हिस्सा होने के बावजूद असंतोष की झलक थी, तो दूसरी तरफ अपने समाज के लिए लड़ने का दावा। यह घटना यह भी दिखाती है कि राजनीति सिर्फ भाषणों और वादों तक सीमित नहीं होती, कभी-कभी वह आंसुओं के जरिए भी अपनी बात कहती है।














