हिंदी दिवस पर विशेष : कहानी हिंदी की
बलिया।। उन्नीसवीं सदी का मध्य भारत अपनी मिट्टी की पहचान तलाश रहा था। अदालतों की दीवारों पर तब भी फारसी के भारी-भरकम लफ़्ज़ों का पहरा था। साल 1837 में जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने ऐलान किया कि फारसी की जगह स्थानीय भाषाओं को कचहरियों में जगह दी जाएगी, तब उत्तर भारत के जनमानस को लगा कि अब उनकी अपनी बोली अपने हक के साथ न्याय के तराजू तक पहुँचेगी। मगर ब्रिटिश हुकूमत की कलम ने एक विचित्र दांव चला; हिंदी भाषी अंचल में देवनागरी को दरकिनार कर फारसी लिपि वाली उर्दू को अदालतों की एकमात्र भाषा बना दिया गया।
यहाँ से शुरू हुआ एक आम हिंदुस्तानी का अपने ही मुकदमे में बेगाना हो जाने का दर्द। खेत की पैमाइश हो या कर्ज का इकरारनामा, गरीब किसान और मजदूर अपनी ही गवाही पर मुंशी और अमले के रहमोकरम पर निर्भर हो गए। इस अन्याय के खिलाफ पहली आवाज काशी और बिहार के उन विद्वानों और वकीलों ने उठाई, जिन्होंने इसे सीधे-सीधे न्याय से वंचित करने का षड्यंत्र माना। अदालतों में कानूनी अर्जियाँ दी गईं, दस्तावेजों की लड़ाई लड़ी गई और यह अकाट्य तर्क रखा गया कि जिस लिपि को 90 फीसदी जनता बांच नहीं सकती, उसमें इंसाफ संभव ही नहीं।
संघर्ष की पहली किरण 1881 में चमकी, जब बिहार की कचहरियों में देवनागरी और कैथी को सरकारी मान्यता मिली। इसके बाद बनारस की नागरी प्रचारिणी सभा, पंडित मदन मोहन मालवीय और भारतेन्दु हरिश्चंद्र के वैचारिक नेतृत्व ने हुकूमत को हिला दिया। साठ हजार से अधिक नागरिकों के हस्ताक्षरों वाले विशाल ज्ञापन और अदालती तर्कों के आगे झुकते हुए 18 अप्रैल 1900 को संयुक्त प्रांत के गवर्नर सर एंटनी मैकडोनेल ने ऐतिहासिक आदेश जारी किया कि देवनागरी में भी अर्जी और सम्मन मान्य होंगे। यह जनभाषा की पहली बड़ी वैधानिक विजय थी।
आजादी की चौखट तक पहुँचते-पहुँचते यह सवाल और गंभीर हो गया कि स्वतंत्र भारत की राजकाज की भाषा क्या होगी। जब संविधान सभा बैठी, तो भाषा के सवाल पर सबसे तीखी और भावुक बहसें हुईं। एक तरफ अंग्रेजी का पुराना प्रशासनिक ढांचा था, तो दूसरी तरफ विविधता से भरे देश में किसी एक भाषा को केंद्रीय स्थान देने की चुनौतियां।
इस वैचारिक मंथन के केंद्र में व्यौहार राजेंद्र सिंह, काका कालेलकर, मैथिलीशरण गुप्त और सेठ गोविंद दास जैसे मनीषी रात-दिन डटे रहे। मुंशी-अय्यंगार फॉर्मूले के जरिए एक ऐसा संतुलन साधा गया जिसने देश की भाषाई विविधता का सम्मान करते हुए हिंदी को केंद्र की धुरी बनाया। 14 सितंबर 1949 को व्यौहार राजेंद्र सिंह के 50वें जन्मदिन के ऐतिहासिक अवसर पर संविधान सभा ने मुहर लगाई कि संघ की राजभाषा देवनागरी लिपि में हिंदी होगी।
संविधान के पन्नों पर दर्ज यह स्वीकृति केवल एक नियम नहीं, बल्कि कचहरियों से लेकर संसद तक एक भाषा की सौ साल लंबी तपस्या का परिणाम थी। इस गौरवशाली दिन की स्मृति और भाषा के प्रति संवैधानिक संकल्प को जीवित रखने के लिए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा की पहल पर साल 1953 में पहली बार 14 सितंबर को औपचारिक रूप से 'हिंदी दिवस' मनाया गया, जो तब से हर वर्ष भारतीय अस्मिता और लोकवाणी के मिलन का उत्सव बनकर गूँज रहा है।







