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तुम बात करो प्रेम की, हम तो करेंगे प्रेम, कोई नाम-पता पूछे, हम तो कहेंगे प्रेम

 




तुम बात करो प्रेम की, हम तो करेंगे प्रेम,
कोई नाम-पता पूछे, हम तो कहेंगे प्रेम।
स्नेहा सिंह 

नोएडा।। प्रेम की कोई एक परिभाषा नहीं होती। जिससे भी प्रेम के बारे पूछो, वही अलग-अलग शब्दों में उसकी व्याख्या करता है। प्रेम पूजा भी है, प्रेम हिम्मत भी है, प्रेम त्याग भी है और प्रेम में संवेदनाओं की अनगिनत आहटें भी शामिल हैं। सच तो यह है कि प्रेम को किसी एक सीमा में बांधा ही नहीं जा सकता।
मां की ममता में जो स्नेह है, वह प्रेम है। पिता की डांट में छुपी चिंता भी प्रेम है। भाई-बहन की नोंकझोंक में जो अपनापन है, वह भी प्रेम ही है। मित्रता में जो विश्वास है, वह प्रेम है। जीवनसाथी के साथ निभाया गया हर सुख-दुख प्रेम का ही विस्तार है। प्रेम केवल शब्द नहीं, यह एक अनुभूति है, जो जीवन को अर्थ देती है।
फरवरी का महीना यानी फाल्गुन का आते ही वातावरण में एक अलग सी सरगर्मी दिखाई देने लगती है। क्योंकि यह पूरा महीना ही प्रेम का होता है। इसलिए बाजार सज जाते हैं, दिल के आकार वाले उपहार, कार्ड और फूलों की बहार आ जाती है। युवा पीढ़ी के लिए वसंत पंचमी हो या वैलेंटाइन डे महि शिवरात्री हो या फिर होली, प्रेम के प्रतीक और एक विशेष अवसर बन गए हैं। लेकिन प्रेम केवल एक दिन का उत्सव नहीं है, यह तो जीवनभर निभाई जाने वाली भावना है।
आज के समय में प्रेम के कई रूप देखने को मिलते हैं। कोई सोशल मीडिया पर अपने प्रेम का प्रदर्शन करता है, तो कोई चुपचाप अपने प्रिय के लिए त्याग करता है। कोई महंगे उपहार देकर प्रेम जताता है, तो कोई मुश्किल समय में साथ खड़े रहकर। असल में प्रेम दिखावे से नहीं, बल्कि निभाने से सिद्ध होता है।
सच्चा प्रेम वही है, जिसमें स्वार्थ न हो। जहां अधिकार से पहले आदर हो, अपेक्षा से पहले समझ हो और शब्दों से अधिक कर्म बोलते हों। प्रेम किसी का नाम या पहचान पूछकर नहीं किया जाता। वह तो बस हो जाता है, धीरे-धीरे, अनायास, बिना शर्त।

कई बार लोग प्रेम को केवल स्त्री-पुरुष के संबंध तक सीमित कर देते हैं, जबकि प्रेम उससे कहीं अधिक व्यापक है। प्रकृति से प्रेम, अपने काम से प्रेम, अपने देश से प्रेम, ये सभी जीवन को समृद्ध बनाते हैं। प्रेम में ही सृजन की शक्ति है और प्रेम में ही धैर्य की ताकत।
यदि जीवन में प्रेम न हो तो सब कुछ सूना लगता है। प्रेम ही वह धागा है, जो रिश्तों को बांधकर रखता है। यह मनुष्य को संवेदनशील बनाता है, उसे दूसरों के दुख-सुख से जोड़ता है। प्रेम नफरत की दीवारें गिरा सकता है और बिखरे मन को जोड़ सकता है।
इसलिए जब कोई प्रेम की बात करे, तो उसे सीमाओं में मत बांधिए। प्रेम को किसी नाम, किसी रिश्ते या किसी अवसर का मोहताज मत बनाइए। प्रेम कीजिए, निर्भय होकर, निष्कपट होकर, सच्चे मन से।
चलो, उम्र के विभिन्न चरणों में प्रेम के इस सुंदर सफ़र को समझें:

           बचपन का निष्कपट प्रेम
बचपन में प्रेम बिलकुल निष्कलंक और निस्वार्थ होता है। उस उम्र में प्रेम का अर्थ होता है, मां की गोद, पिता की उंगली, भाई-बहन की शरारतें और दोस्तों के साथ बांटी गई टाफी। बच्चे छोटी-छोटी बातों में खुश हो जाते हैं और उतनी ही जल्दी रूठ भी जाते हैं।
इस उम्र का प्रेम अधिकार से अधिक अपनापन लिए होता है। यहां दिखावा नहीं, बस सहज भावनाएं होती हैं। दादी की कहानी, मां का दुलार और पिता की सुरक्षा, यही बचपन का सच्चा प्रेम है। इसमें छल नहीं, केवल विश्वास और मासूमियत होती है।

    किशोरावस्था का आकर्षण भरा प्रेम
जब उम्र 13 से 19 वर्ष के बीच पहुंचती है, तब मन में नए भाव जागते हैं। इस समय प्रेम के साथ आकर्षण और रोमांच जुड़ जाता है। किसी की मुस्कान अच्छी लगने लगती है, किसी की बातें दिल को छू जाती हैं।
किशोरावस्था में प्रेम कल्पनाओं से भरा होता है। छोटी-छोटी मुलाकातें और साधारण बातें भी विशेष लगती हैं। यह उम्र भावनाओं की उथल-पुथल की होती है, इसलिए यहां प्रेम अक्सर जल्दी शुरू होता है और कभी-कभी उतनी ही जल्दी समाप्त भी हो जाता है।
यह प्रेम सच्चा तो होता है, पर अनुभव की कमी के कारण इसमें स्थिरता कम होती है। फिर भी यही वह चरण है, जहां व्यक्ति पहली बार अपने दिल की धड़कनों को समझता है।

       युवावस्था का परिपक्व प्रेम
20 से 35 वर्ष की उम्र में प्रेम अधिक समझदारी के साथ आता है। अब व्यक्ति केवल भावनाओं से नहीं, बल्कि जिम्मेदारियों और भविष्य की योजनाओं के साथ प्रेम को देखता है।
इस समय प्रेम केवल पसंद तक सीमित नहीं रहता, बल्कि जीवनसाथी चुनने का आधार बनता है। कैरियर, परिवार और सामाजिक जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाते हुए प्रेम को निभाया जाता है।
युवावस्था का प्रेम भरोसे और प्रतिबद्धता पर आधारित होता है। यहां त्याग, समर्पण और साथ मिलकर भविष्य बनाने की भावना अधिक प्रबल होती है।

              मध्यम आयु का स्थिर प्रेम
40 से 60 वर्ष की उम्र में प्रेम एक नई स्थिरता प्राप्त करता है। अब रिश्तों में आकर्षण से अधिक समझ और विश्वास का महत्व होता है। जीवन के उतार-चढ़ाव साथ झेलने के बाद संबंध और मजबूत हो जाते हैं।
इस चरण में पति-पत्नी एक-दूसरे के मित्र बन जाते हैं। बच्चों की परवरिश, परिवार की जिम्मेदारियां और सामाजिक कर्तव्यों के बीच भी उनका साथ बना रहता है।
यह प्रेम दिखावे से दूर और अनुभवों से समृद्ध होता है। यहां शब्दों से अधिक मौन का महत्व होता है, एक नजर ही बहुत कुछ कह देती है।

              वृद्धावस्था का आत्मिक प्रेम
60 वर्ष के बाद प्रेम आत्मिक रूप ले लेता है। अब संबंधों में शारीरिक आकर्षण से अधिक आत्मीयता और साथ की आवश्यकता होती है। जीवनभर के अनुभव, संघर्ष और खुशियां एक साझा स्मृति बन जाते हैं।
इस उम्र का प्रेम शांत, गहरा और स्थाई होता है। एक-दूसरे की सेहत का ध्यान रखना, पुरानी यादों को संजोना और साथ बैठकर जीवन की यात्रा को याद करना, यही सच्चा सुख बन जाता है।
वृद्धावस्था में प्रेम केवल दो व्यक्तियों के बीच नहीं रहता, बल्कि पूरे परिवार तक फैल जाता है। पोते-पोतियों के साथ बिताया गया समय उस प्रेम को और भी मधुर बना देता है।

अंत में प्रेम कोई एक पड़ाव नहीं, बल्कि जीवनभर चलने वाली यात्रा है। उम्र के साथ उसका स्वरूप बदलता रहता है, कभी मासूम, कभी रोमांचक, कभी जिम्मेदार और कभी आत्मिक।
हर चरण का प्रेम अपने आप में अनमोल है। यदि हम हर उम्र में प्रेम को समझकर और सहेजकर रखें, तो जीवन सचमुच एक सुंदर सफ़र बन जाता है।
प्रेम को नाम या उम्र की सीमाओं में बांधने के बजाय, उसे जीना सीखिए, क्योंकि अंततः प्रेम ही जीवन का सबसे मधुर सत्य है। 



स्नेहा सिंह 
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