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संस्मरण :महीयसी महादेवी वर्मा जी के घर एक दिन : डा० भगवान प्रसाद उपाध्याय




प्रयागराज।।बाल साहित्य  की सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ श्रीमती शकुंतला  सिरोठिया जी के बाई का बाग प्रयागराज  स्थित आवास पर साहित्यकारों की एक बैठक हुई। जिसमें श्रीमती रामेश्वरी   सिरोठिया , श्री कैलाश कल्पित , श्री श्याम मोहन त्रिवेदी , पं० नर्मदेश्वर चतुर्वेदी  , डा० संत कुमार  एवं भगवान प्रसाद उपाध्याय  उपस्थित रहे । बाल साहित्य पर उन्हीं दिनों श्रीमती शकुंतला सिरोठिया जी को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान से बाल साहित्य पुरस्कार मिला था और उन्होंने वह संपूर्ण राशि बाल साहित्य पर एक सम्मान देने के लिए सुरक्षित कर दिया था । बैठक में यह सुनिश्चित किया गया कि शीघ्र ही प्रयागराज में बाल साहित्य पुरस्कार श्रीमती सिरोठिया जी के द्वारा दिया जाएगा और पुरस्कार सम्मान समारोह में महीयसी  महादेवी वर्मा जी को मुख्य अतिथि बनाया जाएगा।

दूसरे दिन  महीयसी  महादेवी वर्मा जी के घर जाने का निर्णय हुआ और उनसे दूरभाष पर हुई वार्ता के बाद सभी लोग अशोक नगर स्थित उनके घर पहुंच गए। वहां  डॉक्टर राम जी पांडे ने आवभगत किया और आदरणीय महादेवी जी के बैठक कक्ष में ले गए सब लोग आदरणीय महादेवी जी के साथ ही जमीन पर बैठ गए थे।





आने का प्रयोजन बताया गया और बहुत देर तक परस्पर परिचय होता रहा। इस बीच नाश्ते की झड़ी सी लग गई। कई प्लेटों में भरकर तरह-तरह के मिष्ठान और फल सबके सम्मुख रख दिए गए आदरणीय महादेवी जी ने कहा -  भगवान तुम सबसे छोटे हो तुम को सबसे अधिक खाना पड़ेगा !सब लोग हंस पड़े।

मैंने कहा  - मां जी जब मैं सबसे छोटा हूं तो मेरा पेट भी सबसे छोटा है  तो सबसे अधिक कैसे खा सकता हूं  , जो सबसे बड़ा है वही सबसे अधिक खा सकता है। मेरी इस बात पर सब लोग  फिर  खिलखिला कर हंस पड़े और पंडित नर्मदेश्वर  चतुर्वेदी जी कुछ  झेंप से गए वह सबसे बड़े और स्वस्थ थे।नाश्ते के बाद  डॉक्टर संतकुमार और श्री कैलाश कल्पित जी के आग्रह पर उन्होंने गिल्लू और अन्य कहानियों पर चर्चा की, सबकी दोबारा कुशल क्षेम पूछी और कहा  " शकुंतला मेरी प्रिय शिष्या है,मैं इसके आयोजन में अवश्य आऊंगी , आप लोग तैयारी करिए मैं आयोजन में निश्चित समय से पहुंच जाऊंगी "।

 महीयसी जी के   इस सहज स्वीकृति  से सभी लोग गदगद थे। उनका बड़प्पन और आत्मीयता स्पष्ट रूप से उनकी बातों में झलक रही थी बहुत देर तक साहित्यिक चर्चा  परिचर्चा  हुई।अंत में सभी लोग आत्मिक प्रसन्नता लिए हुए वापस हुए और आयोजन की तैयारी शुरू हो गई आमंत्रण  पत्र  पहुंचाने का दायित्व मुझे दिया गया और मैं दोबारा जब पहुंचा तो  श्री पांडेय  जी मिले और उन्होंने बताया कि माता जी इस समय विश्राम कर रही हैं आप आमंत्रण पत्र यही छोड़ जाइए मैं उन्हें दे दूंगा और मैं भी साथ में आऊंगा।उन्होंने मुझे जलपान कराया और फिर मैं वापस हो गया वह दिन आज तक चलचित्र की  तरह   मेरे  मानस पटल पर घूमता रहता है।


    डा० भगवान प्रसाद उपाध्याय

गंधियांव करछना

प्रयागराज 

 8299280381