क्या ब्राह्मणों ने मुसलमानों, ईसाइयो, बौद्ध आदि की भी जातियां बनायीं है? अपने नाम से जाति क्यों नही हटा देते, कौन आपको कर रहा है विवश
नई दिल्ली।। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए नियम पर सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल रोक लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट में अब इस मामले की सुनवाई 19 मार्च को होगी। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि फिलहाल यूजीसी का 2012 का रेगुलेशन ही जारी रहेगा।सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस सुनवाई के दौरान जो टिप्पणी की गयी है, वह नेताओं और समाज दोनों की आंख खोलने वाली है। एक तरफ जहां कोर्ट ने आरक्षण का लाभ लेकर सर्वोच्च पदों पर आसीन लोगों के आरक्षण न छोड़ने की मानसिकता पर चोट किया है, तो वही सारे फसाद की जड़ ब्राह्मणों को ठहराने पर भी जबरदस्त प्रहार किया है। इस टिप्पणी के बाद आरक्षण का लाभ लेकर सर्वोच्च पदों पर पहुंचने वालों मे अगर थोड़ी भी शर्म हया बची होंगी तो वो लोग आरक्षण छोड़ने की उसी तरह घोषणा कर देंगे जैसे अलंकार अग्निहोत्री ने सिटी मजिस्ट्रेट के पद से इस्तीफा देकर किया है। लेकिन ऐसा होगा नही।
बता दे कि यूजीसी मामले की सुनवाई प्रधान न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने की। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पक्षकारों से कई तीखे सवाल भी पूछे। सीजेआई ने पूछा कि आजादी के 75 साल बाद भी हम समाज जातियों से मुक्त नहीं कर सके है और अब क्या इस नए कानून से पीछे की ओर जा रहे हैं? मामले पर सनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की प्रमुख टिप्पणियां इस प्रकार हैं-
CJI का सवाल
अगर दक्षिण भारत के किसी छात्र को उत्तर भारत के विश्विद्यालय में एडमिशन मिलता है, उस पर टिप्पणी होती है तो क्या यूजीसी का रेगुलेशन से उसे न्याय मिलेगा?
CjI की टिप्पणी - हम जातिविहीन समाज चाहते हैँ, आप क्या देश को भूतकाल में ले जाना चाहते हैँ ? गाइडलाइन्स एक ही पक्ष को ध्यान में रखकर बनाई गई हैँ।
वकील के जिरह पर :- जाति की पूरी व्यवस्था आपने ब्राह्मणों पर मढ़ कर समाज में नफरत घोल दी है, क्या मुस्लिमों की जातियां भी ब्राह्मणों ने बनाई है? ईसाई में जातियां भी ब्राह्मणों की दें है? बौद्ध, सिख, जैन क्या सभी की जातियां ब्राह्मणों ने बनाई है? अगर ब्राह्मणों की जातियों से इतनी दिक्कत है तो आज ही अपने नाम से जाति हटा लीजिये ( #suprimeCaurt ) कौन आपको रोकेगा? कौन आपको अपने नाम के आगे जाति लगाने के लिए विवश कर रहा है? 75 साल से ज्यादे आजादी के बीत जाने के बाद भी हम लोग आज भी जातियों के जंजाल से बाहर नही निकल पाये है?
खंडपीठ के दूसरे न्यायाधीश श्री जॉयमाल्या बागची ने कहा कि हम देश को अमेरिका नही बनने दे सकते है। जहां श्वेत व अश्वेत के लिये अलग अलग स्कूल व हॉस्टल थे।
स्टे देते समय :- अगर एक समाज, खुद को IAS, IPS, CJI, President, PM बनकर भी खुद को शोषित ही रखना चाहता है तो इसमें गलती ब्राह्मणों की नहीं बल्कि उसकी अपनी मानसिकता की है ।
अद्भुत दृश्य था कोर्ट में , दलील और समर्थन पक्ष के लोगो के चेहरे से हवाईया उड़ी थी
याचिकाकर्ता के वकील
पक्षकार विष्णु जैन की दलीलें
-हम यूजीसी के रेगुलेशन के सेक्शन 3 c को चैलेंज कर रहे
-जिसमें जातिगत भेदभाव की बात की गई है
-जो परिभाषा रेगुलेशन में भेदभाव की दी गई है वो पूरी तरह से सही नहीं है
-संविधान के विपरीत है। संविधान के मुताबिक भेदभाव देश के सभी नागरिकों से जुड़ा है
-लेकिन यूजीसी का कानून सिर्फ विशेष वर्ग के प्रति भेदभाव की बात करता है
-सुप्रीम कोर्ट ने पहले जो भी आदेश दिया है ये उस भावना के खिलाफ है
-इससे समाज में वैमनस्य बढ़ेगा। ये संविधान में दिए गए समानता के सिद्धांत के खिलाफ है
सवाल
-यूजीसी के नियम से रैगिंग के रूल क्यों हटाए गए?
-यूजीसी का नया नियम प्रगतिवादी ने होकर हमें पीछे ले जा रहा है
-कल को कोई फ्रेशर लड़का जो सामान्य जाति से आता है, वो पहले ही दिन अपराधी बनकर जेल के पीछे चला जाएगा। ऐसा अंदेशा है।
-याचिकाकर्ता ने यूजीसी के रेगुलेशन को समाप्त किए जाने की मांग की और इस पर तुरंत रोक लगाए जाने की मांग की
-याचिकाकर्ता ने कहा अगर हमें इजाजत मिले तो इससे बेहतर रेगुलेशन बनाकर दे सकते हैं
CJI की बड़ी टिप्पणी
आजादी के 75 साल बाद भी हम समाज जातियों से मुक्त नहीं कर सके हैं.और अब क्या इस नए कानून से पीछे की ओर जा रहे हैं?
महाधिवक्ता तुषार मेहता की दलील
ये संविधान से जुड़ा मामला है। उसे इसे नजरिए से सुना जाना चाहिए
CJI का टिप्पणी
-भारत की एकता हमारे शैक्षणिक संस्थानों में नजर आनी चाहिए
-हम चाहते है कि कुछ कानूनविदों की कमेटी इसपर विचार करे
सुनवाई के दौरान क्या हुई बहस
सुप्रीम कोर्ट में यूजीसी के नए नियमों के खिलाफ मामले पर आज सुनवाई शुरू हुई। इस दौरान वकील विष्णु शंकर जैन ने कहा कि हम यूजीसी के रेगुलेशन के सेक्शन 3 c को चैलेंज कर रहे जिसमें जातिगत भेदभाव की बात की गई है। उन्होंने कहा कि जो परिभाषा रेगुलेशन में भेदभाव की दी गई है वो पूरी तरह से सही नहीं है। संविधान के विपरीत है। संविधान के मुताबिक भेदभाव देश के सभी नागरिकों से जुड़ा है। लेकिन यूजीसी का कानून सिर्फ विशेष वर्ग के प्रति भेदभाव की बात करता है। सुप्रीम कोर्ट ने पहले जो भी आदेश दिया है ये उस भावना के खिलाफ है। इससे समाज में वैमनस्य बढ़ेगा। ये संविधान में दिए गए समानता के सिद्धांत के खिलाफ है।क्या यूजीसी का रेगुलेशन से उसे न्याय मिलेगा?
इस पर CJI ने पूछा कि अगर दक्षिण भारत के किसी छात्र को उत्तर भारत के विश्विद्यालय में एडमिशन मिलता है, उस पर टिप्पणी होती है तो क्या यूजीसी का रेगुलेशन से उसे न्याय मिलेगा। इस पर याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि इसके लिए अलग से प्रावधान है किसी के जन्मस्थान के आधार पर अगर भेदभाव होता है तो उस पर एक्शन लिया जा सकता है।
रैगिंग के रूल क्यों हटाए गए?
याचिकाकर्ता के वकील ने कहा, यूजीसी के नियम से रैगिंग के रूल क्यों हटाए गए? यूजीसी का नया नियम प्रगतिवादी ने होकर हमें पीछे ले जा रहा है। कल कोई फ्रेशर लड़का जो सामान्य जाति से आता है, वो पहले ही दिन अपराधी बनकर जेल के पीछे चला जाएगा। ऐसा अंदेशा है।
इसे लेकर CJI ने बड़ी टिप्पणी करते हुए कहा, आजादी के 75 साल बाद भी हम समाज जातियों से मुक्त नहीं कर सके हैं.और अब क्या इस नए कानून से पीछे की ओर जा रहे हैं? याचिकाकर्ता ने यूजीसी के रेगुलेशन को समाप्त किए जाने की मांग की और इस पर तुरंत रोक लगाए जाने की मांग की। याचिकाकर्ता ने कहा कि अगर हमें इजाजत मिले तो इससे बेहतर रेगुलेशन बनाकर दे सकते हैं।
वहीं, एसजी तुषार मेहता ने कहा कि ये संविधान से जुड़ा मामला है। उसे इसी नजरिए से सुना जाना चाहिए। भारत की एकता हमारे शैक्षणिक संस्थानों में नजर आनी चाहिए। इस पर चीफ जस्टिस ने कहा कि हम चाहते है कि कुछ कानूनविदों की कमेटी इसपर विचार करे।



